कार्ल मार्क्स MCQs – द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और संघर्ष सिद्धांत के महत्वपूर्ण प्रश्न

कार्ल मार्क्स : द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद एवं संघर्ष सिद्धान्त “बहुविकल्पीय प्रश्न” (Multiple Choice Questions) विस्तृत व्याख्या सहित

Karl Marx से संबंधित समाजशास्त्र के सभी महत्वपूर्ण विषयों पर आधारित UGC NET/JRF स्तर के MCQs तैयार किए हैं। हर प्रश्न के साथ उसकी विस्तृत व्याख्या (Detailed Explanation) दी गई है, ताकि आप केवल उत्तर न याद करें, बल्कि गहराई से समझ सकें।

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1. मार्क्स के अनुसार, सामाजिक गैर-बराबरी (Social Inequality) का मूल कारण क्या है?

(a) सांस्कृतिक भिन्नता
(b) वर्ग संरचना और उत्पादन संबंधों में असमानता
(c) राजनीतिक संस्थाओं की कमजोरी
(d) शिक्षा और तकनीकी विकास का अभाव

उत्तर: (b) वर्ग संरचना और उत्पादन संबंधों में असमानता

व्याख्या:

कार्ल मार्क्स के अनुसार समाज की संरचना का आधार आर्थिक ढांचा (Economic Base) होता है।
यह ढांचा दो प्रमुख तत्वों पर आधारित होता है —

  1. उत्पादन के साधन (Means of Production) – जैसे भूमि, मशीनें, पूँजी, उपकरण आदि।
  2. उत्पादन संबंध (Relations of Production) – यानी कौन इन साधनों का मालिक है और कौन श्रम प्रदान करता है।

जब एक वर्ग (Bourgeoisie) उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण कर लेता है और दूसरा वर्ग (Proletariat) केवल श्रम बेचता है, तो समाज में आर्थिक असमानता उत्पन्न होती है।
यही आर्थिक असमानता सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गैर-बराबरी का मूल स्रोत बनती है।

मार्क्स के अनुसार —

“The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.”
Karl Marx & Friedrich Engels, The Communist Manifesto (1848)

इस प्रकार, जब तक वर्ग और उत्पादन संबंधों में असमानता बनी रहती है, तब तक समानता संभव नहीं।
मार्क्स का समाधान क्रांति (Revolution) के माध्यम से वर्गहीन समाज (Classless Society) की स्थापना था।

मुख्य अवधारणाएँ :

अवधारणाविवरण
Economic Base (आर्थिक आधार)उत्पादन साधन + उत्पादन संबंध
Superstructure (अधिरचना)राजनीति, धर्म, शिक्षा, कानून आदि
Class Conflict (वर्ग संघर्ष)शोषक व शोषित वर्गों के बीच संघर्ष
Revolution (क्रांति)वर्गहीन समाज की दिशा में परिवर्तन की प्रक्रिया
मार्क्स के अनुसार सामाजिक असमानता की जड़ आर्थिक असमानता में निहित है।
जब तक वर्गीय ढाँचा और उत्पादन संबंधों में अंतर बना रहेगा, तब तक समाज में वास्तविक समानता संभव नहीं है।

2.
कथन–I: पूंजीवाद में गैर-बराबरी को उदारतावादी सुधारों से समाप्त किया जा सकता है।
कथन–II: मार्क्स का विश्वास था कि पूंजीवादी व्यवस्था केवल क्रांति से ही नष्ट हो सकती है।


(a) दोनों कथन सही हैं और II, I का सही कारण है।
(b) दोनों कथन सही हैं पर II, I का कारण नहीं है।
(c) कथन–I गलत है पर कथन–II सही है।
(d) कथन–I सही है पर कथन–II गलत है।

उत्तर: (c) कथन–I गलत है पर कथन–II सही है।

व्याख्या:

मार्क्स के अनुसार, पूंजीवाद (Capitalism) एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था है जिसमें उत्पादन के साधनों (means of production) का स्वामित्व कुछ पूँजीपतियों (bourgeoisie) के पास केंद्रित रहता है और अधिकांश लोग (proletariat) केवल अपनी श्रमशक्ति बेचने के लिए बाध्य होते हैं।

इस व्यवस्था में असमानता की जड़ संरचनात्मक (structural) होती है — यानी यह केवल व्यक्तिगत अन्याय नहीं बल्कि उत्पादन संबंधों (relations of production) में निहित होती है।

इसलिए, मार्क्स का मानना था कि उदारतावादी सुधार (liberal reforms) जैसे मजदूरी बढ़ाना, करों में बदलाव या श्रम कानूनों में सुधार — केवल असमानता के “लक्षणों” को कम करते हैं, मूल कारण को नहीं।

समानता तभी संभव है जब पूंजीवादी व्यवस्था पूरी तरह नष्ट हो जाए और उसकी जगह वर्गहीन समाज (classless society) स्थापित हो — जो केवल क्रांति (revolution) से संभव है।

मुख्य अवधारणाएँ :

अवधारणाविवरण
Reform vs Revolutionसुधार पूंजीवाद की संरचना को बनाए रखते हैं; क्रांति उसे जड़ से बदल देती है।
Class Conflict (वर्ग-संघर्ष)पूँजीपति और श्रमिक वर्ग के हित आपस में विरोधी हैं।
Surplus Value (अधिशेष मूल्य)मजदूर के श्रम से उत्पन्न मूल्य का एक भाग पूँजीपति द्वारा हड़प लिया जाता है।
Revolutionary Changeसमाज का रूपांतरण आर्थिक ढांचे में आमूल परिवर्तन से ही संभव है।
मार्क्स ने स्पष्ट कहा कि पूंजीवादी व्यवस्था में सुधारों से केवल असमानता के रूप बदलते हैं, परन्तु शोषण की जड़ बनी रहती है।
वास्तविक समानता क्रांतिकारी परिवर्तन (revolutionary change) से ही संभव है।
अतः —
कथन–I गलत है (क्योंकि सुधार असमानता समाप्त नहीं कर सकते)
कथन–II सही है (क्योंकि मार्क्स ने केवल क्रांति को ही समाधान माना)।

3. नीचे दी गई सूची–I में मार्क्स की कृतियाँ दी गई हैं और सूची–II में उनकी विषयवस्तु या प्रकृति। सही मिलान कीजिए –

सूची–I (कृतियाँ)सूची–II (विषय)
A. Das Kapital1. राजनीतिक अर्थशास्त्र का विश्लेषण
B. Economic and Philosophic Manuscripts (1844)2. श्रम-विमुखता और मानव-स्वभाव का दार्शनिक विश्लेषण
C. The Poverty of Philosophy3. पूंजीवादी समाज की आलोचना के प्रतिउत्तर में रचना
D. A Contribution to the Critique of Political Economy4. ऐतिहासिक भौतिकवाद का आर्थिक आधार

(a) A–1, B–2, C–3, D–4
(b) A–4, B–1, C–2, D–3
(c) A–2, B–3, C–1, D–4
(d) A–1, B–4, C–2, D–3

उत्तर: (a) A–1, B–2, C–3, D–4

व्याख्या:

