दर्शनशास्त्र के इतिहास में हीगेल (Hegel) और मार्क्स (Karl Marx) दो ऐसे विचारक हैं जिन्होंने समाज, इतिहास और परिवर्तन की प्रक्रिया को गहराई से समझाया।
हीगेल ने “विचारों के द्वन्द्व” (Dialectics of Ideas) पर बल दिया, जबकि मार्क्स ने इसे “भौतिक वास्तविकताओं के द्वन्द्व” (Dialectics of Material Conditions) के रूप में पुनः परिभाषित किया।
इस लेख में आप जानेंगे कि मार्क्स ने हीगेल के दर्शन से क्या अपनाया, क्या अस्वीकार किया, और कैसे दोनों की विचारधाराओं ने आधुनिक समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र की नींव रखी।
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1. मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का मूल आधार क्या है?
(a) राजनीति
(b) विचारधारा
(c) आर्थिक संरचना
(d) धर्म
उत्तर: (c) आर्थिक संरचना
व्याख्या:
कार्ल मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) को समाज के विकास की वैज्ञानिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया।
उनके अनुसार —
- समाज का वास्तविक आधार (Base) उसकी आर्थिक संरचना (Economic Structure) होती है।
- यह आर्थिक आधार उत्पादन शक्तियों (Forces of Production) और उत्पादन संबंधों (Relations of Production) से मिलकर बनता है।
- जब इन दोनों में विरोध (Contradiction) उत्पन्न होता है, तब वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) पैदा होता है।
- यही संघर्ष सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारण बनता है।
अतः मार्क्स के अनुसार —
“It is not the consciousness of men that determines their being, but their social being that determines their consciousness.”
— Karl Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)
“मनुष्य का अस्तित्व उसके चेतन (विचार) से निर्धारित नहीं होता, बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना (विचारधारा) को निर्धारित करता है।”
— कार्ल मार्क्स, ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र की समीक्षा की भूमिका’ (1859)इस कथन से स्पष्ट है कि समाज का आधार भौतिक (आर्थिक) होता है, न कि वैचारिक या धार्मिक।
2. मार्क्स ने हीगेल से कौन सा सिद्धांत उधार लिया?
(a) भौतिक वस्तुओं की प्राथमिकता
(b) द्वन्द्व की विधि और प्रक्रिया
(c) उत्पादन सम्बन्धों का महत्त्व
(d) मजदूर क्रांति का सिद्धांत
उत्तर: (b) द्वन्द्व की विधि और प्रक्रिया
व्याख्या:
जर्मन दार्शनिक G.W.F. Hegel (1770–1831) ने Dialectics (द्वन्द्वात्मक विधि) को इतिहास और विचार की गति का सिद्धांत बताया था।
- हीगेल के अनुसार, विचार (Idea या Spirit) ही वास्तविकता का मूल है।
- विकास विचारों के द्वन्द्व (Contradiction of Ideas) के माध्यम से होता है —
थीसिस (Thesis) → एंटीथीसिस (Antithesis) → सिंथेसिस (Synthesis)मार्क्स ने हीगेल की द्वन्द्वात्मक विधि (Dialectical Method) को स्वीकार किया, लेकिन उसका भौतिकवादी रूपांतरण (Materialist Transformation) किया।
मार्क्स ने कहा —
“My dialectical method is not only different from the Hegelian, but is its direct opposite.”
— Karl Marx, Afterword to the Second German Edition of Das Kapital (1873)
“मेरी द्वन्द्वात्मक विधि (Dialectical Method) हीगेल की विधि से न केवल भिन्न है, बल्कि उसका ठीक विपरीत (पूरा उल्टा) रूप है।”
— कार्ल मार्क्स, दास कैपिटल के जर्मन संस्करण की भूमिका (1873)अर्थात् —
- हीगेल के लिए द्वन्द्व विचारों के भीतर था,
- जबकि मार्क्स के लिए द्वन्द्व भौतिक जीवन की आर्थिक परिस्थितियों के भीतर था।
इसलिए मार्क्स ने हीगेल की विधि तो रखी, पर उसका आदर्शवादी आधार उलटकर भौतिकवादी आधार बना दिया।
3. हीगेल के अनुसार ऐतिहासिक परिवर्तन की प्रक्रिया का मूल कारण क्या है?
