सरहुल: झारखंड के प्रमुख 3 दिवसीय आदिवासी पर्व की विस्तृत जानकारी

सरहुल पर्व

सरहुल पर्व झारखंड और आसपास के क्षेत्रों के जनजातीय समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला प्रमुख वसंत-त्योहार है। यह प्रकृति पूजा और नववर्ष दोनों का प्रतीक है। भारतीय उपमहाद्वीप, विशेषकर झारखण्ड और छोटानागपुर पठार के जनजातीय समाजों में प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं है, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक सत्ता है जिसका आदर और संरक्षण मानव जीवन के अस्तित्व के लिए अपरिहार्य है। इसी वैचारिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि में ‘सरहुल’ (Sarhul) का उद्भव होता है। यह केवल एक ऋतु-उत्सव या नववर्ष का आरंभ मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव और प्रकृति के बीच सहजीवन, सम्मान और पारिस्थितिक संतुलन का सबसे मुखर और विशद प्रकटीकरण है ।   

सरहुल झारखण्ड की जनजातीय आबादी का सर्वप्रमुख और अत्यंत पवित्र पर्व है । यह उत्सव मुख्य रूप से हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया (तीसरे दिन) से आरंभ होकर चैत्र पूर्णिमा तक चलता है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार प्रायः मार्च या अप्रैल के महीने में पड़ता है । इस समय प्रकृति शीत ऋतु की जड़ता को त्याग कर वसंत के आगमन के साथ नए पल्लवों और पुष्पों से आच्छादित हो जाती है। यह पर्व जनजातीय समुदायों के लिए नववर्ष के आरंभ का प्रतीक है। अनुष्ठानों के पूर्ण होने के पश्चात ही कृषि संबंधी नए कार्य, जैसे बीजों की बुवाई, खेतों की जुताई और जंगलों से वनोपज (Forest produce) का संग्रहण प्रारंभ किया जाता है ।

नामकरण, व्युत्पत्ति और जनजातीय विविधताएं

झारखण्ड और इसके सीमावर्ती राज्यों—ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, और असम—में निवास करने वाले विभिन्न जनजातीय समूहों द्वारा सरहुल को अलग-अलग नामों और विशिष्ट स्थानीय परंपराओं के साथ मनाया जाता है। यद्यपि इसका नामकरण और कुछ कर्मकांड क्षेत्रीय स्तर पर भिन्न हो सकते हैं, परंतु इसकी मूल आत्मा—प्रकृति और साल वृक्ष (Shorea robusta) की वंदना—सर्वत्र एक समान रहती है । 

‘सरहुल’ नाम नागपुरी भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें “सर” या “सरई” का अर्थ साल (Shorea robusta) का वृक्ष होता है और “हुल” का भाव ‘सामूहिक रूप से’ या ‘उत्सव’ होता है। अतः सरहुल का शाब्दिक अर्थ होता है “साल वृक्षों की सामूहिक पूजा” या “साल के फूलों का उत्सव”। कुछ व्याख्याएँ इसे “वर्ष (सर) का आरंभ (हुल)” भी बताती हैं।

विभिन्न जनजातीय भाषाओं और समुदायों में इस पर्व के अलग नाम हैं, जो स्थानीय संस्कृति पर प्रकाश डालते हैं:

  • संताली (Santhal)बाहा परब (Baha Parab) – ‘बाहा’ का अर्थ ‘फूल’ होता है।
  • भूमिज (Bhumij)हादी बोंगा (Hadi Bonga)।
  • मुंडा / हो (Munda/Ho)बा परब (Baa Parab)।
  • कुड़ुख / उरांव (Kurukh/Oraon)खद्दी (Khaddi)।
  • खड़िया (Kharia)अमनुआखिया (Amnuakhia)।

इन नामों की विविधता के बावजूद मुख्य भावना एक-सी है: साल के पेड़ और प्रकृति की आराधना।

पर्व का स्थानीय नामसंबंधित जनजाति / समुदायभाषाई मूलमुख्य क्षेत्र
सरहुल (Sarhul)मुंडा, उरांव, हो तथा सदान समुदाय (सामान्य नागपुरी नाम)नागपुरीझारखण्ड, छत्तीसगढ़, असम
खद्दी (Khaddi) / खेखेल बेन्जाउरांव (Oraon)कुंड़ुख (Kurukh)झारखण्ड, ओडिशा
बाहा परब (Baha Parab) / बाहा बोंगासंथाल (Santhal)संथाली (Santali)झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम
बा परब (Baa Parab)मुंडा (Munda), हो (Ho)मुंडारी, होझारखण्ड, ओडिशा
हादी बोंगा (Hadi Bonga)भूमिज (Bhumij)भूमिजझारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा
अमनुआखिया (Amnuakhia)खड़िया (Kharia)खड़ियाझारखण्ड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल

