Karl Marx: आदर्श और विचारधाराएँ — उदारतावाद बनाम मार्क्सवाद MCQs

Karl Marx: आदर्श और विचारधाराएँ — उदारतावाद बनाम मार्क्सवाद – MCQs सहित विस्तृत व्याख्या

19वीं शताब्दी में जब यूरोप सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था, तब दो विचारधाराएँ — उदारतावाद (Liberalism) और मार्क्सवाद (Marxism) — आधुनिक समाज की दिशा तय कर रही थीं। जहाँ उदारतावाद ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों को जन्म दिया, वहीं मार्क्सवाद ने इन आदर्शों की सीमाओं को उजागर करते हुए वर्ग-संघर्ष और सामाजिक क्रांति का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
प्रसिद्ध समाजशास्त्री सी. राइट मिल्स (C. Wright Mills) ने इन विचारधाराओं के ऐतिहासिक विकास को विचारधारा, आदर्श, एजेन्सी और सिद्धांत के रूप में समझाया।
इस पोस्ट में प्रस्तुत MCQs इन्हीं अवधारणाओं — Karl Marx के वैचारिक योगदान, उदारतावाद और मार्क्सवाद के बीच वैचारिक टकराव, तथा सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया — पर आधारित हैं।
ये प्रश्न विशेष रूप से UPSC, UGC-NET, Civil Services और Sociology Optional की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।


1. सी. राइट मिल्स के अनुसार 19वीं शताब्दी के यूरोपीय सामाजिक-राजनीतिक चिंतन (social-political thought) में कितने प्रमुख तत्त्व विद्यमान थे?

(a) तीन
(b) चार
(c) पाँच
(d) छह

उत्तर: (b) चार

व्याख्या:

सी. राइट मिल्स ने अपनी प्रसिद्ध कृति “The Sociological Imagination” (1959) में समाजशास्त्रीय चिंतन के ऐतिहासिक विकास का विश्लेषण करते हुए बताया कि 19वीं शताब्दी के यूरोपीय सामाजिक एवं राजनीतिक दर्शन में चार प्रमुख बौद्धिक तत्त्व (intellectual elements) विद्यमान थे —

  1. विचारधारा (Ideology):
    उस युग के दार्शनिकों और चिंतकों ने समाज के परिवर्तन को किसी विचारधारा — जैसे उदारवाद, समाजवाद, या रूढ़िवाद — के माध्यम से समझाने का प्रयास किया।
  2. आदर्श (Ideal):
    समाज और व्यक्ति के लिए एक आदर्श स्थिति की कल्पना की गई — जैसे समानता, स्वतंत्रता, या प्रगति का लक्ष्य।
  3. एजेन्सी (Agency):
    यह विचार कि समाज में परिवर्तन किसी विशिष्ट वर्ग, समूह या व्यक्ति के कार्यों से होता है — उदाहरणार्थ, मार्क्स के अनुसार श्रमिक वर्ग परिवर्तन का एजेंट था।
  4. सिद्धांत (Theory):
    इन विचारों और आदर्शों को व्यवस्थित ढंग से समझाने के लिए वैज्ञानिक या दार्शनिक सिद्धांत निर्मित किए गए।

मिल्स के अनुसार ये चारों तत्त्व सामाजिक चिंतन के ऐतिहासिक विकास में परस्पर जुड़े रहे — विचारधारा ने आदर्श को जन्म दिया, आदर्श ने एजेंसी को प्रेरित किया, और इन सबका विश्लेषण सिद्धांत के माध्यम से हुआ।

मिल्स इस बात पर बल देते हैं कि आधुनिक समाजशास्त्र को इन तत्त्वों को समझे बिना नहीं समझा जा सकता, क्योंकि यही वह बौद्धिक परंपरा है जिससे आधुनिक समाजशास्त्र की नींव पड़ी।

इस प्रकार, सी. राइट मिल्स ने 19वीं शताब्दी के यूरोपीय राजनीतिक चिंतन में चार मुख्य तत्त्वों — विचारधारा, आदर्श, एजेन्सी, और सिद्धांत — की पहचान की थी।

2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सी. राइट मिल्स के अनुसार सही नहीं है?

(a) विचारधाराएँ समय के साथ कमजोर पड़ जाती हैं।
(b) सफल विचारधारा धीरे-धीरे गंवारू या रूढ़ हो जाती है।
(c) विचारधारा इतिहास की प्रक्रिया से पृथक रहती है।
(d) विचारधारा संघर्षों का मुख्य आधार होती है।

उत्तर: (c) विचारधारा इतिहास की प्रक्रिया से पृथक रहती है।

व्याख्या:

सी. राइट मिल्स ने अपनी पुस्तक “The Sociological Imagination” (1959) में स्पष्ट किया कि विचारधारा (Ideology) को हमेशा ऐतिहासिक संदर्भ (historical context) में समझना चाहिए।

उन्होंने कहा —

“Ideologies are products of history; they arise, develop, and decline within specific historical situations.”

अर्थात्,
विचारधारा किसी स्थिर या शाश्वत सत्य नहीं होती, बल्कि यह समाज की ऐतिहासिक परिस्थितियों, वर्गीय संघर्षों और राजनीतिक परिवर्तनों से उत्पन्न होती है।

मिल्स का मानना था कि —

  • जब कोई विचारधारा समाज में उभरती है, तो वह किसी सामाजिक वर्ग या समूह की चेतना को संगठित करती है।
  • लेकिन जब वही विचारधारा सत्ता में स्थापित हो जाती है, तो धीरे-धीरे “रूढ़” (dogmatic) और “स्वतःसिद्ध” (taken for granted) बन जाती है।
  • इस प्रकार, विचारधारा इतिहास की प्रक्रिया का अंग है — उससे पृथक नहीं

मुख्य बिंदु

बिंदुमिल्स का दृष्टिकोण
विचारधारा का स्वरूपऐतिहासिक और परिवर्तनशील
विचारधारा की भूमिकासामाजिक संघर्षों और परिवर्तन का प्रेरक
विचारधारा की प्रवृत्तिसफलता के बाद रूढ़ता या ठहराव
गलत कथनविचारधारा इतिहास से अलग रहती है

3. सी. राइट मिल्स द्वारा प्रयुक्त “गंवारूपन” (Rusticity) शब्द का प्रयोग किस सन्दर्भ में किया गया है?