(a) भौतिक उत्पादन और श्रम
(b) मनुष्य की चेतना, संकल्प शक्ति और आत्मा
(c) वर्ग-संघर्ष
(d) आर्थिक आधार
उत्तर: (b) मनुष्य की संकल्प शक्ति (Will) और आत्मा (Spirit)
व्याख्या:
G.W.F. Hegel (1770–1831) के अनुसार, इतिहास का विकास विचार (Idea) या आत्मा (Spirit / Geist) के भीतर होने वाले द्वन्द्व (Dialectical Process) के कारण होता है।
- हीगेल का दर्शन आदर्शवादी (Idealist) था।
- उनके अनुसार, मानव चेतना, आत्मा और संकल्प शक्ति (Will) — ये ही वास्तविकता और परिवर्तन के मूल स्रोत हैं।
- यह आत्मा निरंतर विरोधों (Contradictions) को सुलझाते हुए आगे बढ़ती है —
थीसिस → एंटीथीसिस → सिंथेसिस की प्रक्रिया के माध्यम से।- इसी प्रक्रिया में “विश्व-आत्मा” (World Spirit) आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) प्राप्त करती है।
अतः, हीगेल के अनुसार इतिहास का विकास भौतिक कारणों से नहीं, बल्कि विचार और आत्मा की द्वन्द्वात्मक गति से होता है।
“The history of the world is the progress of the consciousness of freedom.”
— Hegel, Philosophy of History
“विश्व का इतिहास स्वतंत्रता की चेतना की प्रगति की कहानी है।”
— हीगेल, इतिहास का दर्शन
4. मार्क्स ने हीगेल के द्वन्द्वात्मक दर्शन को किस प्रकार संशोधित किया?
(a) उसने संकल्प और आत्मा को प्राथमिक माना
(b) बाहरी भौतिक वास्तविकता को बदलने पर जोर दिया
(c) द्वन्द्व की प्रक्रिया को केवल राज्य की स्थापना तक सीमित किया
(d) विचारों और धर्म को ही प्रमुख माना
उत्तर: (b) बाहरी भौतिक वास्तविकता को बदलने पर जोर दिया
व्याख्या:
कार्ल मार्क्स ने हीगेल के द्वन्द्वात्मक दर्शन (Hegelian Dialectics) को स्वीकार किया,
लेकिन उसकी आदर्शवादी (Idealist) दिशा को पूरी तरह भौतिकवादी (Materialist) दिशा में बदल दिया।हीगेल के अनुसार —
- वास्तविकता का आधार “विचार” या “आत्मा” है।
- इतिहास का विकास विचारों के द्वन्द्व (Contradiction of Ideas) के माध्यम से होता है।
लेकिन मार्क्स ने कहा —
“It is not the consciousness of men that determines their being, but their social being that determines their consciousness.”
“हीगेल का द्वन्द्व विचारों में चलता है,
जबकि मार्क्स का द्वन्द्व भौतिक जीवन में चलता है।”यानि —
- वास्तविकता का आधार भौतिक परिस्थितियाँ (Material Conditions) हैं।
- जब आर्थिक संरचना (Economic Structure) में विरोध (Contradiction) उत्पन्न होता है — जैसे उत्पादन शक्तियों और उत्पादन संबंधों के बीच —
तब समाज में परिवर्तन होता है।इस प्रकार मार्क्स ने हीगेल की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को ‘आकाश से धरती पर उतार दिया’ —
अर्थात् विचारों के द्वन्द्व को बदलकर भौतिक जीवन के द्वन्द्व में परिवर्तित कर दिया।
5. मार्क्स के अनुसार हीगेल के “Philosophy of Right” में द्वन्द्व की प्रक्रिया किसके माध्यम से वर्णित है?
(a) आर्थिक संघर्ष
(b) संकल्प और राज्य
(c) मजदूर और मालिक के संघर्ष
(d) तकनीकी विकास
उत्तर: (b) संकल्प (Will) और राज्य
व्याख्या:
जी. डब्ल्यू. एफ. हीगेल ने अपनी कृति “Philosophy of Right” (1820) में यह प्रतिपादित किया कि —
- मानव इतिहास का विकास संकल्प (Will) की स्वतंत्रता की प्राप्ति की प्रक्रिया है।
- यह स्वतंत्र संकल्प (Free Will) क्रमशः परिवार → नागरिक समाज → राज्य के माध्यम से अपनी पूर्णता प्राप्त करता है।
- अंततः राज्य ही “वास्तविक नैतिक जीवन” (Realization of Ethical Life) का सर्वोच्च रूप है।
अर्थात् हीगेल के अनुसार —
“The State is the actuality of the ethical Idea.”
(“राज्य नैतिक विचार का वास्तविक रूप है।”)लेकिन कार्ल मार्क्स ने हीगेल की इस धारणा की तीखी आलोचना की।
उन्होंने कहा कि हीगेल ने वास्तविक भौतिक परिस्थितियों की बजाय विचार (Idea) को सर्वोपरि मान लिया है।मार्क्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Critique of Hegel’s Philosophy of Right” (1843) में कहा —
“Hegel inverted reality; he made the idea the subject and the real world its predicate.”