मार्क्स की कृतियाँ उनके बौद्धिक विकास (intellectual evolution) को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं —
जहाँ वे प्रारंभ में दार्शनिक दृष्टिकोण से शुरू करते हैं, वहीं बाद में आर्थिक विश्लेषण की ओर मुड़ते हैं और अंततः ऐतिहासिक भौतिकवाद का वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करते हैं।

Das Kapital — राजनीतिक अर्थशास्त्र का विश्लेषण

  • प्रकाशन वर्ष: 1867 (Volume I)
  • मुख्य विषय: पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली का गहन अध्ययन।
  • मुख्य अवधारणाएँ:
    • Surplus Value (अधिशेष मूल्य)
    • Commodity Fetishism (वस्तु-पूजा)
    • Exploitation of Labour (श्रम का शोषण)
  • उद्देश्य: पूंजीवाद की आंतरिक विरोधाभासों को उजागर कर उसे वैज्ञानिक रूप से समझना।
  • संदर्भ: Marx, Das Kapital, Vol. I (1867)

Economic and Philosophic Manuscripts (1844) — श्रम-विमुखता और मानव-स्वभाव का दार्शनिक विश्लेषण

  • प्रकाशन वर्ष: 1844 (मरणोपरांत प्रकाशित – 1932)
  • मुख्य विषय: Alienation of Labour (श्रम-विमुखता)
  • व्याख्या:
    • मजदूर अपने कार्य, उत्पाद, और मानव स्वभाव से विमुख हो जाता है।
    • यह मार्क्स के “मानवतावादी” (Humanist) चरण की रचना है।
  • संदर्भ: Economic and Philosophic Manuscripts of 1844, Marx Early Works

The Poverty of Philosophy — पूंजीवादी समाज की आलोचना के प्रतिउत्तर में रचना

  • प्रकाशन वर्ष: 1847
  • पृष्ठभूमि: फ्रांसीसी अर्थशास्त्री Proudhon की पुस्तक The Philosophy of Poverty (1846) के प्रत्युत्तर में लिखी गई।
  • मुख्य विचार:
    • समाज की आर्थिक संरचना को समझने के लिए आदर्शवादी दर्शन पर्याप्त नहीं।
    • सामाजिक परिवर्तन का वास्तविक कारण भौतिक उत्पादन संबंध हैं।
  • संदर्भ: Marx, The Poverty of Philosophy (1847)

A Contribution to the Critique of Political Economy — ऐतिहासिक भौतिकवाद का आर्थिक आधार

  • प्रकाशन वर्ष: 1859
  • महत्व:
    • इसमें पहली बार मार्क्स ने अपना “Base–Superstructure Model” विस्तार से प्रस्तुत किया।
    • प्रसिद्ध उद्धरण: “The mode of production of material life determines the general character of the social, political and intellectual life.”
  • यह Das Kapital का वैचारिक पूर्वरूप (intellectual precursor) माना जाता है।
  • संदर्भ: Marx, A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)
मार्क्स की बौद्धिक यात्रा “मानवतावादी दर्शन” से “वैज्ञानिक समाजवाद” की ओर बढ़ती है।
उनकी कृतियाँ दार्शनिक, आर्थिक और ऐतिहासिक तीनों दृष्टियों से पूंजीवाद की गहन आलोचना प्रस्तुत करती हैं।

4. निम्न में से कौन-सा कथन “द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद” (Dialectical Materialism) की सही व्याख्या करता है?

(a) यह विचारों की उत्पत्ति का विशुद्ध दार्शनिक दृष्टिकोण है।
(b) यह समाज के विकास को विचारों के संघर्ष से समझाने का सिद्धांत है।
(c) यह सामाजिक परिवर्तन को भौतिक परिस्थितियों के द्वन्द्वात्मक संघर्ष से उत्पन्न मानता है।
(d) यह केवल आर्थिक उत्पादन को ही सामाजिक विकास का कारण मानता है।

उत्तर: (c) यह सामाजिक परिवर्तन को भौतिक परिस्थितियों के द्वन्द्वात्मक संघर्ष से उत्पन्न मानता है।

व्याख्या:

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) मार्क्सवादी दर्शन का मूलभूत आधार है।
यह दो मुख्य विचारों का संयोजन है:

  1. Dialectics (द्वन्द्ववाद) — जो हेगेल से लिया गया सिद्धांत है; यह मानता है कि हर वस्तु और विचार अपने भीतर विरोध (contradiction) रखता है, और इसी विरोध से परिवर्तन उत्पन्न होता है।
  2. Materialism (भौतिकवाद) — यह मानता है कि वास्तविकता का आधार भौतिक परिस्थितियाँ (material conditions) हैं, न कि विचार या चेतना।

मार्क्स ने हेगेल के “आदर्शवादी द्वन्द्ववाद” (Idealist Dialectics) को उलट दिया।
हेगेल ने कहा — विचार (Idea) जगत को बदलते हैं,
जबकि मार्क्स ने कहा — “भौतिक परिस्थितियाँ” (Material Conditions) विचारों को जन्म देती हैं।

“It is not the consciousness of men that determines their being, but their social being that determines their consciousness.”
Karl Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)

इसलिए, सामाजिक परिवर्तन विचारों के संघर्ष से नहीं, बल्कि भौतिक परिस्थितियों में निहित विरोधों (contradictions in material conditions) से होता है — यही “द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद” का सार है।

मुख्य सिद्धांत

सिद्धांतविवरण
विरोध (Contradiction)प्रत्येक समाज के भीतर विरोधी शक्तियाँ (जैसे वर्ग) विद्यमान रहती हैं।
परिवर्तन (Change)इन विरोधों का संघर्ष ही सामाजिक परिवर्तन का कारण बनता है।
भौतिक प्राथमिकता (Material Priority)भौतिक परिस्थितियाँ विचारों से पहले आती हैं; वे ही चेतना को निर्धारित करती हैं।
ऐतिहासिक भौतिकवाद का आधारDialectical Materialism, Marx के Historical Materialism की दार्शनिक नींव है।
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद वह दृष्टिकोण है जो यह मानता है कि विचार नहीं, बल्कि भौतिक परिस्थितियाँ समाज की दिशा निर्धारित करती हैं।
परिवर्तन का कारण विरोधों का संघर्ष (dialectical contradictions) है — और यही समाज को एक चरण से दूसरे चरण की ओर ले जाता है।

5. मार्क्स के “संघर्ष सिद्धांत” और “संघर्ष विचारधारा” (Conflict Ideology) में मूलभूत अंतर क्या है?