विभिन्न जनजातियों की विशिष्ट अनुष्ठानिक परंपराएं

नामकरण की इस भिन्नता के साथ-साथ, अनुष्ठानों में भी कुछ सूक्ष्म विविधताएं पाई जाती हैं जो प्रत्येक जनजाति की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित करती हैं:

  • उरांव जनजाति (खद्दी): उरांव जनजाति में इसे ‘खद्दी’ कहा जाता है, जिसका कुंड़ुख भाषा में अर्थ ‘फूल’ या ‘नया जन्म’ (Newborn) होता है । उरांव समाज में यह पर्व मुख्य रूप से ‘धरती माता’ (Dhartimata), ‘धर्मेश’ (Dharmesh – सूर्य देवता) और ‘चाला आयो’ (Chala Aayo – पर्यावरण की देवी) की पूजा पर केंद्रित है ।
  • संथाल जनजाति (बाहा परब): भारत की सबसे बड़ी जनजातियों में से एक, संथाल, इसे ‘बाहा परब’ (Baha Parab) के रूप में मनाते हैं। ‘बाहा’ का अर्थ भी फूल होता है। संथाल समुदाय इस अवसर पर साल के फूलों के साथ-साथ ‘महुआ’ (Mahua) के फूलों का भी अनुष्ठानिक उपयोग करता है । यह पर्व ‘जहेरथान’ (Jaherthan – पवित्र उपवन) में मनाया जाता है, जहां ‘मरांग बुरु’ (Marang Buru) और ‘जहेर एरा’ (Jaher Era) की पूजा की जाती है । नायके (Naike – ग्राम पुरोहित) इस पूजा का संचालन करते हैं, जो पूजा से पूर्व उपवास रखते हैं।   
  • हो और मुंडा जनजाति (बा परब): हो और मुंडा जनजातियों में यह ‘बा परब’ या ‘बा पर्व’ कहलाता है। हो समुदाय में यह पर्व देउरी (Dehuri – पुरोहित) के नेतृत्व में मनाया जाता है, जहां ‘देसाउली बोंगा’ (Dessauli Bonga – ग्राम रक्षक देवता) और ‘सिंगबोंगा’ (Singbonga) की पूजा की जाती है । मुंडा समाज में ‘सिंगबोंगा’ (सर्वोच्च सत्ता) की आराधना साल के झुरमुटों में की जाती है ।    

पौराणिक कथाएँ

जनजातीय समाजों में लिखित साहित्य की अपेक्षाकृत कमी के कारण श्रुति-परंपरा (Oral Tradition) और लोककथाएं ही ज्ञान, दर्शन तथा ऐतिहासिक अनुभवों के हस्तांतरण का प्रमुख माध्यम रही हैं। सरहुल के संदर्भ में अनेक सांस्कृतिक कथाएं और पारंपरिक मान्यताएं प्रचलित हैं, जो इसके उद्भव और महत्व को ब्रह्मांडीय (Cosmological) तथा मानवीय दृष्टिकोण से स्पष्ट करती हैं।

सूर्य और पृथ्वी का प्रतीकात्मक विवाह

सरहुल की सबसे प्रमुख और दार्शनिक मान्यता यह है कि यह पर्व ‘सूर्य’ और ‘धरती माता’ के अलौकिक विवाह का प्रतीक है। जनजातीय दर्शन में, सूर्य (सिंगबोंगा या धर्मेश) पुरुष ऊर्जा का और पृथ्वी स्त्री ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है। इन दोनों की युति से ही प्रकृति में नवसृजन, उर्वरता और हरियाली का प्रादुर्भाव होता है। अनुष्ठानिक स्तर पर, ग्राम पुरोहित (पाहन) सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि उसकी पत्नी (पहनाइन) धरती का प्रतिनिधित्व करती है। यह प्रतीकात्मक विवाह इस बात का परिचायक है कि मिट्टी और सूर्य के प्रकाश के मिलन के बिना जीवन, वर्षा और कृषि का चक्र संभव नहीं है। यह केवल एक पारंपरिक विश्वास नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी विज्ञान (Ecological Science) का एक गहन अवलोकन है, जिसे सांस्कृतिक स्वरूप में अभिव्यक्त किया गया है।

बिंदी की कथा: मृत्यु और पुनर्जन्म का चक्रीय स्वरूप

सरहुल के उद्भव से जुड़ी एक अत्यंत मार्मिक सांस्कृतिक कथा ‘बिंदी’ की है। कथा के अनुसार, बिंदी नामक एक प्रफुल्लित बालिका खेलते हुए अचानक पाताल लोक के गहरे अंधकार में गिर गई। उसकी माता, जो स्वयं धरती माता का स्वरूप थीं, ने अपनी इकलौती पुत्री को खोने के शोक में स्वयं को विलाप में डुबो दिया। इस अपार शोक के कारण संसार के सभी वृक्ष मुरझा गए, फूल सूख गए, पक्षियों ने चहचहाना बंद कर दिया और नदियों का प्रवाह रुक गया।