(a) विचारधारा की शक्ति के रूप में
(b) विचारधारा के पतन के रूप में
(c) आर्थिक स्वतंत्रता के रूप में
(d) सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में

उत्तर: (b) विचारधारा के पतन के रूप में

व्याख्या:

सी. राइट मिल्स ने अपने समाजशास्त्रीय विश्लेषण में कहा कि जब कोई विचारधारा (Ideology) किसी समाज या वर्ग के संघर्ष के परिणामस्वरूप उभरती है, तब उसमें ऊर्जा, आलोचनात्मकता और परिवर्तन की शक्ति होती है।

किन्तु,
जब वही विचारधारा राजनीतिक सत्ता या संस्थागत संरचना के भीतर स्थापित हो जाती है, तो वह अपने मूल आलोचनात्मक स्वरूप को खो देती है।
इस अवस्था में वह “गंवारू”, “रूढ़” या “जड़” (rustic and dogmatic) बन जाती है।

मिल्स इसे विचारधारा के पतन (degeneration) की अवस्था कहते हैं।
अर्थात् —

सफल विचारधारा जब इतिहास की धारा में स्थिर होकर सत्ता या संस्था का अंग बन जाती है, तो उसका सजीव, गतिशील स्वरूप नष्ट हो जाता है। यही उसका ‘गंवारूपन’ है।

इस प्रकार “Rusticity” शब्द का प्रयोग विचारधारा के ऊर्जावान चरण से जड़ चरण में परिवर्तन को इंगित करने के लिए किया गया है — अर्थात् उसके पतन के रूप में।

मुख्य बिंदु

बिंदुविवरण
शब्द“Rusticity” (गंवारूपन)
प्रयोगकर्तासी. राइट मिल्स
सन्दर्भविचारधारा के विकास और पतन का विश्लेषण
अर्थविचारधारा के जड़, रूढ़ या अप्रासंगिक हो जाने की अवस्था
निहितार्थविचारधारा का पतन या decline

4. उदारतावाद (Liberalism) और मार्क्सवाद (Marxism) — दोनों किन सामाजिक व्यवस्थाओं का विरोध करते हैं?

(a) पूंजीवाद और समाजवाद
(b) सामंतवाद और एकतंत्रवाद
(c) लोकतंत्र और गणतंत्र
(d) साम्यवाद और नास्तिकता

उत्तर: (b) सामंतवाद और एकतंत्रवाद

व्याख्या:

उदारतावाद और मार्क्सवाद दोनों ही आधुनिक युग की वैचारिक धाराएँ हैं, जिनका उदय 18वीं–19वीं शताब्दी में यूरोप में हुआ। दोनों ने अपने-अपने ढंग से सामंतवाद (Feudalism) और राजशाही या एकतंत्र शासन (Absolutism/Monarchy) का विरोध किया।

1. उदारतावाद (Liberalism)

  • उदारवाद ने व्यक्ति की स्वतंत्रता (individual liberty), कानून का शासन (rule of law) और प्रतिनिधि शासन (representative government) का समर्थन किया।
  • इसका लक्ष्य था – राजा के निरंकुश शासन (absolute monarchy) और सामंतवादी विशेषाधिकारों (feudal privileges) का अंत।
  • इसलिए, उदारवादी चिंतन फ्रांसीसी क्रांति (1789) और औद्योगिक क्रांति की वैचारिक नींव बना।

2. मार्क्सवाद (Marxism)

  • मार्क्स और एंगेल्स ने भी सामंतवाद और एकतंत्र शासन को ऐतिहासिक रूप से प्रतिक्रियाशील माना।
  • उन्होंने कहा कि सामंतवादी व्यवस्था का अंत पूंजीवाद द्वारा हुआ, जो उत्पादन की शक्तियों को आगे बढ़ाता है।
  • परंतु मार्क्सवाद ने आगे जाकर उदार पूंजीवाद की सीमाओं की आलोचना की और उसे वर्गीय शोषण का नया रूप बताया।
  • इस प्रकार, मार्क्सवाद ने सामंतवाद, एकतंत्रवाद, और पूंजीवाद—तीनों का विरोध किया।

इस दृष्टि से —

उदारतावाद और मार्क्सवाद दोनों का समान विरोध सामंतवाद और राजशाही/एकतंत्र शासन से है,
जबकि उनका भेद पूंजीवाद के मूल्यांकन में है।

मुख्य तुलना

पहलूउदारतावादमार्क्सवाद
समान विरोधसामंतवाद और राजशाहीसामंतवाद और राजशाही
अतिरिक्त विरोधपूंजीवाद
लक्ष्यव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्रवर्गहीन समाज और सामूहिक स्वामित्व
ऐतिहासिक दृष्टिकोणप्रगतिशील सुधारक्रांतिकारी परिवर्तन

5. मार्क्सवाद किस विचारधारा से एक कदम आगे बढ़कर विरोध करता है?

(a) समाजवाद
(b) उदार पूँजीवाद
(c) लोकतंत्र
(d) फासीवाद

उत्तर: (b) उदार पूँजीवाद (Liberal Capitalism)

व्याख्या:

मार्क्सवाद का उद्भव 19वीं शताब्दी के यूरोप में हुआ — उस समय सामंतवाद (Feudalism) धीरे-धीरे समाप्त हो रहा था और उसकी जगह उदार पूँजीवाद (Liberal Capitalism) की व्यवस्था स्थापित हो रही थी।

मार्क्स का दृष्टिकोण:

मार्क्स ने स्वीकार किया कि पूँजीवाद ने उत्पादन की शक्तियों (forces of production) को विकसित किया और समाज को सामंती जकड़न से मुक्त किया।
परंतु उन्होंने यह भी कहा कि —

पूँजीवाद ने स्वतंत्रता के स्थान पर नए वर्गीय शोषण (class exploitation) की नींव रख दी है।

इस प्रकार, मार्क्सवाद ने उदार पूँजीवाद की सीमाओं और विरोधाभासों को उजागर किया।

मुख्य आलोचनाएँ:

  1. स्वतंत्रता बनाम शोषण:
    उदार पूँजीवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा करता है, परंतु आर्थिक क्षेत्र में यह मजदूर वर्ग को पूँजीपति वर्ग पर निर्भर बना देता है।
  2. समानता का भ्रम:
    मार्क्स के अनुसार, पूँजीवादी समाज में समानता केवल औपचारिक (formal) होती है — वास्तविक समानता नहीं।
  3. वर्ग संघर्ष:
    पूँजीवादी समाज में दो प्रमुख वर्ग होते हैं —
    • बुर्जुआ (Bourgeoisie): उत्पादन के साधनों का स्वामी
    • प्रोलेटेरियट (Proletariat): श्रम बेचने वाला वर्ग
      इनके बीच संघर्ष ही इतिहास की गतिशील शक्ति है।

इसलिए मार्क्सवाद उदार पूँजीवाद से एक कदम आगे बढ़कर उसका वैज्ञानिक आलोचनात्मक विरोध प्रस्तुत करता है।

मुख्य बिंदु

दृष्टिकोणउदार पूँजीवादमार्क्सवाद
मुख्य लक्ष्यव्यक्तिगत स्वतंत्रतावर्गीय समानता
आर्थिक आधारनिजी स्वामित्वसामूहिक स्वामित्व
दृष्टिकोणसुधारवादीक्रांतिकारी
विरोधसामंतवादपूँजीवाद

उद्धरण

“The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.”
Karl Marx & Friedrich Engels, The Communist Manifesto (1848)

Mohan Exam

6. सी. राइट मिल्स के अनुसार उदारतावाद और मार्क्सवाद के बीच वैचारिक टकराव कब तेज हुआ?