(“हीगेल ने वास्तविकता को उलट दिया — उन्होंने विचार को मूल तत्व बना दिया और वास्तविक संसार को उसका परिणाम बना दिया।”)मार्क्स के अनुसार —
- सामाजिक विकास का आधार भौतिक परिस्थितियाँ (Material Conditions) और आर्थिक संबंध (Economic Relations) हैं,
न कि केवल संकल्प या राज्य की नैतिक अवधारणाएँ।हीगेल के लिए — इतिहास संकल्प (Will) की स्वतंत्रता का विकास है।
मार्क्स के लिए — इतिहास भौतिक उत्पादन और वर्ग-संघर्ष का परिणाम है।
6. हीगेल के अनुसार समाज में परिवर्तन के लिए कौन आवश्यक है?
(a) उत्पादन सम्बन्ध
(b) संकल्प में परिवर्तन
(c) आर्थिक शक्ति
(d) राजनीति
उत्तर: (b) संकल्प (Will) में परिवर्तन
व्याख्या:
हीगेल (G.W.F. Hegel) एक आदर्शवादी दार्शनिक (Idealist Philosopher) थे।
उनके अनुसार, समाज या इतिहास में परिवर्तन का मूल कारण विचारों (Ideas) और संकल्प (Will) का विकास है —
न कि भौतिक या आर्थिक परिस्थितियाँ।उन्होंने कहा कि —
“The real is the rational and the rational is the real.”
(“जो वास्तविक है, वह तर्कसंगत है, और जो तर्कसंगत है, वह वास्तविक है।”)अर्थात् —
जब मानव की चेतना (Consciousness) और संकल्प (Will) बदलते हैं, तभी समाज में नये विचार, नयी संस्थाएँ और नये नैतिक ढाँचे जन्म लेते हैं।हीगेल का यह परिवर्तन द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया (Dialectical Process) पर आधारित है —
जिसमें तीन चरण होते हैं:
- थीसिस (Thesis) – वर्तमान स्थिति या विचार।
- एंटीथीसिस (Antithesis) – उसके विपरीत विचार या प्रतिक्रिया।
- सिंथेसिस (Synthesis) – दोनों के संघर्ष से उत्पन्न नई स्थिति या विचार।
इस प्रकार, समाज में हर परिवर्तन —
पहले विचारों के स्तर पर होता है,
और बाद में वास्तविक जीवन में प्रकट होता है।हीगेल के अनुसार —
“सामाजिक परिवर्तन पहले मनुष्य की चेतना और संकल्प में होता है, फिर वह बाहरी समाज में दिखता है।”तुलनात्मक टिप्पणी:
दृष्टिकोण हीगेल (Idealism) मार्क्स (Materialism) परिवर्तन का मूल विचार और संकल्प (Will) भौतिक परिस्थितियाँ (Material Conditions) द्वन्द्व का स्वरूप विचारों के बीच उत्पादन सम्बन्धों के बीच परिणाम आत्मा या विचार की स्वतंत्रता वर्गहीन समाज
7. हीगेल के द्वन्द्वात्मक विकास में “वाद, प्रतिवाद और संवाद” का क्या अर्थ है?
(a) समाज में उत्पादन, श्रम और वर्ग संघर्ष
(b) विचारों की प्रक्रिया और उच्चतम एकता की प्राप्ति
(c) आर्थिक विकास की गति
(d) राज्य और कानून की स्थिरता
उत्तर: (b) विचारों की प्रक्रिया और उच्चतम एकता की प्राप्ति
व्याख्या:
जी. डब्ल्यू. एफ. हीगेल के अनुसार —
मानव इतिहास और विचारों का विकास द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया (Dialectical Process) के माध्यम से होता है।
यह प्रक्रिया “विरोधाभासों के संघर्ष” (Conflict of Opposites) पर आधारित है, जिसके तीन चरण होते हैं
- वाद (Thesis):
किसी विचार या स्थिति का प्रारंभिक रूप।
उदाहरण — “स्वतंत्रता आवश्यक है।”- प्रतिवाद (Antithesis):
उसी विचार का विरोध या विरोधाभास।
उदाहरण — “पूर्ण स्वतंत्रता अराजकता पैदा करती है।”- संवाद (Synthesis):
दोनों विरोधी विचारों का समन्वय — जहाँ नया, उच्चतर विचार जन्म लेता है।
उदाहरण — “नियमों के भीतर स्वतंत्रता।”हीगेल के अनुसार यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है, और प्रत्येक संवाद (Synthesis) अगले वाद (Thesis) में बदल जाता है।
इस प्रकार, इतिहास और विचारों की प्रगति “आत्मा की आत्म-साक्षात्कार प्रक्रिया” (Self-Realization of Spirit) बन जाती है।हीगेल ने कहा कि —
“हर विचार अपने भीतर विरोध को जन्म देता है, और इस विरोध से एक नया और उच्चतर सत्य उत्पन्न होता है।”इसका अर्थ है कि समाज और विचार दोनों ही विरोधों के समन्वय से विकसित होते हैं।
अतिरिक्त टिप्पणी:
चरण हिन्दी नाम व्याख्या Thesis वाद मूल विचार या स्थिति Antithesis प्रतिवाद उसके विरोध में उत्पन्न विचार Synthesis संवाद दोनों विचारों का समन्वय और नया विकास
8. मार्क्स ने हीगेल के द्वन्द्ववाद को किस दृष्टिकोण से बदल दिया?