(a) संघर्ष विचारधारा केवल नैतिकता पर आधारित होती है, जबकि संघर्ष सिद्धांत वैज्ञानिक विश्लेषण पर।
(b) दोनों समान हैं, केवल नाम अलग है।
(c) संघर्ष विचारधारा दार्शनिक है जबकि संघर्ष सिद्धांत धार्मिक।
(d) संघर्ष सिद्धांत विचारधारा की आलोचना करता है।

उत्तर: (a) संघर्ष विचारधारा केवल नैतिकता पर आधारित होती है, जबकि संघर्ष सिद्धांत वैज्ञानिक विश्लेषण पर।

व्याख्या:

मार्क्स ने सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या संघर्ष के सिद्धांत (Conflict Theory) के माध्यम से की, परंतु साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विचारधारा (Ideology) एक मानसिक (ideational) या नैतिक संरचना है, जो वर्ग-हितों से संचालित होती है।

1. संघर्ष सिद्धांत (Conflict Theory):

  • यह समाज के वर्गीय विरोधों (class antagonisms) और आर्थिक संरचना (economic structure) का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है।
  • इसका उद्देश्य यह समझना है कि समाज में असमानता और शोषण कैसे उत्पन्न होते हैं, और कैसे यह अंततः वर्ग-संघर्ष (class struggle) द्वारा समाप्त होते हैं।
  • मार्क्स का दृष्टिकोण यहाँ वैज्ञानिक समाजवाद (Scientific Socialism) कहलाता है, क्योंकि वह अनुभवजन्य (empirical) और वस्तुगत (objective) विश्लेषण पर आधारित है।
“The philosophers have only interpreted the world, in various ways; the point, however, is to change it.”
Karl Marx, Theses on Feuerbach (1845)

यह वाक्य दिखाता है कि मार्क्स का संघर्ष सिद्धांत क्रियात्मक परिवर्तन (practical change) पर केंद्रित है, लेकिन वह परिवर्तन वैज्ञानिक विश्लेषण से उत्पन्न होना चाहिए, न कि केवल भावनात्मक विचारधारा से।

2. संघर्ष विचारधारा (Conflict Ideology):

  • यह नैतिक, भावनात्मक या राजनीतिक प्रेरणा पर आधारित होती है।
  • इसका उद्देश्य जनता को संगठित करना, आंदोलन को दिशा देना और “सामाजिक अन्याय के विरुद्ध चेतना” फैलाना होता है।
  • यह “क्या होना चाहिए” (normative) की बात करती है, जबकि सिद्धांत “क्या है” (positive/analytical) की जांच करता है।
  • उदाहरण: प्रारंभिक यूटोपियन समाजवादी (Utopian Socialists) — जैसे Saint-Simon, Fourier और Owen — संघर्ष विचारधारा पर आधारित थे, न कि वैज्ञानिक विश्लेषण पर।
“The socialist and communist systems of Saint-Simon, Fourier, Owen... were utopian because they could not explain the historical process of class struggle scientifically.”
Friedrich Engels, Socialism: Utopian and Scientific (1880)

संघर्ष सिद्धांत बनाम संघर्ष विचारधारा — तुलनात्मक सारणी

तत्वसंघर्ष सिद्धांत (Conflict Theory)संघर्ष विचारधारा (Conflict Ideology)
आधार (Basis)वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारितनैतिक या भावनात्मक दृष्टिकोण पर आधारित
उद्देश्य (Purpose)समाज के वास्तविक संघर्षों को समझानासमाज को परिवर्तन हेतु प्रेरित करना
प्रवृत्ति (Nature)विश्लेषणात्मक (Analytical)आदर्शवादी (Normative)
उदाहरणमार्क्स का वर्ग-संघर्ष सिद्धांतप्रारंभिक यूटोपियन समाजवाद
नामकरण“Scientific Socialism”“Utopian Socialism”
मार्क्स के लिए “संघर्ष सिद्धांत” समाज की वैज्ञानिक व्याख्या (scientific explanation) है, जबकि “संघर्ष विचारधारा” समाज के नैतिक-राजनीतिक परिवर्तन (moral motivation) का उपकरण है।
इसीलिए मार्क्स का दृष्टिकोण वैज्ञानिक समाजवाद (Scientific Socialism) कहलाता है — क्योंकि यह आदर्शवाद या भावनात्मक विचारधारा से आगे बढ़कर, समाज की संरचनात्मक वास्तविकताओं का विश्लेषण करता है।

6. मार्क्स के अनुसार “द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद” का मूल उद्देश्य क्या है?

(a) विचारों के माध्यम से यथार्थ की व्याख्या करना
(b) पदार्थ और विचार की एकता को आदर्शवादी रूप में देखना
(c) समाज और प्रकृति के यथार्थ को वैज्ञानिक ढंग से समझना
(d) नैतिक दर्शन को आधार बनाकर सामाजिक सुधार करना

उत्तर: (c) समाज और प्रकृति के यथार्थ को वैज्ञानिक ढंग से समझना।

व्याख्या:

“द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद” (Dialectical Materialism) मार्क्स और एंगेल्स की दार्शनिक पद्धति है, जिसका उद्देश्य था — प्रकृति, समाज और विचार के विकास को वैज्ञानिक एवं वस्तुगत नियमों द्वारा समझना।

1. ‘द्वन्द्वात्मक’ (Dialectical) का अर्थ

  • “द्वन्द्वात्मक” शब्द हेगेल (Hegel) के दर्शन से आया है।
  • हेगेल के अनुसार, विचारों का संघर्ष (contradiction of ideas) इतिहास को आगे बढ़ाता है।
  • लेकिन मार्क्स ने इसे “उलट” दिया — उनके अनुसार, संघर्ष भौतिक परिस्थितियों (material conditions) में होता है, न कि केवल विचारों में।
“My dialectic method is not only different from Hegel’s, but its direct opposite.”
Karl Marx, Afterword to the Second German Edition of Das Kapital (1873)

2. ‘भौतिकवाद’ (Materialism) का अर्थ

  • भौतिक जगत (material world) को प्राथमिक वास्तविकता माना गया है।
  • विचार (ideas), चेतना (consciousness) और संस्कृति (culture) — सभी भौतिक परिस्थितियों का परिणाम हैं।
  • मनुष्य पहले “जीविकोपार्जन” करता है, फिर “विचार” करता है।
“It is not the consciousness of men that determines their being, but their social being that determines their consciousness.”
Karl Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)

3. ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ का वैज्ञानिक उद्देश्य

  • यह एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Outlook) है, जो समाज और प्रकृति दोनों को विकासशील (dynamic) और विरोधाभासी (contradictory) प्रक्रियाओं के रूप में देखता है।
  • हर वस्तु या व्यवस्था में अंतर्निहित द्वन्द्व (internal contradictions) होते हैं, जो परिवर्तन का कारण बनते हैं।
  • इस प्रकार, समाज का विकास “स्थिर” नहीं बल्कि “विरोधों के समाधान” से आगे बढ़ता है।
“Dialectical materialism regards the world as a connected whole, in which things are in motion, change and development.”
Friedrich Engels, Anti-Dühring (1878)

मुख्य तत्व :

तत्वव्याख्या
1. वस्तुगत यथार्थवाद (Objective Realism)समाज और प्रकृति दोनों वस्तुगत वास्तविकताएँ हैं, विचारों की कल्पना नहीं।
2. विरोधाभास का सिद्धांत (Law of Contradiction)परिवर्तन विरोधी शक्तियों के संघर्ष से होता है।
3. परस्पर संबंध (Interconnection)सब वस्तुएँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं, कोई भी अलग अस्तित्व नहीं रखती।
4. निरंतर परिवर्तन (Change and Development)कुछ भी स्थिर नहीं — समाज, अर्थव्यवस्था, विचार — सब बदलते हैं।
5. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Method)समाज को समझने और बदलने का तरीका — अनुभवजन्य और वस्तुगत।
मार्क्स के अनुसार “द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद” का लक्ष्य केवल दुनिया को समझना नहीं बल्कि उसे वैज्ञानिक रूप से बदलना है।
यह विचार, प्रकृति और समाज — तीनों के विकास को विरोधाभास (contradiction) और परिवर्तन (change) के नियमों से जोड़कर समझने की वैज्ञानिक पद्धति है।

“Philosophers have interpreted the world in various ways; the point, however, is to change it.”
Karl Marx, Theses on Feuerbach (1845)

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7. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद किन दो विचारधाराओं के संश्लेषण का परिणाम है?