(a) औद्योगिक क्रांति के बाद
(b) फ्रांसीसी क्रांति के बाद
(c) 19वीं शताब्दी के मध्य में
(d) द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद

उत्तर: (c) 19वीं शताब्दी के मध्य में

व्याख्या:

सी. राइट मिल्स ने यूरोपीय वैचारिक विकास का ऐतिहासिक विश्लेषण करते हुए कहा कि उदारतावाद और मार्क्सवाद — दोनों ही आधुनिक युग की उत्पादक विचारधाराएँ हैं, परंतु उनका वैचारिक टकराव 19वीं शताब्दी के मध्य से स्पष्ट रूप से उभरने लगा।

कारण:

  1. औद्योगिक पूँजीवाद का विकास:
    19वीं शताब्दी में औद्योगिक पूँजीवाद ने आर्थिक विषमता को बढ़ाया। उदारवाद इस व्यवस्था का समर्थन करता था, जबकि मार्क्सवाद ने इसकी आलोचना की।
  2. ‘The Communist Manifesto’ (1848):
    कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र के माध्यम से पूँजीवादी व्यवस्था और उदार विचारधारा के विरोध में स्पष्ट रूप से वर्ग संघर्ष का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
  3. राजनीतिक विमर्श में विभाजन:
    इस काल में यूरोप में दो विचारधाराएँ आमने-सामने आईं —
    • उदार लोकतंत्र (Liberal Democracy)
    • वैज्ञानिक समाजवाद (Scientific Socialism)
    मिल्स के अनुसार, यही वह समय था जब राजनीतिक और दार्शनिक विमर्श में वैचारिक ध्रुवीकरण स्पष्ट रूप से दिखने लगा।

आगे का विकास:

20वीं शताब्दी के प्रारंभ में रूसी क्रांति (1917) ने इस वैचारिक संघर्ष को राजनीतिक रूप भी दे दिया।

निष्कर्ष

इस प्रकार —

19वीं शताब्दी के मध्य में उदारतावाद और मार्क्सवाद के बीच वैचारिक संघर्ष प्रारंभ हुआ,
जबकि 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में यह राजनीतिक रूप से मूर्त हुआ।

7. सूची मिलान प्रश्न

सूची–I (विचारधारा)सूची–II (मुख्य विचार)
(A) उदारतावाद(1) पूँजीवादी प्रजातंत्र का समर्थन
(B) मार्क्सवाद(2) पूँजीवादी प्रजातंत्र का विरोध
(C) सामंतवाद(3) वर्गीय संरचना की रक्षा
(D) एकतंत्रवाद(4) राजकीय निरंकुशता

(a) A–1, B–2, C–3, D–4
(b) A–2, B–1, C–4, D–3
(c) A–3, B–4, C–1, D–2
(d) A–4, B–3, C–2, D–1

उत्तर: (a) A–1, B–2, C–3, D–4

व्याख्या:

(A) उदारतावाद (Liberalism) → (1) पूँजीवादी प्रजातंत्र का समर्थन

उदारतावाद का मूल दर्शन व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी संपत्ति, और सीमित शासन पर आधारित है। यह विचारधारा मानती है कि आर्थिक स्वतंत्रता और राजनीतिक स्वतंत्रता साथ-साथ चलती हैं।
इसलिए उदारतावाद पूँजीवादी लोकतंत्र (Capitalist Democracy) का समर्थन करता है, जहाँ व्यक्ति को बाजार और राजनीतिक निर्णयों में भागीदारी की स्वतंत्रता होती है।

मुख्य विचारक: जॉन लॉक, एडम स्मिथ, जे. एस. मिल, थॉमस हिल ग्रीन

(B) मार्क्सवाद (Marxism) → (2) पूँजीवादी प्रजातंत्र का विरोध

मार्क्सवाद पूँजीवादी व्यवस्था को वर्ग शोषण (Class Exploitation) पर आधारित मानता है।
कार्ल मार्क्स के अनुसार, पूँजीवादी लोकतंत्र वास्तव में बुर्जुआ वर्ग (Bourgeoisie) का शासन है, जिसमें श्रमिक वर्ग (Proletariat) के हितों की उपेक्षा होती है।
इसलिए मार्क्सवाद पूँजीवादी लोकतंत्र का विरोध करता है और वर्गविहीन समाज (Classless Society) की स्थापना का समर्थन करता है।

मुख्य विचारक: कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स

(C) सामंतवाद (Feudalism) → (3) वर्गीय संरचना की रक्षा

सामंतवादी व्यवस्था में सत्ता और भूमि कुछ विशेष वर्गों (Nobility) के पास होती थी। यह व्यवस्था जन्म और परंपरा पर आधारित होती थी, जहाँ आम जनता पर शासक वर्ग का वर्चस्व बना रहता था।
इसलिए सामंतवाद का उद्देश्य था वर्गीय संरचना (Hierarchical Class Structure) की रक्षा करना, ताकि सत्ता और संपत्ति एक ही वर्ग में बनी रहे।

उदाहरण: मध्यकालीन यूरोप का जमींदारी शासन और भारत की जमींदारी प्रथा

(D) एकतंत्रवाद (Absolutism) → (4) राजकीय निरंकुशता

एकतंत्रवाद ऐसी शासन-व्यवस्था है जिसमें सम्पूर्ण शक्ति राजा या शासक के हाथों में केंद्रित होती है।
यह विचार “राजा का दैवी अधिकार” (Divine Right of Kings) पर आधारित है, जिसमें राजा को जनता के ऊपर सर्वाधिक अधिकार प्राप्त होता है।
इस व्यवस्था में नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता का कोई स्थान नहीं होता, इसलिए इसे राजकीय निरंकुशता (State Despotism) कहा जाता है।

उदाहरण: फ्रांस के राजा लुई XIV का प्रसिद्ध कथन — “I am the State” (L’État, c’est moi)

8. “विचारधारा इतिहास की गति के साथ बराबर चलती रहती है” — यह विचार किस समाजशास्त्री का है?

(a) कार्ल मार्क्स
(b) सी. राइट मिल्स
(c) हर्बर्ट स्पेंसर
(d) ऑगस्ट कॉम्ट

उत्तर: (b) सी. राइट मिल्स

व्याख्या:

सी. राइट मिल्स (C. Wright Mills, 1916–1962) का यह कथन समाजशास्त्रीय चिंतन के ऐतिहासिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।
उनके अनुसार, “विचारधारा (Ideology), इतिहास (History) और क्रियाशीलता (Agency) एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं, बल्कि ये निरंतर परस्पर प्रभाव डालने वाली गतिशील शक्तियाँ हैं।

मिल्स का कहना था कि विचारधारा केवल सैद्धांतिक अवधारणा नहीं होती — यह सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों में उत्पन्न, परिवर्तित और विकसित होती है।
इसलिए वह यह स्वीकार करते हैं कि —

“Ideology moves with the march of history; it neither precedes nor lags behind it.”
(“विचारधारा इतिहास की गति के साथ-साथ चलती है; न उससे पहले और न उससे पीछे।”)

यह विचार मिल्स की पुस्तक “The Sociological Imagination” (1959) और उनके निबंध “The Marxists” (1962) में परिलक्षित होता है, जहाँ उन्होंने बताया कि समाजशास्त्र को हमेशा ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहिए।

वे यह भी कहते हैं कि जब कोई विचारधारा सामाजिक वास्तविकताओं से कट जाती है, तो वह “गंवारूपन” (Rusticity) या जड़ता का शिकार हो जाती है — अर्थात् वह समाज परिवर्तन के अनुरूप विकसित नहीं हो पाती।

मुख्य बिंदु सारांश:

तत्वमिल्स का दृष्टिकोण
विचारधारा (Ideology)सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों से जुड़ी होती है।
इतिहास (History)निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया है जो विचारों को प्रभावित करती है।
एजेंसी (Agency)व्यक्तियों और समूहों की क्रियाशील भूमिका इतिहास और विचारधारा को आगे बढ़ाती है।

इस प्रकार, मिल्स का दृष्टिकोण ऐतिहासिक समाजशास्त्र (Historical Sociology) की परंपरा में आता है, जिसमें समाज के विचार और संरचना दोनों को इतिहास की गति से जोड़ा गया है।

9. उदारतावाद के प्रति मार्क्सवाद की दृष्टि को सबसे उपयुक्त रूप से कौन व्यक्त करता है?