(a) आदर्शवादी से भौतिकवादी दृष्टिकोण
(b) आर्थिक दृष्टिकोण को त्यागकर केवल विचारों पर जोर
(c) राज्य और कानून को मुख्य आधार माना
(d) संकल्प की अभिव्यक्ति को प्राथमिक मानना
उत्तर: (a) आदर्शवादी से भौतिकवादी दृष्टिकोण
व्याख्या:
जी. डब्ल्यू. एफ. हीगेल का द्वन्द्ववाद (Dialectic) आदर्शवादी (Idealist) था।
उनके अनुसार —
विश्व का वास्तविक आधार विचार (Idea) या आत्मा (Spirit) है,
और भौतिक संसार उसकी अभिव्यक्ति मात्र है।कार्ल मार्क्स ने इस दृष्टिकोण को उलट दिया (Inverted Hegel)।
उन्होंने कहा कि —
वास्तविकता का आधार भौतिक जीवन (Material Life) है,
और विचार केवल उसी का प्रतिबिंब (Reflection) हैं।मार्क्स के शब्दों में —
“My dialectical method is not only different from the Hegelian, but is its direct opposite.”
— Karl Marx, Afterword to the Second German Edition of Das Kapital (1873)
“मेरा द्वन्द्वात्मक तरीका हीगेल के तरीके से केवल भिन्न ही नहीं, बल्कि उसका पूर्णतः विपरीत है।”अर्थात् —
हीगेल ने द्वन्द्व को विचारों के स्तर पर देखा,
जबकि मार्क्स ने उसे भौतिक जीवन और उत्पादन संबंधों के स्तर पर समझाया।मार्क्स ने कहा —
“It is not the consciousness of men that determines their being, but their social being that determines their consciousness.”
— Karl Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)
“मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना को निर्धारित करता है।”
हीगेल का दृष्टिकोण मार्क्स का दृष्टिकोण आदर्शवादी (Idealist) भौतिकवादी (Materialist) विचार ही वास्तविकता का मूल भौतिक जीवन वास्तविकता का आधार परिवर्तन विचारों के द्वन्द्व से परिवर्तन उत्पादन सम्बन्धों के द्वन्द्व से आत्मा का विकास समाज का विकास नोट :
Hegel: “Reality is the product of mind.”
Marx: “Mind is the product of material conditions.”
9. हीगेल के अनुसार किस प्रक्रिया में निषेध (Negation) का कार्य शामिल है?
(a) उत्पादन और श्रम
(b) विचारों और अवधारणाओं का विकास
(c) मजदूर और पूंजीपति का संघर्ष
(d) राज्य और कानून का निर्माण
उत्तर: (b) विचारों और अवधारणाओं का विकास
व्याख्या:
जी. डब्ल्यू. एफ. हीगेल ने अपने द्वन्द्वात्मक दर्शन (Dialectical Philosophy) में निषेध (Negation) को एक सृजनात्मक प्रक्रिया (Creative Process) के रूप में समझाया।हीगेल के अनुसार —
“All development involves negation.”
(“हर विकास में निषेध की प्रक्रिया निहित होती है।”)अर्थात् —
हर विचार (Thesis) अपने भीतर एक विरोध (Antithesis) को जन्म देता है,
जो पुराने विचार का निषेध (Negation) करता है।
परंतु यह निषेध विनाशकारी नहीं बल्कि रचनात्मक (Creative) होता है,
क्योंकि यह विरोध नए, उच्चतर विचार (Synthesis) की ओर ले जाता है।उदाहरण के लिए:
- Thesis: स्वतंत्रता आवश्यक है।
- Antithesis: पूर्ण स्वतंत्रता अराजकता है।
- Synthesis: नियमों के भीतर स्वतंत्रता।
यह “निषेध” (Negation) पुराने विचार को मिटाता नहीं, बल्कि उसे उच्चतर रूप में समाहित (Sublation / Aufhebung) कर देता है।
हीगेल ने इस प्रक्रिया को “Negation of the Negation” कहा —
जो विकास की निरंतर और सर्पिल (spiral) प्रक्रिया को दर्शाता है।हीगेल के अनुसार —
“विकास का अर्थ है पुराने विचारों का निषेध करके नये, अधिक सशक्त विचारों का निर्माण करना।”
यह निषेध विचारों के संघर्ष और समन्वय की प्रक्रिया है,
जो अंततः “आत्मा” या “विचार” की उच्चतर अवस्था को जन्म देती है।
10. मार्क्स के अनुसार हीगेल के द्वन्द्व से क्या मुख्य सिद्धांत लिया गया?