जब पाताल के स्वामी को यह ज्ञात हुआ कि बिंदी को वापस न लौटाने से पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा, तो उसने बिंदी को वर्ष में केवल एक दिन के लिए अपनी माता से मिलने की अनुमति दी। बिंदी के पृथ्वी पर लौटते ही धरती माता के हर्ष से पूरी प्रकृति में पुनः प्राणों का संचार हो गया—वृक्षों पर नए पत्ते आ गए और फूल खिल उठे। यह पुनर्मिलन ही सरहुल के उत्सव का आधार माना जाता है।

विश्लेषणात्मक दृष्टि से यह कथा शीत ऋतु की स्थिरता और वसंत ऋतु के नवजीवन के चक्र को भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप में अभिव्यक्त करती है, जो प्रकृति के पुनर्जागरण (Rebirth) की गहरी समझ को दर्शाती है।

महाभारत काल और साल वृक्ष की मान्यता

एक अन्य प्रचलित जनश्रुति साल वृक्ष के औषधीय और संरक्षण गुणों को प्राचीन काल से जोड़ती है। लोक परंपराओं में इसे महाभारत कालीन घटनाओं से संबंधित बताया जाता है। कथाओं के अनुसार, प्राचीन युद्धों में जो शव साल वृक्ष के पत्तों से ढके गए थे, वे लंबे समय तक सुरक्षित रहे, जबकि अन्य पत्तों से ढके शव शीघ्र नष्ट हो गए।

इस अनुभव ने जनजातीय समुदाय के मन में साल वृक्ष के प्रति गहरी वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक आस्था विकसित की। वास्तव में साल वृक्ष में प्राकृतिक रूप से रोगाणुरोधी (Anti-microbial) और परिरक्षक (Preservative) गुण पाए जाते हैं, जिसे जनजातीय समाज ने अपने अनुभव के आधार पर बहुत पहले पहचान लिया था। यही कारण है कि यह वृक्ष सरहुल जैसे महत्वपूर्ण पर्व के केंद्र में स्थापित हो गया।

अनुष्ठानिक कार्यप्रणाली: तीन दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा

सरहुल का पर्व अमूर्त मान्यताओं को मूर्त अनुष्ठानों में बदलने की एक जटिल और सुव्यवस्थित प्रक्रिया है। यह पर्व सामान्यतः तीन दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें ‘पाहन’ (Pahan – ग्राम पुरोहित) की भूमिका अत्यंत केंद्रीय होती है । पाहन की भूमिका केवल एक कर्मकांडीय नेतृत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक मौसम विज्ञानी (Meteorologist), सामाजिक मध्यस्थ और पारिस्थितिक प्रबंधक के रूप में भी कार्य करता है।   

प्रथम दिन: उपवास, शुद्धिकरण और जल रखाई

पर्व के पहले दिन पाहन पूर्ण रूप से कठोर उपवास रखता है। इस दिन पूरे गांव और विशेषकर ‘सरना स्थल’ (पवित्र उपवन जहां देवताओं का वास माना जाता है) की व्यापक साफ-सफाई की जाती है। घरों को गाय के गोबर और प्राकृतिक मिट्टी से लीपा जाता है ।   

इसी दिन ‘जल रखाई’ (Jal Rakhai) की अत्यंत महत्वपूर्ण रस्म निभाई जाती है। पाहन गांव के अन्य सदस्यों के साथ मांदर, नगाड़ा और ढोल बजाते हुए समीप स्थित नदी या जलस्रोत तक जाता है। वहां वह पूरी पवित्रता के साथ नए मिट्टी के घड़ों में जल भर कर लाता है। इन घड़ों को सरना स्थल पर रात भर के लिए स्थापित कर दिया जाता है । इसी दिन गांव के युवा भी नदियों और खेतों से केकड़े और मछलियां पकड़ने जाते हैं, जो प्रजनन क्षमता (Reproducing ability) और कृषि चक्र की शुरुआत का प्रतीक होते हैं ।   

द्वितीय दिन: मुख्य पूजा, बलि अनुष्ठान और प्रसाद वितरण

दूसरे दिन सरना स्थल पर मुख्य अनुष्ठान आयोजित किया जाता है। पाहन द्वारा साल वृक्ष के पत्तों, फूलों और सिंदूर से ग्राम देवता (सिंगबोंगा/धर्मेश), सरना माता और पूर्वजों की पूजा की जाती है । इस दौरान प्राकृतिक शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न रंगों के मुर्गों की बलि दी जाती है। जनजातीय दर्शन में इन रंगों का अपना विशिष्ट लौकिक और आध्यात्मिक अर्थ होता है:   