(a) आलोचनात्मक स्वीकार्यता
(b) सैद्धांतिक साझेदारी
(c) वैचारिक विरोध
(d) सांस्कृतिक अनुकरण

उत्तर: (c) वैचारिक विरोध

व्याख्या:

मार्क्सवाद और उदारतावाद दोनों का उद्भव यूरोपीय औद्योगिक समाज की पृष्ठभूमि में हुआ, परंतु दोनों की मूल दृष्टि (core outlook) भिन्न रही।

उदारतावाद (Liberalism) ने व्यक्ति की स्वतंत्रता, निजी संपत्ति और मुक्त बाजार को प्रगति का आधार माना।
वहीं, मार्क्सवाद (Marxism) ने इन सबको वर्ग-शोषण (class exploitation) और पूंजीवादी असमानता (capitalist inequality) की जड़ बताया।

मार्क्स के अनुसार,

“Freedom in capitalist society always remains about the same as it was in ancient Greek republics: freedom for the slave owners.”
(— Karl Marx, Capital, Vol. I)

अर्थात् उदार पूँजीवादी स्वतंत्रता केवल मालिक वर्ग (bourgeoisie) के हित में होती है, श्रमिक वर्ग (proletariat) के लिए नहीं।

इसलिए मार्क्सवाद, उदारतावाद को “सामंतवाद विरोधी” होने के बावजूद वर्गीय वर्चस्व की नई विचारधारा के रूप में देखता है।
इस दृष्टि से, मार्क्सवाद की स्थिति आलोचनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक विरोधात्मक (ideological opposition) है।

तुलनात्मक दृष्टि:

विचारधारामूल सिद्धांतमार्क्सवादी दृष्टिकोण
उदारतावाद (Liberalism)व्यक्ति की स्वतंत्रता, निजी संपत्ति, बाजार की स्वतन्त्रतापूंजीवादी शोषण की वैचारिक आड़
मार्क्सवाद (Marxism)वर्ग संघर्ष, सामूहिक स्वामित्व, समानताउदार पूंजीवाद का वैचारिक विरोध
मार्क्सवाद उदारतावाद को सामंतवाद से मुक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि नए वर्गीय प्रभुत्व का रूप मानता है।
इसलिए इसका संबंध “वैचारिक विरोध” (Ideological Opposition) के रूप में सबसे उपयुक्त है।

10. उदारतावाद प्रारंभ में क्यों लोकप्रिय हुआ था?

(a) उसने समाजवाद का प्रतिपादन किया
(b) उसने राजशाही को समर्थन दिया
(c) उसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का संदेश दिया
(d) उसने साम्यवाद को समाप्त किया

उत्तर: (c) उसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का संदेश दिया

व्याख्या:

उदारतावाद (Liberalism) यूरोप में सामंतवाद और निरंकुश राजशाही के विरुद्ध उभरने वाली वह विचारधारा थी जिसने फ्रांसीसी क्रांति (1789) के मूल आदर्शों —
स्वतंत्रता (Liberty),
समानता (Equality), और
बंधुत्व (Fraternity)
को अपने केंद्र में रखा।

इन आदर्शों ने जनता को सामाजिक और राजनीतिक मुक्ति का नया मार्ग दिखाया।
उदार विचारकों ने यह तर्क दिया कि मानव समाज का मूल आधार व्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की समानता है, न कि जन्म, वर्ग या वंश।

इस प्रकार, उदारतावाद ने उस समय के समाज में नए सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को जन्म दिया —
जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, संवैधानिक शासन और कानून के समक्ष समानता जैसे विचारों ने सामंतवाद और एकतंत्रवाद के खिलाफ जनता को संगठित किया।

मुख्य कारण:

  1. फ्रांसीसी क्रांति के प्रभाव से उत्पन्न मूल्य प्रणाली
  2. राजशाही और सामंतवाद का विरोध
  3. नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक शासन की माँग
  4. मध्यवर्ग (bourgeoisie) का उदय, जिसने इन मूल्यों को राजनीतिक आधार दिया।
उदारतावाद प्रारंभ में लोकप्रिय इसलिए हुआ क्योंकि उसने व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का ऐसा वादा किया जो जनता को राजशाही और सामंतवाद की जंजीरों से मुक्ति का प्रतीक लगा।

11. कथन आधारित प्रश्न

कथन 1: उदारतावाद और मार्क्सवाद दोनों ही पूंजीवाद का समर्थन करते हैं।
कथन 2: मार्क्सवाद उदार पूंजीवाद को पूंजीवादी समाजों की मुख्य आधारशिला मानकर उसका विरोध करता है।

(a) कथन 1 सही है
(b) कथन 2 सही है
(c) दोनों सही हैं
(d) दोनों गलत हैं

उत्तर: (b) कथन 2 सही है

व्याख्या:

उदारतावाद (Liberalism) और मार्क्सवाद (Marxism) — दोनों ही आधुनिक युग की प्रमुख सामाजिक-राजनीतिक विचारधाराएँ हैं, परंतु उनके पूंजीवाद (Capitalism) के प्रति दृष्टिकोण बिल्कुल विपरीत है।

उदारतावाद:

  • पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बाजार की स्वतन्त्रता का आधार मानता है।
  • इसका मानना है कि पूंजीवाद प्रगति, प्रतिस्पर्धा और नवाचार को बढ़ावा देता है।
  • इसलिए, उदारतावाद पूंजीवादी लोकतंत्र (Capitalist Democracy) का समर्थक है।

मार्क्सवाद:

  • मार्क्सवाद पूंजीवाद को श्रमिक वर्ग (proletariat) के शोषण की प्रणाली मानता है।
  • मार्क्स के अनुसार, पूंजीवाद “वर्गीय असमानता” और “विच्छेदन (Alienation)” को जन्म देता है।
  • इसलिए, मार्क्सवाद उदार पूंजीवाद की न केवल आलोचना करता है, बल्कि उसका वैचारिक विरोध भी करता है।
“The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.”
Karl Marx & Friedrich Engels, The Communist Manifesto (1848)

यह कथन स्पष्ट करता है कि मार्क्सवाद पूंजीवाद को ऐतिहासिक संघर्ष की असमान व्यवस्था के रूप में देखता है, जबकि उदारतावाद इसे सामाजिक व्यवस्था की परिपूर्णता मानता है।

सारांश तालिका:

विचारधारापूंजीवाद के प्रति दृष्टिकोणमुख्य उद्देश्य
उदारतावाद (Liberalism)समर्थन करता हैव्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुक्त बाजार की रक्षा
मार्क्सवाद (Marxism)विरोध करता हैवर्गहीन समाज (Classless Society) की स्थापना
कथन 1 गलत है क्योंकि उदारतावाद पूंजीवाद का समर्थन करता है, परंतु मार्क्सवाद उसका विरोध करता है।
कथन 2 सही है क्योंकि मार्क्सवाद उदार पूंजीवाद को पूंजीवादी समाज की वैचारिक आधारशिला मानकर उसकी आलोचना करता है।

Mohan Exam

12. निम्न में से कौन-सा उदारतावाद की ऐतिहासिक कमजोरी नहीं मानी गयी है?