(a) विचारों का द्वन्द्व वास्तविकता को तय करता है
(b) संघर्ष के माध्यम से समाज बदलता है
(c) संकल्प और आत्मा ही समाज का मूल आधार हैं
(d) राज्य की स्थायित्वता सर्वोपरि है
उत्तर: (b) संघर्ष के माध्यम से समाज बदलता है
व्याख्या:
कार्ल मार्क्स ने हीगेल के द्वन्द्ववाद (Hegelian Dialectic) से उसकी विधि (Method) को ग्रहण किया,
लेकिन उसकी वस्तु (Substance) को पूरी तरह बदल दिया।हीगेल के अनुसार —
द्वन्द्व (Dialectic) विचारों (Ideas) और आत्मा (Spirit) के संघर्ष के माध्यम से होता है।मार्क्स के अनुसार —
द्वन्द्व भौतिक जीवन (Material Life) और उत्पादन सम्बन्धों (Relations of Production) के संघर्ष के माध्यम से होता है।उन्होंने लिखा —
“My dialectical method is different from the Hegelian dialectic; it is its direct opposite.”
— Karl Marx, Afterword to the Second German Edition of Das Kapital (1873)
“मेरा द्वन्द्वात्मक तरीका हीगेल के तरीके से भिन्न ही नहीं, बल्कि उसका सीधा विपरीत है।”अर्थात् —
मार्क्स ने हीगेल से संघर्ष (Conflict) की प्रक्रिया को तो स्वीकार किया,
परन्तु उसे भौतिक आधार (Material Base) पर रखा, जहाँ वर्गों के बीच टकराव (Class Conflict) से समाज में परिवर्तन आता है।इस प्रकार, हीगेल का “विचारों का द्वन्द्व” मार्क्स के यहाँ “आर्थिक और वर्गीय द्वन्द्व” बन गया।
हीगेल ने कहा — विचारों के संघर्ष से परिवर्तन होता है।
मार्क्स ने कहा — वर्गों के संघर्ष (Class Struggle) से समाज बदलता है।इसलिए मार्क्स का द्वन्द्व भौतिकवादी (Materialist) है, न कि आदर्शवादी (Idealist)।
मुख्य तुलना:
दृष्टिकोण हीगेल मार्क्स दर्शन का प्रकार आदर्शवाद (Idealism) भौतिकवाद (Materialism) द्वन्द्व का आधार विचारों में संघर्ष वर्गों में संघर्ष परिवर्तन का स्रोत आत्मा या चेतना उत्पादन सम्बन्ध और आर्थिक आधार लक्ष्य आत्मा की स्वतंत्रता वर्गहीन समाज की स्थापना
11. हीगेल के अनुसार अध्यात्मिक प्रक्रिया का चरम लक्ष्य क्या है?
(a) उत्पादन का विकास
(b) सामाजिक संघर्ष
(c) व्यक्ति की मुक्ति
(d) आर्थिक स्वतंत्रता
उत्तर: (c) व्यक्ति की मुक्ति (Liberation)
व्याख्या:
हीगेल (G.W.F. Hegel) के अनुसार सम्पूर्ण इतिहास और विचार की गति एक “आध्यात्मिक प्रक्रिया” (Spiritual Process) है —
जिसका अंतिम लक्ष्य है:आत्मा (Spirit) का स्वयं को जानना और अपनी पूर्ण स्वतंत्रता (Freedom) की चेतना प्राप्त करना।हीगेल कहते हैं —
“The history of the world is the progress of the consciousness of freedom.”