(a) आदर्शवाद और यूटोपियन समाजवाद
(b) यांत्रिक भौतिकवाद और आदर्शवादी द्वन्द्ववाद
(c) ऐतिहासिक भौतिकवाद और यूटिलिटेरियनिज़्म
(d) भौतिकवाद और पोज़िटिविज़्म

उत्तर: (b) यांत्रिक भौतिकवाद और आदर्शवादी द्वन्द्ववाद।

व्याख्या:

“द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद” (Dialectical Materialism) मार्क्स और एंगेल्स का वह दार्शनिक दृष्टिकोण है जिसने पूर्ववर्ती दो धाराओं

  1. यांत्रिक भौतिकवाद (Mechanistic Materialism) और
  2. हेगेल का आदर्शवादी द्वन्द्ववाद (Hegelian Idealist Dialectics)
    को संश्लेषित (synthesize) करके एक वैज्ञानिक दर्शन का रूप दिया।

1. यांत्रिक भौतिकवाद (Mechanistic Materialism)

  • यह 17वीं–18वीं शताब्दी के फ्रांसीसी भौतिकवादियों (French Materialists) — जैसे Diderot, Holbach, La Mettrie — से विकसित हुआ।
  • इस विचारधारा में भौतिक जगत (matter) को ही एकमात्र वास्तविकता (ultimate reality) माना गया।
  • लेकिन इसकी बड़ी सीमा यह थी कि यह स्थिर (static) और अपरिवर्तनशील (unchanging) दृष्टिकोण रखता था।
  • इनके अनुसार प्रकृति और समाज यांत्रिक नियमों (mechanical laws) से चलते हैं, न कि विकासशील प्रक्रियाओं से।
“The old materialism was mainly mechanical and did not explain the process of change.”
Engels, Anti-Dühring (1878)

मार्क्स ने इससे भौतिक आधार (material foundation) लिया, परंतु उसमें गति (motion) और विकास (development) का तत्व जोड़ा।

2. आदर्शवादी द्वन्द्ववाद (Hegelian Idealist Dialectics)

  • हेगेल (Georg Wilhelm Friedrich Hegel, 1770–1831) के अनुसार,
    “विचार (Idea)” या “चेतना (Spirit)” ही परम सत्य (Absolute Reality) है।
  • इतिहास विचारों के द्वन्द्व (thesis–antithesis–synthesis) से आगे बढ़ता है।
  • लेकिन यह द्वन्द्व “विचारों” के स्तर पर होता है — यानि हेगेल का दृष्टिकोण आदर्शवादी (Idealist) था।
“In Hegel’s dialectic, the movement is of ideas; in Marx’s, it is of material conditions.”
Karl Marx, Afterword to the Second German Edition of Das Kapital (1873)

मार्क्स ने हेगेल की द्वन्द्वात्मक पद्धति (dialectical method) को अपनाया, पर उसका आदर्शवादी आधार पलट दिया और कहा —
“विचार नहीं, पदार्थ प्राथमिक है।”

3. मार्क्स का संश्लेषण (Synthesis by Marx)

मार्क्स ने इन दोनों दृष्टिकोणों का वैज्ञानिक संयोजन किया —

स्रोतमार्क्स ने क्या ग्रहण किया
यांत्रिक भौतिकवादभौतिक यथार्थ (Material Reality) की प्राथमिकता
हेगेल का द्वन्द्ववादपरिवर्तन और विरोधाभास की प्रक्रिया (Dialectical Method)
मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवादभौतिक यथार्थ का द्वन्द्वात्मक विश्लेषण — परिवर्तन का वैज्ञानिक दर्शन

इस प्रकार, “द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद” =
यांत्रिक भौतिकवाद (भौतिक आधार) + आदर्शवादी द्वन्द्ववाद (विकास की पद्धति)

“Marx turned Hegel’s dialectic upside down, placing material life at the base and ideas as its reflection.”
Engels, Ludwig Feuerbach and the End of Classical German Philosophy (1886)

मुख्य बिंदु :

तत्वयांत्रिक भौतिकवादआदर्शवादी द्वन्द्ववादद्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (मार्क्स)
मुख्य आधारपदार्थ (Matter)विचार (Idea)पदार्थ
प्रकृति की दृष्टिस्थिर (Static)गतिशील (Dynamic)गतिशील
परिवर्तन का स्रोतबाहरी कारणआंतरिक विचारआंतरिक विरोधाभास
मार्क्स का संश्लेषणभौतिकता + द्वन्द्वात्मक पद्धति= वैज्ञानिक यथार्थवाद
मार्क्स ने भौतिकवाद को गतिशील रूप (dynamic form) दिया और हेगेल के द्वन्द्ववाद को भौतिक आधार प्रदान किया।
इस प्रकार “द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद” एक संश्लेषण (synthesis) है — जो समाज और प्रकृति दोनों को विरोधाभासों के माध्यम से विकासशील मानता है।

8. नीचे दिए गए कथनों में से कौन-सा मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के अनुरूप नहीं है?

(a) विचार और पदार्थ परस्पर द्वन्द्वात्मक संबंध में हैं
(b) विचार के अभाव में भी पदार्थ का अस्तित्व संभव है
(c) पदार्थ के अभाव में विचार का अस्तित्व संभव है
(d) समाज और प्रकृति दोनों में द्वन्द्वात्मक नियम समान रूप से कार्य करते हैं

उत्तर: (c) पदार्थ के अभाव में विचार का अस्तित्व संभव है।

व्याख्या:

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का मूल आधार

मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार पदार्थ (Matter) ही मूल और प्राथमिक तत्व (Primary Reality) है।
विचार (Idea) या चेतना (Consciousness) पदार्थ का प्रतिबिंब (Reflection) मात्र है।
इसलिए, पदार्थ के बिना विचार का स्वतंत्र अस्तित्व संभव नहीं है।

“The ideal is nothing else than the material world reflected in the human mind and translated into forms of thought.”
Karl Marx, Capital, Vol. I (1867, Preface)

अर्थात् — विचार (Idea) कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, बल्कि यह भौतिक परिस्थितियों (material conditions) का मानसिक रूप है।

द्वन्द्वात्मक संबंध का अर्थ

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में “विचार और पदार्थ” के बीच परस्पर क्रिया (interaction) होती है —
परंतु यह क्रिया समान स्तर की नहीं होती।

  • पदार्थ (Matter) → मूल कारण (Cause)
  • विचार (Idea) → प्रभाव (Effect)

पदार्थ विचार को जन्म देता है, परंतु विचार भी पदार्थ (यानी सामाजिक व्यवहार या उत्पादन) को पुनः प्रभावित कर सकता है।

“Being determines consciousness, but consciousness in turn reacts upon being.”
Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)