(a) उसका रूढ़िवादी स्वरूप
(b) वर्ग विभाजन को बढ़ावा देना
(c) पूंजीवाद का विरोध
(d) अमीर देशों का पक्षधर होना

उत्तर: (c) पूंजीवाद का विरोध

व्याख्या:

उदारतावाद (Liberalism) एक ऐसी राजनीतिक और आर्थिक विचारधारा है जिसने आधुनिक पूंजीवादी लोकतंत्रों की नींव रखी। इसका मूल उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता, समान अवसर, और कानून के शासन की रक्षा करना है।

इतिहास में उदारतावाद की कई कमजोरियाँ बताई गई हैं, परंतु “पूंजीवाद का विरोध” उनमें शामिल नहीं है, क्योंकि उदारतावाद का निर्माण ही पूंजीवादी व्यवस्था के नैतिक और वैचारिक समर्थन के रूप में हुआ था।

1. उदारतावाद की प्रमुख ऐतिहासिक कमजोरियाँ

  1. रूढ़िवादी स्वरूप (Conservative nature):
    समय के साथ उदारतावाद यथास्थितिवादी (Status quoist) बन गया। उसने अमीर वर्ग और पूंजीपति हितों की रक्षा की बजाय सामाजिक न्याय या समानता के प्रश्नों से दूरी बना ली।
  2. वर्ग विभाजन को बढ़ावा देना (Promotion of Class Division):
    उदारतावाद व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिस्पर्धा को सर्वोपरि मानता है। परिणामस्वरूप पूंजीवादी समाज में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता बढ़ी।
    इसने ‘योग्यता के आधार पर अवसर’ की बात की, लेकिन व्यावहारिक रूप में यह धन के आधार पर अवसर बन गया।
  3. अमीर देशों का पक्षधर होना (Bias toward rich nations):
    उदार अंतरराष्ट्रीय नीतियाँ जैसे Free Trade और Globalization विकसित देशों के हितों में रही हैं।
    गरीब देशों की आर्थिक निर्भरता बढ़ी, जिससे औपनिवेशिक पूंजीवाद को वैधता मिली।

2. “पूंजीवाद का विरोध” — उदारतावाद की कमजोरी नहीं

उदारतावाद पूंजीवाद का विरोध नहीं, बल्कि उसका वैचारिक स्तंभ (Ideological foundation) है।
इस विचारधारा के अनुसार —

व्यक्ति को अपनी संपत्ति अर्जित करने, प्रतिस्पर्धा करने और आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार है।
  • जॉन लॉक (John Locke) ने निजी संपत्ति को प्राकृतिक अधिकार कहा।
  • एडम स्मिथ (Adam Smith) ने “The Wealth of Nations” (1776) में मुक्त बाजार (Free Market) और अदृश्य हाथ (Invisible Hand) के सिद्धांत द्वारा पूंजीवाद को वैधता दी।
  • जे.एस. मिल (J.S. Mill) ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाज की प्रगति का मूल है।

इन विचारों से स्पष्ट है कि उदारतावाद पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का समर्थन करता है, क्योंकि यह निजी संपत्ति, व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा और लाभ प्रेरणा (Profit motive) पर आधारित है।

3. मार्क्सवादी आलोचना

कार्ल मार्क्स ने उदारतावाद को बुर्जुआ वर्ग (Bourgeoisie class) की विचारधारा बताया।

“Liberalism is the political ideology of the capitalist class.” — Karl Marx

मार्क्स के अनुसार उदारतावाद श्रमिक वर्ग (Proletariat) के शोषण को “स्वतंत्रता” और “समान अवसर” के नाम पर छिपाता है।
इसलिए मार्क्सवाद ने उदारतावाद को एक वर्गीय वैचारिकी (Class ideology) कहा।

  • उदारतावाद की कई ऐतिहासिक कमजोरियाँ हैं — जैसे सामाजिक असमानता, पूंजीवादी पक्षपात, और रूढ़िवादिता।
  • परंतु “पूंजीवाद का विरोध” उसकी कमजोरी नहीं है, क्योंकि उदारतावाद ने ही पूंजीवाद को दार्शनिक और नैतिक आधार प्रदान किया।

13. मिल्स के अनुसार विचारधारा की कमजोरी के बावजूद उसकी उपयोगिता क्या है?

(a) वह शासक वर्ग को चुनौती देती है
(b) वह संघर्षों और युद्धों का आधार बनती है
(c) वह समाज को स्थिर करती है
(d) वह धर्म का स्थान लेती है

उत्तर: (b) वह संघर्षों और युद्धों का आधार बनती है

व्याख्या:

सी. राइट मिल्स (C. Wright Mills) के अनुसार विचारधारा (Ideology) समाज में केवल वैचारिक या सैद्धांतिक तत्व नहीं है, बल्कि वह राजनीतिक संघर्षों और ऐतिहासिक परिवर्तनों की प्रेरक शक्ति भी होती है।

भले ही समय के साथ कोई विचारधारा “भ्रष्ट” या “गंवारूपन” (Rusticity) की अवस्था में पहुँच जाए, फिर भी उसकी सामाजिक उपयोगिता समाप्त नहीं होती। वह समाज में मौजूद वर्गों, समूहों और शक्तियों को संघर्ष और परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है।

1. विचारधारा की कमजोरी (Weakness of Ideology)

मिल्स स्वीकार करते हैं कि—

जब कोई विचारधारा किसी समाज में सफल हो जाती है, तो धीरे-धीरे वह यथास्थितिवादी और रूढ़ बन जाती है।

यह “सफलता की विडंबना” है — क्योंकि विचारधारा की क्रांतिकारी ऊर्जा घट जाती है।

उदाहरण:

  • यूरोप में उदारतावाद आरंभ में स्वतंत्रता और समानता का वाहक था, पर बाद में पूंजीवादी व्यवस्था का औचित्य सिद्ध करने वाला बन गया।
  • इसी तरह कुछ समाजों में समाजवाद भी धीरे-धीरे नौकरशाही व्यवस्था में जकड़ गया।

2. विचारधारा की उपयोगिता (Utility of Ideology)

इसके बावजूद मिल्स का मानना है कि —

“Ideologies, however corrupted, continue to be the basis of struggles and wars.” — (C. Wright Mills, “The Marxists,” 1962)

अर्थात् विचारधाराएँ राजनीतिक एवं सामाजिक संघर्षों का आधार और प्रेरणा बनी रहती हैं।

  • वे जनता को संगठित करती हैं।
  • वे वर्गीय चेतना को जागृत करती हैं।
  • वे शासन और सामाजिक ढाँचों को चुनौती देती हैं।

3. विचारधारा और संघर्ष (Ideology and Conflict)