— Hegel, Philosophy of History
“विश्व का इतिहास स्वतंत्रता की चेतना की प्रगति का इतिहास है।”अर्थात् —
जब व्यक्ति अपने और बाहरी जगत (Objective World) के बीच द्वन्द्व को समझता है,
तो वह अपनी आत्मा (Spirit) के उच्चतर रूप तक पहुँचता है —
और यही प्रक्रिया “मुक्ति” (Liberation) या “स्वतंत्रता की अनुभूति” (Realization of Freedom) कहलाती है।मुख्य विचार:
- हीगेल के अनुसार वास्तविकता (Reality) कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि आत्मा की गति (Movement of Spirit) है।
- यह आत्मा अपने विकास के विभिन्न चरणों —
- आत्मा (Spirit),
- आत्म-चेतना (Self-Consciousness),
- और परम आत्मा (Absolute Spirit) —
के माध्यम से पूर्ण स्वतंत्रता (Absolute Freedom) प्राप्त करती है।- जब आत्मा स्वयं को और समाज को एकता में देखती है, तो वह मुक्त (Liberated) हो जाती है।
हीगेल के ग्रंथ
- Phenomenology of Spirit (1807)
- Philosophy of History (1837)
- Philosophy of Right (1820)
इनमें हीगेल ने स्पष्ट किया है कि “स्वतंत्रता” ही आत्मा की अंतिम उपलब्धि है।
हीगेल के अनुसार मनुष्य का अध्यात्मिक विकास तभी पूर्ण होता है,
जब वह यह समझता है कि —“मैं और समाज, दोनों एक ही सार्वभौमिक आत्मा (Universal Spirit) के भाग हैं।”इस बोध से ही मनुष्य मुक्ति (Liberation) या स्वतंत्रता (Freedom) को प्राप्त करता है।
नोट :
विचारक अंतिम लक्ष्य माध्यम दर्शन का स्वरूप हीगेल आत्मा की मुक्ति / स्वतंत्रता की चेतना द्वन्द्वात्मक विचार प्रक्रिया आदर्शवाद (Idealism) मार्क्स वर्गहीन समाज / आर्थिक मुक्ति वर्ग संघर्ष और भौतिक द्वन्द्व भौतिकवाद (Materialism)
12. हीगेल के दृष्टिकोण में व्यक्ति की “दोहरी पहचान (Double Identity)” क्या है?
(a) पूँजीपति और मजदूर
(b) अध्यात्मिक और वस्तुनिष्ठ
(c) राज्य और कानून
(d) उत्पादन और विनिमय
उत्तर: (b) अध्यात्मिक और वस्तुनिष्ठ
व्याख्या:
हीगेल (G.W.F. Hegel) के अनुसार मनुष्य (Individual) केवल एक भौतिक या जैविक अस्तित्व नहीं है,
बल्कि वह एक “द्वैत इकाई” (Dual Being) है —
जिसकी पहचान दो स्तरों पर होती है:
- अध्यात्मिक (Spiritual / Subjective) —
यह वह पक्ष है जहाँ व्यक्ति स्वयं को एक चेतन सत्ता (Conscious Being) के रूप में अनुभव करता है।
यहाँ “मैं” (Self) आत्मा, विचार और संकल्प का प्रतिनिधित्व करता है।- वस्तुनिष्ठ (Objective / Material) —
यह वह पक्ष है जहाँ व्यक्ति समाज, राज्य, परिवार और संस्थाओं के माध्यम से स्वयं को बाहरी जगत में व्यक्त करता है।
यह “मैं” समाज का अंग बनकर अपनी स्वतंत्रता को वास्तविकता देता है।हीगेल के अनुसार —
“Spirit is both subjective and objective; it realizes itself through the world.”
“आत्मा (Spirit) एक साथ व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) और वस्तुनिष्ठ (Objective) दोनों है;
वह स्वयं को विश्व के माध्यम से साकार करती है।”इस प्रकार, मनुष्य की दोहरी पहचान ही द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया (Dialectical Process) का मूल है —
क्योंकि व्यक्ति स्वयं को आत्मिक रूप से समझते हुए बाहरी जगत से टकराता है, और यही संघर्ष विकास (Development) को जन्म देता है।
पहचान स्वरूप परिणाम अध्यात्मिक पहचान आत्मा, विचार, चेतना आत्म-जागरूकता (Self-consciousness) वस्तुनिष्ठ पहचान समाज, राज्य, नैतिक जीवन आत्म-साकारता (Self-realization) हीगेल मानते हैं कि व्यक्ति के भीतर दो स्तर पर पहचान होती है —
एक “अंदर की आत्मा” जो सोचती और समझती है,
और दूसरी “बाहरी दुनिया में प्रकट आत्मा” जो समाज और राज्य के रूप में कार्य करती है।
इन्हीं दोनों के बीच का संतुलन ही द्वन्द्व (Dialectic) का मूल तत्व है।“Man is the unity of the subjective and the objective spirit.”
— Hegel, Philosophy of Mind
“मनुष्य व्यक्तिनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ आत्मा की एकता है।”
13. मार्क्स ने हीगेल के द्वन्द्वात्मक दर्शन से कौन-सी चीज को निकाल दिया?