इसलिए कथन (a) और (b) सही हैं, क्योंकि वे इस द्वन्द्वात्मक संबंध और पदार्थ की प्राथमिकता को व्यक्त करते हैं।

असंगत कथन की पहचान

कथन (c) — “पदार्थ के अभाव में विचार का अस्तित्व संभव है”
मार्क्स के भौतिकवादी दर्शन के विपरीत है, क्योंकि यह आदर्शवाद (Idealism) की ओर झुकता है।

हेगेल जैसे आदर्शवादी दार्शनिक मानते थे कि “विचार” ही परम सत्य है, और “पदार्थ” उसकी अभिव्यक्ति मात्र।
मार्क्स ने इस दृष्टिकोण को उलट दिया (turned upside down) और कहा —

“It is not the consciousness of men that determines their being, but their social being that determines their consciousness.”
Marx, 1859

अर्थात् — मनुष्य की भौतिक स्थिति (social being) ही उसकी चेतना को निर्धारित करती है, न कि उलटा।

समाज और प्रकृति में द्वन्द्वात्मक नियम

कथन (d) भी सही है।
एंगेल्स ने कहा कि वही द्वन्द्वात्मक नियम (dialectical laws) —
जैसे विरोधाभास (contradiction), परिवर्तन (transformation), और परस्पर निर्भरता (interconnection)
जो प्रकृति में कार्य करते हैं, वही समाज और विचार की प्रक्रियाओं में भी लागू होते हैं।

“The dialectical laws are valid for both nature and human history.”
Engels, Dialectics of Nature (1883)
कथनसत्यताकारण
(a) विचार और पदार्थ परस्पर द्वन्द्वात्मक संबंध में हैंसहीद्वन्द्वात्मक दृष्टिकोण का आधार
(b) विचार के अभाव में भी पदार्थ का अस्तित्व संभव हैसहीपदार्थ प्राथमिक है
(c) पदार्थ के अभाव में विचार का अस्तित्व संभव हैगलतआदर्शवादी दृष्टिकोण
(d) समाज और प्रकृति दोनों में द्वन्द्वात्मक नियम समान हैंसहीएंगेल्स का सिद्धांत

9. एंगेल्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को किस प्रकार परिभाषित किया?

(a) आदर्शवादी दृष्टिकोण
(b) साम्यवादी दृष्टिकोण से दुनिया को देखने का तरीका
(c) भौतिकवादी भक्ति सिद्धान्त
(d) धार्मिक दर्शन का वैज्ञानिक रूप

उत्तर: (b) साम्यवादी दृष्टिकोण से दुनिया को देखने का तरीका।

व्याख्या:

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की परिभाषा

फ़्रेडरिक एंगेल्स (Friedrich Engels, 1820–1895) ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को केवल एक दार्शनिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि दुनिया को देखने की वैज्ञानिक और साम्यवादी दृष्टि (Communist Worldview) बताया।

उन्होंने कहा कि यह दर्शन पूरी वास्तविकता — प्रकृति, समाज, और विचार — को भौतिक और द्वन्द्वात्मक नियमों के माध्यम से समझने का तरीका है।

“Dialectical Materialism is the world outlook of the Marxist-Leninist Party. It represents the communist view of the world.”
Friedrich Engels, Anti-Dühring (1878)

अर्थात्, यह केवल दर्शन नहीं, बल्कि विज्ञान और समाज दोनों को एकीकृत रूप से समझने की साम्यवादी दृष्टि है।

एंगेल्स का दृष्टिकोण

एंगेल्स ने कहा कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद तीन क्षेत्रों में कार्य करता है —

  1. प्रकृति (Nature) – जहाँ द्वन्द्वात्मक नियम भौतिक जगत में परिवर्तन लाते हैं।
  2. समाज (Society) – जहाँ उत्पादन संबंधों और वर्ग संघर्ष के रूप में विरोधाभास प्रकट होते हैं।
  3. विचार (Thought) – जहाँ भौतिक परिस्थितियाँ चेतना को निर्धारित करती हैं।
“The great basic thought that the world is not to be comprehended as a complex of ready-made things, but as a complex of processes...”
Engels, Dialectics of Nature (1883)

इसका अर्थ है —
दुनिया स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर परिवर्तनशील (Dynamic and Evolving) प्रक्रिया है, और इस परिवर्तन को भौतिक आधार पर समझना ही द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सार है।

साम्यवादी दृष्टिकोण क्यों?

मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद वह दृष्टिकोण प्रदान करता है जो समाज की संरचना, वर्ग-संघर्ष और परिवर्तन के वैज्ञानिक विश्लेषण को संभव बनाता है।
इसीलिए यह “साम्यवादी दृष्टिकोण से दुनिया को देखने का तरीका” कहलाता है।

“Our dialectic is not only different from the Hegelian, but is its direct opposite. For Marx, the dialectic becomes the scientific method for understanding and changing the world.”
Engels, Ludwig Feuerbach and the End of Classical German Philosophy (1886)

यहाँ “understanding and changing the world” वाक्यांश पर ध्यान दीजिए —
मार्क्सवादी दर्शन का उद्देश्य केवल समझना नहीं, बल्कि दुनिया को बदलना (to change the world) भी है।
इसलिए यह साम्यवादी दृष्टिकोण मूलतः क्रांतिकारी और वैज्ञानिक है।

पहलूविवरण
दर्शन का स्वरूपद्वन्द्वात्मक भौतिकवाद
प्रवर्तकमार्क्स और एंगेल्स
एंगेल्स के अनुसार परिभाषा“Communist view of the world”
मुख्य आधारभौतिक परिस्थितियाँ, द्वन्द्वात्मक परिवर्तन, वर्ग-संघर्ष
उद्देश्यसमाज और प्रकृति को वैज्ञानिक, भौतिक और साम्यवादी दृष्टिकोण से समझना

10. मार्क्स के अनुसार “विचार” और “पदार्थ” का संबंध कैसा है?

(a) दोनों स्वतंत्र हैं
(b) दोनों विरोधी हैं पर एकता में जुड़े हैं
(c) विचार प्राथमिक है
(d) पदार्थ विचार से उत्पन्न होता है

उत्तर: (b) दोनों विरोधी हैं पर एकता में जुड़े हैं।

व्याख्या:

1. मार्क्सवादी दृष्टि में पदार्थ और विचार का संबंध

मार्क्स के अनुसार —
“विचार (Idea)” और “पदार्थ (Matter)” का संबंध द्वन्द्वात्मक (Dialectical) है।
अर्थात दोनों एक-दूसरे के विरोधी (contradictory) हैं, परंतु यह विरोध संबंधात्मक और एकता में निहित (unity in contradiction) है।

पदार्थ (Matter) — प्राथमिक (primary) और वास्तविक (objective) तत्व है।
विचार (Idea) — द्वितीयक (secondary) और पदार्थ का परावर्तन (reflection) है।

“It is not the consciousness of men that determines their being, but their social being that determines their consciousness.”
Karl Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)

अर्थात्, मनुष्य की चेतना (विचार) उसकी भौतिक सामाजिक परिस्थितियों (material conditions) द्वारा निर्मित होती है, न कि इसके विपरीत।

द्वन्द्वात्मक संबंध (Dialectical Relation)

मार्क्स ने हेगेल के आदर्शवाद को पलटते हुए कहा कि —
जहाँ हेगेल के लिए विचार प्राथमिक था, वहीं मार्क्स के लिए पदार्थ प्राथमिक है।
फिर भी, विचार और पदार्थ को पूर्णतः अलग या विरोधी नहीं माना गया, बल्कि एक द्वन्द्वात्मक एकता के रूप में देखा गया।

पहलूमार्क्सवादी दृष्टिकोण
प्राथमिक तत्वपदार्थ (Matter)
द्वितीयक तत्वविचार (Idea)
संबंधद्वन्द्वात्मक विरोध और एकता
परिणामविचार भौतिक यथार्थ का प्रतिबिंब है
“Being is not dependent upon consciousness, but consciousness is a product of being.”
Karl Marx, The German Ideology (1846)

द्वन्द्वात्मक विरोध में एकता क्यों?