मिल्स के अनुसार —

  • राजनीतिक संघर्ष (Political Conflicts) विचारधारा के बिना संभव नहीं।
  • विचारधारा लोगों को “हम बनाम वे” की चेतना देती है।
  • यही चेतना क्रांतिकारी आंदोलनों, सुधारों और युद्धों की दिशा तय करती है।

उदाहरण के रूप में:

  • मार्क्सवाद ने श्रमिक वर्ग को पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध संगठित किया।
  • राष्ट्रवाद ने उपनिवेशवाद के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्रामों को जन्म दिया।
  • उदारतावाद ने राजशाही के विरुद्ध लोकतंत्र के लिए संघर्ष को प्रेरित किया।

विचारधारा कभी पूर्ण नहीं होती; वह समय, सत्ता और इतिहास से प्रभावित होती है।
फिर भी मिल्स के अनुसार —

“विचारधारा मनुष्य के ऐतिहासिक संघर्षों की आत्मा है।”

इसलिए विचारधारा की कमजोरी के बावजूद उसकी उपयोगिता समाज में संघर्ष, परिवर्तन और चेतना के रूप में बनी रहती है।

14. उदारतावाद (Liberalism) की कौन-सी विशेषता 19वीं शताब्दी के यूरोप में प्रमुख रूप से देखी गई थी?

(a) यह सामंतवाद और एकतंत्रवाद का समर्थन करता था
(b) यह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का विरोध करता था
(c) यह सामंतवाद और एकतंत्रवाद के विरोध में खड़ा था
(d) यह पूंजीवाद को समाप्त करने का प्रयास था

उत्तर: (c) यह सामंतवाद और एकतंत्रवाद के विरोध में खड़ा था

व्याख्या:

19वीं शताब्दी का यूरोप राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों से गुजर रहा था। इसी दौर में उदारतावाद (Liberalism) एक शक्तिशाली वैचारिक आंदोलन के रूप में उभरा, जिसने सामंतवाद (Feudalism) और निरंकुश राजतंत्र (Absolute Monarchy) के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)

  • फ्रांसीसी क्रांति (1789) के बाद “स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व” (Liberty, Equality, Fraternity) के सिद्धांतों ने पूरे यूरोप को प्रभावित किया।
  • इसने सामंतवादी व्यवस्था की जकड़न, वंशानुगत विशेषाधिकारों और निरंकुश राजशाही को चुनौती दी।
  • उदारतावाद इसी सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का वैचारिक आधार बना।

2. उदारतावाद की मुख्य विशेषताएँ (Core Features of Liberalism)

सी. राइट मिल्स और अन्य समाजशास्त्रियों के अनुसार, 19वीं शताब्दी का उदारतावाद निम्नलिखित विशेषताओं से पहचाना गया—

  1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Individual Liberty):
    व्यक्ति को राज्य और धर्म की जबरदस्ती से मुक्त रखने का आग्रह।
  2. विधि का शासन (Rule of Law):
    सभी नागरिकों पर समान कानून का पालन।
  3. संसदीय लोकतंत्र (Parliamentary Democracy):
    निरंकुश राजा के स्थान पर प्रतिनिधिक शासन की स्थापना।
  4. निजी संपत्ति का अधिकार (Right to Private Property):
    व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता का समर्थन।
  5. समान अवसर (Equality of Opportunity):
    जन्माधारित विशेषाधिकारों का विरोध।

3. सामंतवाद और एकतंत्रवाद के विरोध में उदारतावाद

उदारतावादी विचारक जैसे—

  • जॉन लॉक (John Locke) ने “Natural Rights” और “Consent of the Governed” का सिद्धांत दिया।
  • मोंतेस्क्यू (Montesquieu) ने सत्ता-विभाजन (Separation of Powers) की अवधारणा दी।
  • रूसो (Rousseau) ने “सामाजिक अनुबंध” (Social Contract) के माध्यम से जनसत्ता का विचार प्रस्तुत किया।

इन सभी विचारों का लक्ष्य था — राजा और सामंती व्यवस्था की मनमानी को समाप्त करना।
इस प्रकार, उदारतावाद एक विरोधी शक्ति (anti-feudal and anti-monarchical ideology) के रूप में उभरा।

4. मार्क्सवादी दृष्टिकोण से विश्लेषण (Marxist Interpretation)

मार्क्सवादी दृष्टिकोण में, उदारतावाद को पूंजीवादी वर्ग की विचारधारा माना गया।

  • यह वर्ग सामंती उत्पीड़न से मुक्त होकर अपनी आर्थिक शक्ति को राजनीतिक रूप से स्थापित करना चाहता था।
  • अतः मार्क्सवादियों के अनुसार, उदारतावाद ने सामंतवाद को समाप्त करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई,
    परंतु अंततः वह नए पूंजीवादी शोषण तंत्र की वैचारिक नींव बन गया।

इसलिए —

“उदारतावाद इतिहास में सामंतवाद के विरुद्ध प्रगतिशील, और पूंजीवाद के समर्थन में प्रतिक्रियावादी भूमिका निभाता है।” — (Karl Marx, The Communist Manifesto, 1848)

19वीं शताब्दी में उदारतावाद ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के नाम पर
सामंतवादी और निरंकुश व्यवस्थाओं को चुनौती दी।
इसने यूरोप में आधुनिक लोकतंत्र और संवैधानिक शासन की नींव रखी।

15. सी. राइट मिल्स (C. Wright Mills) के अनुसार 19वीं शताब्दी के मध्य में इतिहास की गति के साथ कौन-से चार तत्व एक साथ चलते रहे?

(a) वर्ग, उत्पादन, विचारधारा, संघर्ष
(b) विचारधारा, आदर्श, एजेन्सी, सिद्धान्त
(c) शक्ति, राज्य, समाज, संस्कृति
(d) उत्पादन, श्रम, पूंजी, चेतना

उत्तर: (b) विचारधारा, आदर्श, एजेन्सी, सिद्धान्त

व्याख्या:

सी. राइट मिल्स (1916–1962) ने अपनी प्रसिद्ध कृति “The Sociological Imagination” (1959) तथा अन्य निबंधों में यह समझाने का प्रयास किया कि इतिहास केवल “घटनाओं” का क्रम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक विचारों और मानवीय क्रियाशीलता का संयुक्त परिणाम है।

उन्होंने कहा कि समाज के बौद्धिक इतिहास (intellectual history) में चार प्रमुख तत्व हमेशा एक साथ चलते हैं —

  1. विचारधारा (Ideology):
    समाज की प्रमुख मान्यताएँ और विचारधाराएँ यह निर्धारित करती हैं कि लोग दुनिया को कैसे देखते हैं। उदाहरण के लिए, उदारतावाद (Liberalism) और समाजवाद (Socialism) दोनों ने 19वीं शताब्दी की राजनीतिक दिशा को आकार दिया।
  2. आदर्श (Ideal):
    यह समाज के नैतिक और सांस्कृतिक लक्ष्यों को दर्शाता है — जैसे स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व (French Revolution के मूल्य)। ये आदर्श जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  3. एजेन्सी (Agency):
    यह वह शक्ति है जिसके माध्यम से व्यक्ति या समूह सामाजिक परिवर्तन लाते हैं। जैसे – क्रांतिकारी नेता, सुधारक या सामाजिक आंदोलन।
  4. सिद्धान्त (Theory):
    यह बौद्धिक औज़ार है जो समाज के कार्य-प्रणाली को समझाने और परिवर्तन के मार्ग को निर्देशित करने में मदद करता है।