(a) भौतिकवादी दृष्टिकोण
(b) उत्पादन सम्बन्धों का विश्लेषण
(c) रहस्यवादी या अध्यात्मवादी तर्क
(d) वर्ग संघर्ष
उत्तर: (c) रहस्यवादी या अध्यात्मवादी तर्क (Mystified Logic)
व्याख्या:
हीगेल का दर्शन आदर्शवादी (Idealist) था, जहाँ वह मानते थे कि“वास्तविकता विचार (Idea) या आत्मा (Spirit) का परिणाम है।”अर्थात, संसार की सभी वस्तुएँ — समाज, राज्य, इतिहास —
मानव चेतना या आत्मा की अभिव्यक्ति हैं।
हीगेल के इस दृष्टिकोण में द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया (Dialectical Process) को
रहस्यवाद (Mysticism) का रंग दे दिया गया था।मार्क्स ने हीगेल के इस दृष्टिकोण को उलट दिया और कहा —
“मुझे ऐसा लगा मानो हीगेल का द्वन्द्व उल्टा खड़ा है। मैंने उसे सीधे खड़ा किया।”
(“I turned Hegel on his head.” — Karl Marx, Das Kapital, 1873 Afterword)इस प्रकार मार्क्स ने हीगेल की द्वन्द्वात्मक विधि को स्वीकार किया,
पर उससे “Mystified or Spiritual Form” को निकाल दिया।
अब द्वन्द्व आत्मा या विचारों में नहीं, बल्कि भौतिक परिस्थितियों —
जैसे उत्पादन शक्तियाँ (Forces of Production) और उत्पादन सम्बन्ध (Relations of Production) — में देखा गया।हीगेल बनाम मार्क्स – द्वन्द्व की दिशा:
पहलू हीगेल मार्क्स द्वन्द्व का स्वरूप आदर्शवादी (Idealist) भौतिकवादी (Materialist) संघर्ष का स्थान विचार और आत्मा वस्तुगत वास्तविकता और अर्थव्यवस्था परिणाम आत्मा की प्राप्ति (Realization of Spirit) समाज परिवर्तन और वर्ग संघर्ष “With Hegel, the dialectic stands on its head. It must be turned right side up again, if you would discover the rational kernel within the mystical shell.”
— Karl Marx, Afterword to the Second German Edition of Das Kapital (1873)
“हीगेल के यहाँ द्वन्द्व उल्टा खड़ा है;
यदि हमें उसके रहस्यमय खोल में छिपा तर्कसंगत सार पाना है,
तो उसे सीधा खड़ा करना होगा।”हीगेल ने विचार और आत्मा को केंद्र में रखा,
जबकि मार्क्स ने कहा कि वास्तविकता विचारों में नहीं, बल्कि भौतिक स्थितियों में निहित है।
इसलिए मार्क्स ने हीगेल के दर्शन से रहस्यवाद को निकालकर
उसे भौतिक द्वन्द्ववाद (Dialectical Materialism) में परिवर्तित किया।
14. मार्क्स ने हीगेल के किस तत्व को अपने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में अपनाया?
(a) अध्यात्मिक संकल्प
(b) द्वन्द्व की तार्किक संरचना
(c) मुक्ति का लक्ष्य
(d) विचारों का आदर्शवादी विकास
उत्तर: (b) द्वन्द्व की तार्किक संरचना (Kernel of Dialectics)
व्याख्या:
हीगेल ने द्वन्द्ववाद (Dialectic) को विचारों की गति और विकास की विधि के रूप में प्रस्तुत किया।
उनके अनुसार, हर विचार (Thesis) अपने भीतर विरोध (Antithesis) को उत्पन्न करता है,
और यह विरोध एक नए उच्चतर सत्य (Synthesis) में परिवर्तित होता है।लेकिन हीगेल का यह पूरा ढाँचा आदर्शवादी (Idealist) था,
क्योंकि वह इसे “आत्मा (Spirit)” या “विचार” की दुनिया में देखता था।मार्क्स ने इस ढाँचे (Structure) को स्वीकार किया,
पर इसके रहस्यवादी या अध्यात्मिक आवरण (Mystical Shell) को हटाकर
भौतिक और ऐतिहासिक संदर्भों में लागू किया।उन्होंने कहा कि यह तार्किक संरचना — यानी द्वन्द्व की विधि —
अब केवल विचारों पर नहीं, बल्कि वस्तुगत वास्तविकता (Material Reality) पर लागू की जानी चाहिए।“My dialectical method is not only different from the Hegelian, but is its direct opposite.