मुर्गे का रंगसमर्पित देवता / शक्तिप्रतीकात्मक अर्थ और उद्देश्य
सफेद मुर्गासिंगबोंगा (Singbonga) / धर्मेश / ब्रह्मांड का निर्मातासफेद रंग प्रकाश, पवित्रता और सर्वोच्च सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है
लाल / भूरा मुर्गाग्राम देवता (Village deity) / बुरुबोंगालाल रंग ऊर्जा, रक्त और जीवन के संघर्ष का प्रतीक है। यह गांव की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए है
राख रंग (Ash) का मुर्गापूर्वजों की आत्माएं (Ancestors)पूर्वजों के प्रति सम्मान और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए
काला मुर्गाबुरी आत्माएं (Evil Spirits) / जल देवतागांव को बीमारियों, जंगली जानवरों और बुरी शक्तियों के प्रकोप से बचाने के लिए

बलि अनुष्ठान के पश्चात ‘सूड़ी खिचड़ी’ (Sudi Khichdi) नामक पवित्र प्रसाद बनाया जाता है। यह खिचड़ी चावल, दाल, और बलि दिए गए मुर्गे के मांस को मिलाकर तैयार की जाती है, जिसे गांव के सभी लोगों में वितरित किया जाता है । सूड़ी खिचड़ी के पकने और उसके उबलने की दिशा को भी समुदाय द्वारा शुभ-अशुभ के सूचक के रूप में देखा जाता है ।   

तृतीय दिन: फूल खोंसी और पारिस्थितिक संरक्षण का प्रतीक ‘केकड़ा’

तीसरे दिन ‘फूल खोंसी’ (Phool Khonshi) की रस्म होती है। पाहन हर घर में जाकर सखुआ (साल) के फूल और पवित्र जल का छिड़काव करता है। वह महिलाओं के कानों या बालों में साल का फूल खोंसता है और उन्हें आशीर्वाद देता है । यह क्रिया परिवार की समृद्धि, महिलाओं की प्रजनन क्षमता और घर की सुरक्षा का प्रतीक है । इसके बदले में पाहन को गांव वालों द्वारा कुछ जमीन दी जाती है, जिसे ‘पहनई जमीन’ (Pahnai Jamin) कहा जाता है ।   

इसी दौरान पहले दिन पकड़ा गया ‘केकड़ा’ (Crab) भी अनुष्ठान का हिस्सा बनता है। जीवित केकड़े को साल के पत्तों में लपेटकर पूजा स्थल पर या चूल्हे के पास टांग दिया जाता है। बाद में, आषाढ़ माह में जब धान की बुवाई का समय आता है, तो इस केकड़े का चूर्ण बनाकर उसे बीज और खाद (गोबर) के साथ मिलाकर खेतों में बोया जाता है । विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखा जाए तो, केकड़े स्वभाव से मिट्टी को खोदकर उसे भुरभुरा (Aerate) बनाते हैं। बीज के साथ केकड़े का चूर्ण मिलाने की यह मान्यता कि “केकड़े के पैरों की तरह फसल में भी प्रचुर वृद्धि होगी”, जनजातीय समाज के इस गहरे ज्ञान को दर्शाती है कि मृदा के वातन (Soil aeration) और सूक्ष्म-जैविक उर्वरता (Micro-biological fertility) में जीवों की क्या भूमिका होती है ।  

सरहुल AI generated Image


पारिस्थितिक ज्ञान और वर्जनाएँ

सरहुल के दौरान होने वाले अनुष्ठान केवल आध्यात्मिक नहीं हैं; वे कृषि समाजों के लिए उन्नत स्वदेशी मौसम विज्ञान (Indigenous Meteorology) का कार्य करते हैं।

मिट्टी के घड़ों से वर्षा का अनुमान

‘जल रखाई’ के अगले दिन सुबह पाहन और गांव के बुजुर्ग उन मिट्टी के घड़ों में जल के स्तर का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं। यह प्रक्रिया मानसून के आगमन और वर्षा की मात्रा का सटीक अनुमान लगाने के लिए की जाती है:

  • जल स्तर का समान रहना या छलकना: यदि घड़े में जल का स्तर यथावत रहता है या घड़ा लबालब भरा होता है, तो यह इस बात का संकेत माना जाता है कि आगामी मानसून में अच्छी और प्रचुर वर्षा होगी, जिससे अच्छी फसल होगी ।   
  • जल स्तर में कमी: इसके विपरीत, यदि जल स्तर में कमी आती है, तो यह सूखे या कम वर्षा की भविष्यवाणी मानी जाती है ।   
  • जल की दिशा: जल के छलकने की दिशा से भी वर्षा के आने की दिशा का अनुमान लगाया जाता है ।   
  • तैरती टहनियां: कुछ क्षेत्रों में, पाहन घड़े के पानी की सतह पर दो छोटी टहनियां रखता है। यदि टहनियां एक-दूसरे के करीब आती हैं, तो अच्छी वर्षा का अनुमान लगाया जाता है; यदि वे दूर जाती हैं, तो कम वर्षा की भविष्यवाणी होती है ।   