मार्क्स के अनुसार, विचार और पदार्थ का विरोध एक गतिशील (dynamic) विरोध है —
पदार्थ विचार को उत्पन्न करता है, पर विचार भी पदार्थ (समाज) को बदलने की क्षमता रखता है।

“Philosophers have only interpreted the world, in various ways; the point, however, is to change it.”
Karl Marx, Theses on Feuerbach (1845)

इस प्रकार, विचार (consciousness) समाज की भौतिक स्थिति (material reality) से उत्पन्न होता है,
और पुनः उसी भौतिक स्थिति को परिवर्तित करने का माध्यम भी बनता है।
यही इस संबंध की द्वन्द्वात्मक एकता (dialectical unity) है।

उदाहरण के लिए —

  • आर्थिक संरचना (Economic Base) = पदार्थ का क्षेत्र
  • राजनीतिक/विचारधारात्मक संस्थाएँ (Superstructure) = विचार का क्षेत्र

भौतिक परिस्थितियाँ (जैसे उत्पादन के साधन, वर्ग संबंध) विचारों को जन्म देती हैं।
फिर वही विचार (जैसे समाजवाद, धर्म, कानून आदि) भौतिक समाज को प्रभावित करते हैं।

इसलिए मार्क्सवाद में दोनों के बीच संबंध एकतरफा नहीं, बल्कि परस्पर द्वन्द्वात्मक (mutual dialectical) है।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद यह बताता है कि —

  • विचार और पदार्थ एक-दूसरे के विरोधी होते हुए भी एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
  • पदार्थ वास्तविकता का आधार (objective base) है,
    जबकि विचार उसका प्रतिबिंब (subjective reflection) है।
  • इस संबंध को समझे बिना समाज का वैज्ञानिक विश्लेषण संभव नहीं।
मार्क्स के अनुसार —
विचार और पदार्थ विरोधी हैं, परन्तु एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।
विचार पदार्थ से उत्पन्न होता है और पुनः उसी पदार्थ को बदलने की क्षमता रखता है।
यही द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की वैज्ञानिक आत्मा है।

11. “प्रकृति में द्वन्द्वात्मक नियम जिस तरह काम करते हैं, वैसे ही द्वन्द्व इतिहास में भी होते हैं।” — यह कथन किसका है?

(a) मार्क्स
(b) एंगेल्स
(c) हीगेल
(d) लेनिन

उत्तर: (b) एंगेल्स

व्याख्या:

कथन का दार्शनिक अर्थ

यह कथन इस विचार को प्रकट करता है कि —
द्वन्द्वात्मकता (Dialectics) केवल समाज या विचार की प्रक्रिया नहीं है,
बल्कि यह प्रकृति, इतिहास और मानव चिंतन — तीनों में समान रूप से कार्य करती है।

यही विचार एंगेल्स ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथों —

“Dialectics of Nature” (प्रकृति का द्वन्द्व)
और
“Anti-Dühring” (एंटी-ड्यूरिंग)
में विस्तार से प्रस्तुत किया।

एंगेल्स का दृष्टिकोण: द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सार्वभौमिक नियम

एंगेल्स ने कहा कि —

“The same dialectical laws which govern nature also govern human history.”
Friedrich Engels, Dialectics of Nature

अर्थात् —
प्रकृति और समाज दोनों एक समान द्वन्द्वात्मक नियमों से संचालित होते हैं।

एंगेल्स ने तीन मुख्य द्वन्द्वात्मक नियम (Dialectical Laws) बताए —

  1. विरोधों की एकता और संघर्ष (Unity and Struggle of Opposites)
  2. परिमाण से गुण में रूपांतरण (Transformation of Quantity into Quality)
  3. निषेध का निषेध (Negation of Negation)

उन्होंने समझाया कि —
जैसे प्रकृति में हर वस्तु अपने भीतर विरोधी तत्व रखती है और उन्हीं के संघर्ष से परिवर्तन होता है,
वैसे ही समाज और इतिहास में भी वर्ग-संघर्ष (class struggle) द्वन्द्व की शक्ति के रूप में कार्य करता है।

मार्क्स और एंगेल्स का अंतर

पहलूकार्ल मार्क्सफ्रेडरिक एंगेल्स
मुख्य क्षेत्रसमाज और इतिहास का वैज्ञानिक विश्लेषणप्रकृति और विज्ञान पर द्वन्द्वात्मक नियमों का प्रयोग
मुख्य ग्रंथDas Kapital, The German IdeologyDialectics of Nature, Anti-Dühring
मुख्य विचारइतिहास भौतिक परिस्थितियों से संचालित होता हैवही भौतिक नियम प्रकृति में भी कार्यरत हैं

अतः —
मार्क्स ने समाज के भौतिक विश्लेषण में द्वन्द्व का प्रयोग किया,
जबकि एंगेल्स ने यह सिद्ध किया कि प्रकृति में भी वही द्वन्द्वात्मक नियम लागू होते हैं

यह कथन इस बात पर बल देता है कि —
द्वन्द्व (Contradiction) अस्तित्व की सार्वभौमिक विशेषता है।
चाहे वह परमाणु में हो या समाज में —
परिवर्तन विरोधी शक्तियों के संघर्ष से ही उत्पन्न होता है।

यह कथन फ्रेडरिक एंगेल्स का है,
जिन्होंने यह प्रतिपादित किया कि —
“प्रकृति, समाज और विचार — तीनों समान द्वन्द्वात्मक नियमों से संचालित होते हैं।”

इस प्रकार, एंगेल्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को सामाजिक क्षेत्र से आगे बढ़ाकर प्राकृतिक विज्ञानों में भी विस्तारित किया।

12. मार्क्स के अनुसार समाज के यथार्थ का विश्लेषण करते समय कौन-सा तत्व प्राथमिक माना जाना चाहिए?