मिल्स के अनुसार, ये चारों तत्व समाज के वैचारिक ढाँचे (ideational structure) को बनाते हैं और किसी भी युग की ऐतिहासिक गति इन्हीं के परस्पर संबंधों से संचालित होती है।

उनका कहना था —
“History is not only about what happens, but about what men think and how they act upon their thoughts.”
— (C. Wright Mills, The Sociological Imagination, 1959)

19वीं शताब्दी का यूरोप केवल औद्योगिक या आर्थिक परिवर्तन का दौर नहीं था, बल्कि यह विचारों, आदर्शों, व्यक्तियों की सक्रियता (agency) और सैद्धांतिक ढाँचों की जटिल अंतःक्रिया का भी परिणाम था।
सी. राइट मिल्स ने इस पारस्परिक संबंध को समाजशास्त्रीय समझ के केंद्र में रखा।

16.
कथन–I: मार्क्सवादी विचारधारा का उद्देश्य पूंजीवादी व्यवस्था का सुधार करना था।
कथन–II: मार्क्सवाद एक क्रांतिकारी विचारधारा थी जो पूंजीवादी ढांचे को समाप्त करना चाहती थी।

(a) कथन–I और II दोनों सही हैं और II, I का सही कारण है।
(b) कथन–I और II दोनों सही हैं लेकिन II, I का कारण नहीं है।
(c) कथन–I गलत है लेकिन कथन–II सही है।
(d) कथन–I सही है लेकिन कथन–II गलत है।

उत्तर: (c) कथन–I गलत है लेकिन कथन–II सही है।

व्याख्या:

1. मार्क्सवाद का मूल उद्देश्य सुधार (Reform) नहीं, बल्कि क्रांति (Revolution) है।
मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार, पूंजीवाद (Capitalism) स्वयं में शोषणकारी (exploitative) व्यवस्था है, जिसमें पूंजीपति वर्ग (Bourgeoisie) श्रमिक वर्ग (Proletariat) का शोषण करता है।
इसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में सुधार (Reform) से नहीं, बल्कि क्रांतिकारी परिवर्तन (Revolutionary Change) से ही वर्गहीन समाज (Classless Society) की स्थापना संभव है।

“The philosophers have only interpreted the world in various ways; the point, however, is to change it.”
Karl Marx, Theses on Feuerbach (1845)

2. मार्क्सवाद का लक्ष्य पूंजीवाद को “सुधारना” नहीं बल्कि “उखाड़ फेंकना” था।
मार्क्स ने Communist Manifesto (1848) में लिखा कि इतिहास वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) का इतिहास है, और यह संघर्ष अंततः एक क्रांतिकारी परिवर्तन में परिणत होगा, जिससे सर्वहारा (working class) सत्ता में आएगा।

“The theory of the Communists may be summed up in the single sentence: Abolition of private property.”
Marx & Engels, The Communist Manifesto (1848)

इस कथन से स्पष्ट है कि मार्क्सवाद का उद्देश्य पूंजीवादी ढाँचे का सुधार नहीं, बल्कि पूंजीवाद के पूर्ण उन्मूलन के द्वारा साम्यवादी समाज (Communist Society) की स्थापना था।

3. सुधारवादी दृष्टिकोण (Reformism) की आलोचना:
मार्क्सवादी दृष्टिकोण में “Reformism” को केवल अस्थायी उपाय माना गया है, क्योंकि इससे मूल आर्थिक असमानता समाप्त नहीं होती।
मार्क्स के अनुसार, “राजनीतिक सुधार पूंजीवाद की जड़ों को नहीं छूते, केवल उसके लक्षणों को बदलते हैं।”

इसलिए मार्क्सवादी परंपरा में “Revolution” ही वास्तविक समाधान है।

सारांश (Summary):

तत्वमार्क्सवादी दृष्टिकोण
उद्देश्यपूंजीवाद का उन्मूलन
साधनसर्वहारा क्रांति
परिणामवर्गहीन समाज की स्थापना
सुधार (Reform)अस्थायी और सतही उपाय
कथन–I गलत है क्योंकि मार्क्सवाद पूंजीवादी व्यवस्था को "सुधारना" नहीं चाहता,
जबकि कथन–II सही है क्योंकि मार्क्सवाद का लक्ष्य पूंजीवादी ढाँचे को समाप्त करके एक नया समाजवादी–साम्यवादी समाज बनाना है।

17. सूची–मिलान

सूची–I (विचारधारा)सूची–II (मुख्य विशेषता)
A. उदारतावाद2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पूंजीवादी प्रजातंत्र
B. मार्क्सवाद1. वर्ग संघर्ष और पूंजीवाद का विरोध
C. सामंतवाद3. परंपरागत अधिकार और वंशगत शासन
D. सर्वहारा क्रांति4. पूंजीवादी ढांचे के उन्मूलन का प्रयास

उत्तर: (a) A–2, B–1, C–3, D–4

(a) A–2, B–1, C–3, D–4
(b) A–1, B–2, C–3, D–4
(c) A–2, B–4, C–1, D–3
(d) A–3, B–2, C–1, D–4

उत्तर: (a) A–2, B–1, C–3, D–4

व्याख्या:

उदारतावाद (Liberalism) → व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पूंजीवादी प्रजातंत्र

मुख्य विचार:
उदारतावाद की नींव “Liberty, Equality, Fraternity” (स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व) पर रखी गई थी।
यह विचार फ्रांसीसी क्रांति (1789) के बाद उभरा और 19वीं शताब्दी के यूरोप में एक राजनीतिक–आर्थिक आंदोलन के रूप में फैला।

मुख्य विशेषताएँ:

  • व्यक्ति सर्वोच्च है, न कि राज्य।
  • निजी संपत्ति का अधिकार और बाज़ार अर्थव्यवस्था का समर्थन।
  • प्रतिनिधि लोकतंत्र और विधि के शासन (Rule of Law) की वकालत।

“Liberalism is the ideology of freedom — freedom of the individual, of property, and of enterprise.”
John Locke, Two Treatises of Government (1690)

इसलिए उदारतावाद को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पूंजीवादी लोकतंत्र की विचारधारा माना जाता है।

मार्क्सवाद (Marxism) → वर्ग संघर्ष और पूंजीवाद का विरोध

मुख्य विचार:
मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है।
पूंजीवाद (Capitalism) में बुर्जुआ वर्ग (Bourgeoisie) श्रमिक वर्ग (Proletariat) का शोषण करता है।

मुख्य लक्ष्य:

  • वर्ग संघर्ष (Class Struggle) के माध्यम से समाज परिवर्तन।
  • पूंजीवादी उत्पादन संबंधों का अंत।
  • वर्गहीन और राज्यविहीन साम्यवादी समाज की स्थापना।

“The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.”
Karl Marx & Friedrich Engels, The Communist Manifesto (1848)