यह मिट्टी के घड़े की सरंध्रता (Porosity), वाष्पीकरण की दर (Evaporation rate), और वायुमंडलीय आर्द्रता (Atmospheric humidity) के बीच के वैज्ञानिक संबंध का एक स्वदेशी ज्ञान है। यदि हवा में नमी (Humidity) अधिक होती है, तो घड़े से पानी का वाष्पीकरण कम होता है, जो भविष्य में अच्छे मानसून का एक मजबूत संकेतक है।

पशु-पक्षियों के व्यवहार का अवलोकन

जल के अतिरिक्त, जनजातीय समुदाय पक्षियों की विशिष्ट चहचहाहट और सांपों की ध्वनियों का भी विश्लेषण करते हैं। इन ध्वनियों की तीव्रता और आवृत्ति के आधार पर वे मानसून के आगमन और बारिश के स्तर का अनुमान लगाते हैं । यह ज्ञान पीढ़ियों के अनुभव और प्रकृति के साथ गहन तादात्म्य का परिणाम है।  

पारिस्थितिक संरक्षण और वर्जनाएं

आधुनिक पर्यावरणवाद (Environmentalism) भले ही अब ‘सस्टेनेबिलिटी’ और ‘कंजर्वेशन’ की बात करता हो, परंतु सरहुल के माध्यम से जनजातीय समाज सदियों से इन सिद्धांतों को अपने दैनिक जीवन में उतारता आ रहा है । सरहुल केवल उत्सव नहीं है, बल्कि यह एक ‘इकोलॉजिकल सर्वाइवल गाइड’ (Ecological survival guide) है । इस दिशा में उनके द्वारा स्थापित वर्जनाएं (Taboos) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।   

समयबद्ध वर्जनाएं (Temporal Taboos)

सरहुल का सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय संदेश जनजातीय समयबद्ध वर्जनाओं में निहित है। संथाल, मुंडा और उरांव जनजातियों में यह सख्त नियम है कि जब तक सरहुल (या बाहा) का पर्व संपन्न नहीं हो जाता, तब तक जंगल से साल या किसी भी अन्य वृक्ष के नए पत्ते, फूल, फल या लकड़ियां नहीं तोड़ी जाएंगी ।

इस धार्मिक वर्जना के पीछे का वैज्ञानिक और पारिस्थितिक तर्क यह है कि वसंत ऋतु वृक्षों के प्रजनन (Reproduction) और परागण (Pollination) का समय होता है। यदि इसी समय फूलों और नए पत्तों का दोहन कर लिया जाए, तो जंगल का प्राकृतिक पुनर्जनन (Regeneration) बाधित हो जाएगा । जनजातीय लोकगीतों में भी यह चेतावनी दी गई है कि “फूलों वाली शाखाओं को काटने से जीवन नष्ट हो जाएगा”। इन वर्जनाओं को तोड़ने पर दैवीय प्रकोप का भय इस बात को सुनिश्चित करता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण कोई भी वन संपदा का अत्यधिक दोहन न करे।   

स्थानिक वर्जनाएं: सरना स्थल (Spatial Taboos)

सरना स्थल या ‘जहेर थान’ वह पवित्र उपवन होते हैं जहां साल के वृक्षों का झुरमुट होता है और वहां किसी भी प्रकार की व्यावसायिक कटाई या मानवीय हस्तक्षेप पूरी तरह से निषिद्ध होता है । इन उपवनों को संरक्षित रखकर जनजातीय समाज ने अनजाने में ही ऐसे ‘माइक्रो-क्लाइमेट’ (Micro-climate) और जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity hotspots) का निर्माण किया है, जो आधुनिक राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा से कहीं अधिक प्राचीन और प्रभावी हैं ।  

सरहुल का संगीत, नृत्य और वाद्ययंत्र: सांस्कृतिक अभिव्यक्ति

सरहुल का उत्सव अपने विशिष्ट ध्वनिक (Sonic) और गत्यात्मक (Kinetic) स्वरूप के बिना अधूरा है। संगीत और नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये समुदाय को बांधने वाले, सांस्कृतिक कथाओं और परंपराओं को जीवंत बनाए रखने वाले तथा सामूहिक ऊर्जा का संचार करने वाले महत्वपूर्ण अनुष्ठानिक माध्यम हैं।

पारंपरिक वाद्ययंत्र और उनका ध्वनिक विज्ञान

सरहुल के दौरान बजाये जाने वाले वाद्ययंत्र पूरी तरह से स्थानीय प्राकृतिक सामग्रियों से निर्मित होते हैं:

  • मांदर (Mandar): यह एक बेलनाकार ड्रम (Cylindrical drum) है जिसे हाथों से बजाया जाता है। यह जनजातीय संगीत की धड़कन माना जाता है और इसे बनाने में मिट्टी तथा जानवरों की खाल का उपयोग होता है ।   
  • नगाड़ा (Nagara) और ढोल: लकड़ी के बड़े खोल और जानवरों की खींची हुई खाल से बने ये वाद्ययंत्र छड़ियों से पीटे जाते हैं। इनका ध्वनिक विज्ञान ऐसा है कि ग्रीष्म और वसंत ऋतु में इनका स्वर अधिक गुंजायमान और तीव्र होता है, जबकि सर्दियों में इनकी ध्वनि थोड़ी सुस्त पड़ जाती है ।   
  • तुरही (Turhi) और ढाक: इन वायु वाद्ययंत्रों (Aerophones) का उपयोग सामूहिक शोभा यात्राओं और नृत्य के दौरान किया जाता है ।   