(a) चेतना
(b) विचार
(c) पदार्थ
(d) आत्मा

उत्तर: (c) पदार्थ।

व्याख्या:

मार्क्स का मूल सिद्धांत: भौतिक प्राथमिकता (Material Primacy)

मार्क्सवाद का मूल दार्शनिक आधार है —

“पदार्थ (Matter) प्राथमिक है, विचार (Idea) द्वितीयक।”

इसका अर्थ है कि —
मानव जीवन, समाज और इतिहास की व्याख्या भौतिक परिस्थितियों (Material Conditions) के आधार पर की जानी चाहिए,
न कि केवल विचारों या चेतना के आधार पर।

ऐतिहासिक संदर्भ

मार्क्स ने यह विचार प्रस्तुत किया जर्मन आदर्शवाद (German Idealism) के विरोध में।
हेगेल जैसे दार्शनिकों का मानना था कि —

“विचार (Idea) ही वास्तविकता का स्रोत है।”

मार्क्स ने इस दृष्टिकोण को पलट दिया और कहा —

“It is not the consciousness of men that determines their existence,
but their social existence that determines their consciousness.”
Karl Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)

अर्थात् —
मनुष्य का विचार या चेतना उसके भौतिक जीवन (material life) से उत्पन्न होती है,
वह उसका प्रतिबिंब (reflection) मात्र है।

भौतिक तत्व की भूमिका

मार्क्स के अनुसार समाज को समझने के लिए हमें पहले यह देखना चाहिए कि —
लोग क्या उत्पादन करते हैं,
कैसे उत्पादन करते हैं,
और उत्पादन के साधनों (means of production) पर किसका नियंत्रण है।

इन्हीं भौतिक परिस्थितियों से —

  • विचारधारा (Ideology),
  • संस्थाएँ (Institutions),
  • और कानूनी-राजनीतिक संरचना (Superstructure)
    उत्पन्न होती हैं।

आधार (Base) और अधिरचना (Superstructure) का सिद्धांत

मार्क्स ने समाज को दो स्तरों में बाँटा —

स्तरविवरण
आधार (Base)उत्पादन की भौतिक स्थिति — आर्थिक संरचना, वर्ग-संबंध, उत्पादन के साधन
अधिरचना (Superstructure)विचारधारा, धर्म, राजनीति, कानून, दर्शन आदि जो आधार से निर्मित होते हैं

मार्क्स के अनुसार —

“The mode of production of material life determines the general character of the social, political and intellectual life.”

इसलिए, समाज के विश्लेषण का प्रारंभ भौतिक आधार (Material Base) से होना चाहिए।

मार्क्स के दृष्टिकोण में —

पदार्थ (Matter) ⇒ चेतना (Consciousness)
न कि चेतना ⇒ पदार्थ

अर्थात् भौतिक स्थितियाँ विचार को जन्म देती हैं।
मनुष्य जैसा सोचता है, वह उसके सामाजिक-आर्थिक परिवेश पर निर्भर करता है।

मार्क्स के अनुसार, 
समाज और इतिहास की व्याख्या का प्रारंभ विचारों से नहीं, बल्कि पदार्थ (material conditions) से होना चाहिए।
विचार और चेतना उसी भौतिक वास्तविकता का प्रतिबिंब (reflection) हैं।

इसलिए समाज के यथार्थ को समझने के लिए भौतिक तत्व ही प्राथमिक तत्व है।

13. निम्नलिखित में से कौन-सा द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त नहीं है?

(a) परिवर्तन का सिद्धान्त
(b) विरोधाभास का सिद्धान्त
(c) आत्मा की सर्वोच्चता का सिद्धान्त
(d) नकार के नकार का सिद्धान्त

उत्तर: (c) आत्मा की सर्वोच्चता का सिद्धान्त।

व्याख्या:

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद क्या है?

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism)
मार्क्स और एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित एक वैज्ञानिक दार्शनिक दृष्टिकोण (scientific worldview) है,
जो यह मानता है कि संसार का सार पदार्थ (matter) है,
और परिवर्तन विरोधाभासों (contradictions) के माध्यम से होता है।

एंगेल्स ने कहा —

“Dialectics is the science of the general laws of motion and development of nature, human society and thought.”
Engels, Anti-Dühring (1878)

अर्थात द्वन्द्ववाद प्रकृति, समाज और विचार — तीनों के विकास के सामान्य नियमों का विज्ञान है।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के प्रमुख सिद्धान्त (Main Principles)

मार्क्स और एंगेल्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के तीन प्रमुख सिद्धान्त बताए –

सिद्धान्तविवरणस्रोत
1. परिवर्तन का सिद्धान्त (Law of Transformation / Motion)संसार में हर वस्तु निरंतर परिवर्तनशील है; स्थिरता केवल अस्थायी है।Engels, Dialectics of Nature
2. विरोधाभास का सिद्धान्त (Law of Contradiction / Unity and Struggle of Opposites)हर वस्तु और समाज के भीतर विरोधी शक्तियाँ (contradictory forces) कार्य करती हैं; इन्हीं से विकास होता है।Marx, Das Kapital (1867)
3. नकार के नकार का सिद्धान्त (Law of Negation of Negation)हर विकास पुराने रूप के नकार से नए रूप की उत्पत्ति के रूप में होता है।Engels, Anti-Dühring (1878)

इन तीनों सिद्धान्तों से यह स्पष्ट होता है कि —
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद भौतिक यथार्थ (material reality) के विकास की प्रक्रिया का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है।

आत्मा की सर्वोच्चता का सिद्धान्त — क्यों नहीं?

“आत्मा की सर्वोच्चता” (Supremacy of Soul or Spirit) का विचार आदर्शवाद (Idealism) से संबंधित है।

आदर्शवादी दार्शनिक (जैसे प्लेटो, हेगेल, या भारतीय वेदान्त परम्परा) यह मानते हैं कि —

“विचार या आत्मा ही वास्तविकता का मूल है, पदार्थ उसका परिणाम है।”

इसके विपरीत,
मार्क्सवाद (Marxism) कहता है कि —

“पदार्थ प्राथमिक है और विचार द्वितीयक।”
विचार, चेतना और आत्मा — भौतिक जीवन का प्रतिबिंब हैं।

इसलिए “आत्मा की सर्वोच्चता” का सिद्धान्त द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के मूलभूत तत्त्वों के विरुद्ध है।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का आधार “पदार्थ और विरोधाभास” है,
न कि “आत्मा और चेतना”।

इसलिए —
“आत्मा की सर्वोच्चता का सिद्धान्त” द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का हिस्सा नहीं है।
यह आदर्शवादी दार्शनिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है।

14. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में ‘दुनिया को समझने का तरीका’ (method of understanding) क्या है?

(a) अनुभवजन्य और स्थिर
(b) तर्कसंगत और परिवर्तनशील
(c) अलौकिक और नियतिवादी
(d) आध्यात्मिक और रहस्यात्मक

उत्तर: (b) तर्कसंगत और परिवर्तनशील।

व्याख्या:

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की पद्धति (Method of Understanding)

मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) कोई सिर्फ सिद्धान्त नहीं,
बल्कि दुनिया को समझने और बदलने की वैज्ञानिक पद्धति (scientific method of understanding and transformation) है।

यह दृष्टिकोण कहता है कि —

“Everything in nature, society and thought is in a state of constant motion, development, and transformation.”
Engels, Anti-Dühring (1878)

इसलिए यथार्थ को समझने का तरीका तर्कसंगत (rational) और परिवर्तनशील (dynamic) होना चाहिए, न कि स्थिर (static) या रहस्यमय (mystical)।

“तर्कसंगत” क्यों?