इसलिए मार्क्सवाद पूंजीवाद का विरोध करता है और उसे वर्ग संघर्ष का स्रोत मानता है।

सामंतवाद (Feudalism) → परंपरागत अधिकार और वंशगत शासन

मुख्य विचार:
सामंतवाद मध्यकालीन यूरोप (9वीं से 15वीं शताब्दी) की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था थी,
जो भूमि, वंश, और निष्ठा पर आधारित थी।

मुख्य विशेषताएँ:

  • सत्ता वंशगत उत्तराधिकार पर आधारित।
  • भूमि स्वामित्व के बदले निष्ठा (Fealty) का संबंध।
  • समाज में कठोर श्रेणीकरण (Hierarchy)।

“Feudal society was based on inherited privilege and hierarchical obligations.”
Marc Bloch, Feudal Society (1939)

इसलिए सामंतवाद की पहचान परंपरागत अधिकार और वंशगत शासन से होती है।

सर्वहारा क्रांति (Proletarian Revolution) → पूंजीवादी ढांचे के उन्मूलन का प्रयास

मुख्य विचार:
मार्क्सवादी दर्शन में “सर्वहारा क्रांति” (Proletarian Revolution) वह ऐतिहासिक क्षण है जब
श्रमिक वर्ग पूंजीपति वर्ग के विरुद्ध उठ खड़ा होता है और उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण स्थापित करता है।

मुख्य लक्ष्य:

  • पूंजीवादी ढाँचे (Capitalist Structure) का अंत।
  • वर्गहीन समाज की स्थापना।
  • उत्पादन के साधनों का सामूहिक स्वामित्व।

“Workers of the world, unite! You have nothing to lose but your chains.”
The Communist Manifesto (1848)

इस प्रकार सर्वहारा क्रांति को पूंजीवादी व्यवस्था के उन्मूलन का साधन माना गया है।

सारांश तालिका:

विचारधारामुख्य विशेषताव्याख्या
A. उदारतावादव्यक्तिगत स्वतंत्रता, पूंजीवादी लोकतंत्रपूंजीवादी जनतंत्र और व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा
B. मार्क्सवादवर्ग संघर्ष और पूंजीवाद का विरोधवर्गहीन समाज की स्थापना हेतु क्रांति
C. सामंतवादवंशगत शासन, पारंपरिक अधिकारमध्यकालीन शासकीय संरचना
D. सर्वहारा क्रांतिपूंजीवादी ढाँचे का उन्मूलनउत्पादन के साधनों पर श्रमिक नियंत्रण
इन चारों विचारधाराओं की ऐतिहासिक एवं वैचारिक पहचान उनके सामाजिक–आर्थिक उद्देश्यों से होती है।
उदारतावाद ने पूंजीवाद को जन्म दिया, मार्क्सवाद ने उसका विरोध किया,
सामंतवाद उसका पूर्ववर्ती चरण था, और सर्वहारा क्रांति उसका ऐतिहासिक प्रतिवाद।

Mohan Exam

18. मार्क्स ने “दार्शनिक विभिन्न तरीकों से विश्व की व्याख्या करते आये हैं, मुख्य सवाल यह है कि इसे बदला कैसे जाये” — इस कथन से क्या अभिप्रेत किया?

(a) समाज को समझने के लिए केवल दर्शन पर्याप्त है।
(b) केवल व्याख्या नहीं, बल्कि व्यावहारिक परिवर्तन आवश्यक है।
(c) समाज में परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है।
(d) मार्क्स वैज्ञानिक दर्शन का विरोध करते थे।

उत्तर: (b) केवल व्याख्या नहीं, बल्कि व्यावहारिक परिवर्तन आवश्यक है।

व्याख्या:

कथन का स्रोत

यह वाक्य कार्ल मार्क्स (Karl Marx) की रचना
“Theses on Feuerbach” [“थीसिस ऑन फायरबाख ”] (1845)
की 11वीं और अंतिम थीसिस से लिया गया है।

इस ग्रंथ में मार्क्स ने दार्शनिक लुडविग फायरबाख (Ludwig Feuerbach) की आलोचना करते हुए कहा कि

“Philosophers have only interpreted the world in various ways; the point, however, is to change it.”

कथन का अर्थ

मार्क्स यह कहना चाहते हैं कि —

  • पारंपरिक दार्शनिक (traditional philosophers) केवल सोचते और व्याख्या करते रहे कि समाज कैसे काम करता है।
  • लेकिन मार्क्स का लक्ष्य था कि इस समाज को बदला जाए, ख़ासकर आर्थिक और वर्गीय अन्याय (class inequality) को खत्म किया जाए।

यानी ज्ञान (Knowledge) का उद्देश्य केवल समझना नहीं,
बल्कि व्यावहारिक परिवर्तन (Practical Change) लाना है।

ऐतिहासिक और वैचारिक पृष्ठभूमि

  • 19वीं शताब्दी में यूरोप में दर्शनशास्त्र मुख्यतः विचार और चेतना (ideas & consciousness) पर केंद्रित था।
  • फायरबाख ने धर्म और ईश्वर की आलोचना की थी, लेकिन समाज को बदलने की दिशा नहीं दी थी।
  • मार्क्स ने कहा — केवल धर्म की आलोचना या मानव स्वभाव की व्याख्या पर्याप्त नहीं;
    समाज को बदलने के लिए क्रांतिकारी क्रिया (Revolutionary Praxis) ज़रूरी है।

Praxis की अवधारणा (Concept of Praxis)

Praxis = Theory + Action (सिद्धांत + कर्म)

मार्क्स के अनुसार:

“जब तक विचार को व्यवहार में नहीं बदला जाता, तब तक वह अधूरा है।”

इसलिए उन्होंने कहा कि समाजशास्त्र या दर्शन का उद्देश्य
“विचारों की व्याख्या” नहीं, बल्कि “संरचनाओं को बदलना” होना चाहिए —
जैसे पूँजीवाद (Capitalism) की शोषक व्यवस्था को समाप्त करना।

दार्शनिक तुलना (Philosophical Comparison)

पक्षपारंपरिक दर्शन (Feuerbach, Hegel)मार्क्स का दर्शन
दृष्टिकोणकेवल व्याख्याव्याख्या + परिवर्तन
केन्द्रविचार और चेतनाभौतिक परिस्थितियाँ
उद्देश्यज्ञान प्राप्त करनासमाज को बदलना
विधिचिंतन (Reflection)कर्म (Action / Praxis)

समाजशास्त्रीय महत्व

यह कथन मार्क्सवादी समाजशास्त्र (Marxian Sociology) की नींव है।
इससे निकले प्रमुख सिद्धांत —

  • वर्ग संघर्ष (Class Struggle)
  • ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism)
  • उत्पादन संबंध (Relations of Production)
  • सामाजिक परिवर्तन (Social Change through Revolution)

इन सभी का उद्देश्य है —

सामाजिक असमानता को खत्म कर एक वर्गविहीन समाज (Classless Society) का निर्माण करना।

मार्क्स के अनुसार —

दर्शन को निष्क्रिय चिंतन नहीं, बल्कि सक्रिय क्रिया (Active Practice) बनना चाहिए।
जब तक विचार को कर्म में नहीं बदला जाएगा, समाज में वास्तविक परिवर्तन असंभव है।

यही कारण है कि यह कथन क्रांतिकारी दर्शन (Revolutionary Philosophy) की आधारशिला माना जाता है।


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