नृत्य शैलियां: जादुर, पाइका और झूमर

पूजा अनुष्ठान पूरा होने के पश्चात जब प्रसाद ग्रहण कर लिया जाता है, तब पूरा समुदाय एक साथ नृत्य करता है। इस दौरान मुख्य रूप से जादुर (Jadur), पाइका (Paika), और झूमर (Jhumar) जैसे नृत्य किए जाते हैं ।   

नर्तक वृत्ताकार (Circular) संरचनाओं में एक-दूसरे के हाथ पकड़कर घूमते हैं, जो जीवन के चक्रीय स्वरूप (Cycles of life), समुदाय की अटूट एकता और निरंतरता का प्रतीक है। नर्तक मध्य में वाद्ययंत्र बजाने वाले संगीतकारों (जिन्हें कई जगह ‘कुंजबन’ भी कहा जाता है) के चारों ओर लयबद्ध तरीके से थिरकते हैं ।   

परिधानों का रंग-प्रतीकवाद

सरहुल के दौरान महिलाओं और पुरुषों द्वारा पहने जाने वाले परिधानों के रंगों का भी गहरा अर्थ होता है। महिलाएं विशेष रूप से सफेद रंग की लाल किनारी वाली पारंपरिक साड़ियां पहनती हैं ।   

  • सफेद रंग: यह शांति, पवित्रता, शालीनता और सर्वोच्च देवता ‘सिंगबोंगा’ (Singbonga) का प्रतीक माना जाता है ।   
  • लाल रंग: यह जीवन के संघर्ष, रक्त, ऊर्जा और पहाड़ी देवता ‘बुरुबोंगा’ (Burubonga) का प्रतीक है । यही कारण है कि सरहुल में फहराया जाने वाला ‘सरना झंडा’ भी हमेशा लाल और सफेद रंग का होता है ।   

लोकगीतों की वैचारिकी

इन नृत्यों के साथ गाए जाने वाले लोकगीतों के बोलों में प्रकृति की वंदना और मानवीय प्रेम छिपा होता है। उदाहरण के लिए, कुंड़ुख भाषा का एक पारंपरिक गीत देखिए: “Jambu dahuran laoa, dada! Binario kamon; Ningusan bheja bechon.” (हे मित्र/भाई! जामुन की वह टहनी लाओ, मैं उससे कान का आभूषण बनाऊंगी; और फिर तुम्हारे साथ हाथ में हाथ डालकर नृत्य करूंगी।)   
ये गीत इस तथ्य को स्थापित करते हैं कि जनजातीय समाज अपनी शृंगारिक और भौतिक आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह से वनस्पति पर निर्भर है, और यह निर्भरता शोषण पर नहीं, बल्कि सम्मान और उत्सव पर आधारित है।

पारंपरिक खान-पान

सरहुल का सामुदायिक भोज (Community Feast) समाज में समता और बंधुत्व की भावना को पुष्ट करता है। इस पर्व के दौरान बनाए जाने वाले व्यंजन न केवल स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि स्थानीय कृषि, वन उपज और पोषण पर आधारित होते हैं । इसमें मौसमी विविधता का पूरा ध्यान रखा जाता है।   

प्रमुख व्यंजन (Traditional Foods)विवरण, निर्माण विधि एवं सांस्कृतिक महत्व
हड़िया (Handia) / डियेंगचावल को पारंपरिक जड़ी-बूटियों (रानू) के साथ सड़ाकर (Fermentation) बनाया गया मादक पेय है। सरहुल में इसे सबसे पहले ‘प्रसाद’ के रूप में देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसका सामूहिक सेवन सामाजिक एकता और उल्लास का प्रतीक है ।
धुसका (Dhuska)झारखण्ड का सबसे प्रसिद्ध नाश्ता। इसे चावल और चने की दाल के किण्वित (Fermented) घोल को पीसकर सरसों के तेल में डीप फ्राई करके बनाया जाता है। इसे आलू या चने की पारंपरिक घुघनी के साथ परोसा जाता है
अरसा रोटी (Arsa Roti)चावल के आटे, गुड़ (या गन्ने की चीनी) और सरसों के तेल से बना एक मीठा व्यंजन। यह व्यंजन लंबे समय तक टिकाऊ रहता है और यह अतिथियों के सत्कार का मुख्य हिस्सा है ।
रुगड़ा (Rugda / Puttu)यह एक अत्यंत दुर्लभ और मशरूम है, जो वर्षा ऋतु के आगमन के समय विशेष रूप से साल वृक्षों (Sakhua) की जड़ों के पास प्राकृतिक रूप से उगता है।
सूड़ी खिचड़ी / साउडे (Sudi / Saude)सरहुल पूजा का मुख्य प्रसाद, जिसमें चावल के साथ बलि दिए गए मुर्गे का मांस, दाल और स्थानीय मसालों को ‘सिलबट्टे’ पर पीसकर पारंपरिक चूल्हे पर पकाया जाता है
अन्य व्यंजनफिश सुखा (मछली), चिल्का रोटी, और महुआ के फूल