In its rational form, it is a scandal and abomination to the bourgeoisie.”
— Karl Marx, Afterword to the Second German Edition of Das Kapital (1873)
“मेरी द्वन्द्वात्मक पद्धति हीगेल की पद्धति से न केवल भिन्न है, बल्कि उसका प्रतिलोम है।
अपने तार्किक रूप में यह बुर्जुआ वर्ग के लिए भयावह और असहनीय है।”हीगेल और मार्क्स की तुलना:
पहलू हीगेल मार्क्स द्वन्द्व का आधार विचार और आत्मा भौतिक जीवन और उत्पादन पद्धति का स्वरूप रहस्यवादी, आदर्शवादी तर्कसंगत, भौतिकवादी उद्देश्य आत्मा की मुक्ति समाज का परिवर्तन प्रयुक्त शब्द Mystical Shell Rational Kernel मार्क्स ने हीगेल की पूरी दार्शनिक संरचना को अस्वीकार नहीं किया,
बल्कि उसकी तार्किक पद्धति (Logical Method) को स्वीकार किया —
और उसी को भौतिक वास्तविकताओं, वर्ग-संघर्ष और उत्पादन सम्बन्धों के विश्लेषण में लागू किया।
इस प्रकार, मार्क्स ने हीगेल की आत्मा को निकाला और उसकी विधि को बचाया।
15. मार्क्स के अनुसार हीगेल की विधि का मुख्य योगदान क्या था?
(a) उत्पादन और विनिमय के नियम
(b) वस्तुनिष्ठ समाज की पूरी व्याख्या
(c) द्वन्द्वात्मक विश्लेषण की वैज्ञानिक विधि
(d) राज्य और कानून की स्थायित्वता
उत्तर: (c) द्वन्द्वात्मक विश्लेषण की वैज्ञानिक विधि
व्याख्या:
मार्क्स ने माना कि हीगेल की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि
उन्होंने द्वन्द्व (Dialectic) को इतिहास और समाज के अध्ययन की एक विधि (Method) के रूप में विकसित किया।
हीगेल ने यह दिखाया कि कोई भी विचार या संस्था स्थिर नहीं होती —
बल्कि वह अपने भीतर मौजूद विरोधाभासों (Contradictions) से विकसित होती है।हालाँकि हीगेल ने इस प्रक्रिया को आध्यात्मिक (Spiritual) रूप में देखा,
जबकि मार्क्स ने इसे भौतिक (Material) और ऐतिहासिक (Historical) रूप में समझाया।मार्क्स ने लिखा —
“In its rational form, dialectic includes in its comprehension the positive recognition of the existing state of things,
and also, at the same time, the recognition of the negation of that state.”
— Karl Marx, Afterword to the Second German Edition of Das Kapital (1873)
“अपने तार्किक रूप में द्वन्द्व न केवल वर्तमान अवस्था की स्वीकृति देता है,
बल्कि उसके निषेध और परिवर्तन की संभावना को भी साथ में समझता है।”इस प्रकार, हीगेल की विधि (Method) ने मार्क्स को यह सिद्धांत दिया कि
वास्तविकता हमेशा परिवर्तनशील होती है, और हर सामाजिक व्यवस्था में
अपने अंतर्विरोधों से ही नए रूप की उत्पत्ति होती है।Hegel बनाम Marx – विधि का प्रयोग:
पहलू हीगेल मार्क्स दृष्टिकोण आदर्शवादी (Idealist) भौतिकवादी (Materialist) द्वन्द्व का आधार विचारों और आत्मा में सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता में उद्देश्य आत्मा की पूर्णता समाज परिवर्तन विधि का स्वरूप दार्शनिक वैज्ञानिक एवं ऐतिहासिक हीगेल की विधि ने यह सिखाया कि हर सामाजिक या वैचारिक व्यवस्था में
विरोध (Contradiction) ही विकास और परिवर्तन की शक्ति है।
मार्क्स ने उसी तार्किक प्रक्रिया को भौतिक जगत में लागू कर दिया —
जहाँ समाज के आर्थिक विरोधाभास (Economic Contradictions) ही ऐतिहासिक परिवर्तन के आधार बनते हैं।
मार्क्स और हीगेल दोनों ने मानव समाज के विकास को द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया के रूप में देखा, परंतु उनका दृष्टिकोण भिन्न था — हीगेल का दृष्टिकोण आदर्शवादी (Idealist) था जबकि मार्क्स का दृष्टिकोण भौतिकवादी (Materialist)।
मार्क्स ने हीगेल के द्वन्द्वात्मक दर्शन से “वैज्ञानिक विधि” को अपनाया और उसे वास्तविक आर्थिक-सामाजिक विश्लेषण में लागू किया।