सरहुल शोभा यात्रा का उदय

मूल रूप से ग्रामीण परिवेश और सरना स्थलों (पवित्र उपवनों) में एक कृषि पर्व के रूप में मनाया जाने वाला सरहुल, आज शहरी परिदृश्य में एक वृहत राजनीतिक और अस्मितावादी आंदोलन (Identity movement) में परिवर्तित हो चुका है । इस परिवर्तन के केंद्र में रांची में आयोजित होने वाली ‘सरहुल शोभा यात्रा’ (Sarhul Procession) का ऐतिहासिक सफर है।   

1961 का भूमि आंदोलन और बाबा कार्तिक उरांव

1961 से पूर्व, सरहुल के अवसर पर किसी भी प्रकार के वृहत जुलूस या शोभा यात्रा का प्रचलन नहीं था। लोग केवल अपने-अपने गांवों के सरना स्थलों पर ही पूजा और नृत्य करते थे । 1961 में एक ऐतिहासिक घटना घटी। रांची के सिरम टोली (Siram Toli) स्थित सरना स्थल की भूमि को एक व्यवसायी द्वारा अवैध रूप से खरीदा गया और वहां निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया, जो कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) का खुला उल्लंघन था ।   

जब स्थानीय आदिवासियों (जैसे शिवा बाड़ा) ने इस अतिक्रमण का विरोध किया, तो प्रशासन और पुलिस ने उल्टे आदिवासियों के खिलाफ ही FIR दर्ज कर उन्हें जेल में डाल दिया । इस अन्याय के खिलाफ और अपनी पवित्र भूमि की रक्षा के लिए, करम टोली (Karam Toli) और आसपास के जनजातीय युवाओं ने संगठित होना शुरू किया। इसी समय, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर लंदन से लौटे प्रख्यात आदिवासी नेता और एचईसी (HEC) के सिविल इंजीनियर बाबा कार्तिक उरांव (Kartik Oraon) ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया ।   

कार्तिक उरांव के नेतृत्व में हैतमा (Hatma) और करम टोली से लेकर सिरम टोली सरना स्थल तक एक विशाल ‘शोभा यात्रा’ (Procession) निकाली गई । यह पहली शोभा यात्रा न केवल एक धार्मिक जुलूस थी, बल्कि यह भूमि अधिकारों (Land rights), सामाजिक न्याय और आदिवासी प्रतिरोध का एक शांतिपूर्ण लेकिन शक्तिशाली शक्ति-प्रदर्शन था । यहीं से सरहुल एक गांव के पर्व से एक शहरी राजनीतिक मंच में तब्दील हो गया।   

डॉ. रामदयाल मुंडा द्वारा सांस्कृतिक पुनर्जागरण

कार्तिक उरांव द्वारा रोपे गए इस प्रतिरोध के बीज को आगे चलकर प्रख्यात शिक्षाविद्, मानवशास्त्री और बाद में पद्मश्री से सम्मानित डॉ. रामदयाल मुंडा (Dr. Ramdayal Munda) ने सींचा। जब डॉ. मुंडा 1981 में अमेरिका से भारत लौटे, तो उन्होंने देखा कि जनजातीय समुदाय अपनी ही संस्कृति को लेकर हीनभावना का शिकार हो रहा था ।   

डॉ. मुंडा ने सरहुल शोभा यात्रा को आदिवासी संस्कृति, वेशभूषा, और कला के भव्य प्रदर्शन का मंच बना दिया। वे स्वयं पारंपरिक वाद्ययंत्र (मांदर) लेकर रांची की सड़कों पर उतरे और लोगों को इस जुलूस में शामिल होने के लिए प्रेरित किया । उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप, सरहुल शोभा यात्रा पूरे विश्व में एक जीवंत और गरिमामय जुलूस के रूप में प्रसिद्ध हो गई। आज यह शोभा यात्रा झारखण्ड की धरोहर और जनजातीय स्वाभिमान (Self-esteem) का परम प्रतीक बन चुकी है ।  

वैश्वीकरण, जलवायु परिवर्तन और भविष्य की चुनौतियां

आधुनिकरण, वैश्वीकरण और शहरीकरण के बढ़ते दबाव ने सरहुल के पारंपरिक स्वरूप के समक्ष कई संरचनात्मक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं:

  1. आधुनिक संगीत और संस्कृति का अतिक्रमण: शोभा यात्राओं में युवा पीढ़ी अब पारंपरिक वाद्ययंत्रों (मांदर, ढोल) के स्थान पर उच्च डेसिबल वाले डीजे (DJ) और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक संगीत की ओर आकर्षित हो रही है । यद्यपि वरिष्ठ नेता और सामाजिक कार्यकर्ता पारंपरिक वाद्ययंत्रों और वेशभूषा के उपयोग को अनिवार्य करने का आग्रह कर रहे हैं, परंतु यह सांस्कृतिक क्षरण (Cultural degradation) एक स्पष्ट चुनौती है ।   
  2. जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक संकट: अनियोजित शहरीकरण, वनों की कटाई (Deforestation) और खनन गतिविधियों के कारण साल के जंगल और पवित्र सरना स्थल तेजी से सिकुड़ रहे हैं । जिन पेड़ों की पूजा की जाती है, यदि उनका ही भौतिक अस्तित्व खतरे में पड़ जाए, तो यह पर्व अपनी मूल आत्मा खो देगा । यह एक विरोधाभास है कि जो समुदाय पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है, वही जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा शिकार बन रहा है ।   
  3. पारिस्थितिक नारीवाद (Eco-feminism) का उभरता विमर्श: आधुनिक विमर्श में सरहुल को ‘इको-फेमिनिज्म’ के चश्मे से भी देखा जा रहा है। जनजातीय महिलाएं प्रकृति संरक्षण में सबसे आगे रहती हैं, लेकिन वैश्वीकरण के दौर में उन्हें उनके ही भूमि अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। सरहुल का पर्व महिलाओं को पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न अंग बनाने और उन्हें उनके प्रयासों का श्रेय देने की वकालत करता है ।   
  4. संरक्षण के वैश्विक प्रयास: इन सभी चुनौतियों के मध्य, राजनीतिक और बौद्धिक स्तर पर इसे सहेजने के प्रयास भी तेज हुए हैं। दिसंबर 2025 में, राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार ने सरहुल को यूनेस्को (UNESCO) की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) सूची में शामिल करने की मजबूत वकालत की है, ताकि इस अनूठी धरोहर को वैश्विक स्तर पर मान्यता और संरक्षण प्राप्त हो सके । इसके अतिरिक्त, ‘सरहुल पेंटिंग्स’ (Sarhul Paintings) जैसी पारंपरिक कलाएं—जो प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती हैं और प्रकृति के दृश्यों को दर्शाती हैं—अब व्यावसायिक रूप से भी लोकप्रिय हो रही हैं, जिससे कलाकारों को आर्थिक संबल मिल रहा है ।    

निष्कर्ष

सरहुल पर्व हमें याद दिलाता है कि मानव और प्रकृति का संबंध मात्र सहजीवन नहीं, बल्कि एक दूसरे के पूरक अस्तित्व पर आधारित है। यह पर्व भारतीय आदिवासी समुदायों की प्रकृति विज्ञान जैसी परंपराओं का जीवंत उदाहरण है, जिसमें पेड़-पौधों के कल्याण, कृषि चक्र और सामाजिक व्यवस्था सब जुड़ी हुई है। एक ओर जहां यह पर्व सूर्य और पृथ्वी के विवाह और बिंदी की कथा के प्रतीकों के माध्यम से ब्रह्मांडीय चक्रों के प्रति गहरी समझ को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर, इसके मूर्त अनुष्ठान—जैसे मिट्टी के घड़ों से वर्षा की सटीक भविष्यवाणी करना, केकड़ों का जैविक खाद के रूप में कृषि में उपयोग, और फूलों के प्रस्फुटन तक वनोपज के दोहन पर कठोर वर्जना—यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध करते हैं कि जनजातीय समाज का ज्ञान प्रकृति के साथ विनाशकारी संघर्ष पर नहीं, बल्कि उसके साथ सतत साहचर्य (Sustainable coexistence) पर आधारित है ।    

सरहुल हमें यह सिखाता है कि मानव जाति का भविष्य कंक्रीट के जंगलों और आधुनिक तकनीक के अंधानुकरण में नहीं है, बल्कि उन जड़ों की ओर लौटने में है जो हमें यह एहसास कराती हैं कि “प्रकृति ही परम सत्ता है” और हम इसके स्वामी नहीं, बल्कि इसके एक छोटे से अंश मात्र हैं। सरहुल के इन मूल्यों को सहेजना केवल एक समुदाय या क्षेत्र की संस्कृति को बचाना नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण पृथ्वी और मानव सभ्यता के संरक्षण की दिशा में एक अपरिहार्य और अनिवार्य कदम है ।   

सरहुल पर्व

बिरसा मुंडा : जनजातीय चेतना और स्वतंत्रता संग्राम के महानायक [Link]

GOVERNMENT OF JHARKHAND Official website of the State ‘Jharkhand Festivals’ [Link]

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