क्योंकि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद तर्क और युक्ति (reason and logic) पर आधारित है।
यह हर वस्तु, घटना या सामाजिक संरचना को विरोधाभासों (contradictions) और संबंधों (relations) के आधार पर विश्लेषित करता है।

मार्क्स ने कहा —

“The dialectical method is a rational method which sees reality in its process of change.”
Marx, Afterword to the Second German Edition of Das Kapital (1873)

इसलिए यह अंधविश्वास, रहस्यवाद या नियतिवाद को अस्वीकार करता है।

“परिवर्तनशील” क्यों?

क्योंकि मार्क्सवादी दृष्टिकोण में स्थिरता एक भ्रम (illusion) है —
वास्तविकता सदैव गति (motion) और परिवर्तन (change) में रहती है।

एंगेल्स ने कहा —

“Motion is the mode of existence of matter.”
Engels, Dialectics of Nature (1883)

इसलिए दुनिया को समझने का तरीका ऐसा होना चाहिए जो विकास, परिवर्तन और विरोधों के समाधान को वैज्ञानिक रूप से पहचान सके।

यह “अनुभवजन्य” या “अलौकिक” क्यों नहीं?

  • अनुभवजन्य (empirical) दृष्टिकोण केवल सतही अवलोकन तक सीमित रहता है।
    जबकि मार्क्स का दृष्टिकोण गहन (deep) और वैज्ञानिक व्याख्या पर आधारित है।
  • अलौकिक या आध्यात्मिक दृष्टिकोण (supernatural/spiritual) दुनिया को भौतिक कारणों से नहीं, बल्कि किसी अदृश्य शक्ति से जोड़ता है —
    जो कि मार्क्सवादी दर्शन के विपरीत है।

मार्क्स ने स्पष्ट कहा था —

“Religion is the opium of the people.”
Marx, Critique of Hegel’s Philosophy of Right (1844)

संक्षेप में तुलना

दृष्टिकोणविशेषताद्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का दृष्टिकोण
अनुभवजन्यसतही अनुभव पर आधारितअपूर्ण
अलौकिक / आध्यात्मिकतर्क से परेवैज्ञानिक नहीं
तर्कसंगत और परिवर्तनशीलवास्तविकता को विकासशील रूप में देखता हैसही मार्क्सवादी दृष्टिकोण
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का तरीका तर्कसंगत (rational) और परिवर्तनशील (dynamic) है,
जो वास्तविकता को निरंतर विकासशील प्रक्रिया के रूप में समझता है।

यह पद्धति अंधविश्वास, रहस्यवाद और नियतिवाद का खंडन करती है तथा
भौतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक वास्तविकता के वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित है।

15. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का समाजशास्त्र में क्या योगदान है?

(a) सामाजिक परिवर्तन को स्थायी मानना
(b) वर्ग संघर्ष और परिवर्तन की वैज्ञानिक व्याख्या देना
(c) नैतिक आदर्शों को सर्वोपरि मानना
(d) समाज में धार्मिक स्थिरता लाना

उत्तर: (b) वर्ग संघर्ष और परिवर्तन की वैज्ञानिक व्याख्या देना।

व्याख्या:

मार्क्स और एंगेल्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) को केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं, बल्कि समाज की वैज्ञानिक व्याख्या का उपकरण (scientific tool of social analysis) माना।

मार्क्स के अनुसार, समाज का विकास वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) और उत्पादन संबंधों (Relations of Production) के बीच उत्पन्न विरोधों (Contradictions) से होता है। ये विरोध ही इतिहास की गति को निर्धारित करते हैं।

इस प्रकार द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ने समाजशास्त्र को यह दृष्टिकोण दिया कि —

“सामाजिक परिवर्तन कोई नैतिक या आदर्शवादी घटना नहीं, बल्कि भौतिक परिस्थितियों और वर्गीय हितों के द्वन्द्व का परिणाम है।”

मार्क्स का यह दृष्टिकोण समाजशास्त्र को वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधार प्रदान करता है, जिससे सामाजिक घटनाओं का विश्लेषण कारण-परिणाम के सिद्धान्त (cause-effect principle) पर किया जा सकता है।

मुख्य बिंदु:

  1. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ने समाजशास्त्र को आदर्शवाद (Idealism) से मुक्त किया।
  2. समाज को एक गतिशील प्रक्रिया (dynamic process) के रूप में समझने की पद्धति दी।
  3. सामाजिक संरचनाओं और संस्थाओं को भौतिक परिस्थितियों का उत्पाद माना।
  4. सामाजिक परिवर्तन का कारण वर्गीय संघर्ष को बताया — जो वैज्ञानिक समाजशास्त्र का केन्द्रीय सिद्धान्त बना।
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ने समाजशास्त्र को केवल समाज की व्याख्या करने का नहीं, बल्कि उसे बदलने का वैज्ञानिक आधार दिया। 

यह दृष्टिकोण समाज को एक जीवित, परिवर्तनशील और वर्गीय संघर्ष से संचालित इकाई के रूप में देखने का तरीका है।

16. मार्क्स के अनुसार “परस्पर विरोधों में एकता” का क्या अर्थ है?

(a) समाज में विरोधी तत्वों का स्थायी संघर्ष
(b) विरोधी तत्वों के बीच स्थायी विभाजन
(c) विरोधी तत्वों का एक ही संरचना में एक-दूसरे को बनाए रखना
(d) समाज में संघर्ष का अंत

उत्तर: (c) विरोधी तत्वों का एक ही संरचना में एक-दूसरे को बनाए रखना।

व्याख्या:

मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) में यह सिद्ध किया कि हर वस्तु और समाज के भीतर विरोधाभास (contradiction) विद्यमान होते हैं, और यही विरोधाभास उसकी गति व परिवर्तन का मूल कारण हैं।

“परस्पर विरोधों में एकता” का तात्पर्य है कि —

समाज के भीतर मौजूद विरोधी शक्तियाँ (जैसे पूँजीपति और श्रमिक, शासक और शासित) एक-दूसरे के विरोध में होते हुए भी एक ही सामाजिक ढाँचे (social structure) का हिस्सा होती हैं।

ये विरोधी तत्व एक-दूसरे के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं —
उदाहरणार्थ, पूँजीपति के बिना श्रमिक की परिभाषा अधूरी है और श्रमिक के बिना पूँजीपति का अस्तित्व भी संभव नहीं।
इस प्रकार यह द्वन्द्व समाज को स्थिर नहीं रहने देता, बल्कि गतिशीलता और परिवर्तन (dynamism & change) उत्पन्न करता है।

मार्क्स के अनुसार —

“संघर्ष ही विकास का स्रोत है।”
जब यह संघर्ष चरम पर पहुँचता है, तो एक नये सामाजिक ढाँचे का जन्म होता है।

मुख्य बिंदु:

  1. समाज स्थिर नहीं बल्कि विरोधों से गतिशील (dynamic through contradictions) है।
  2. प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था में विरोधी वर्ग (classes in conflict) सह-अस्तित्व में रहते हैं।
  3. यह सह-अस्तित्व समाज के संगठन और परिवर्तन दोनों के लिए आवश्यक है।
  4. विरोधों की एकता ही इतिहास की गति को आगे बढ़ाती है।
“परस्पर विरोधों में एकता” यह दर्शाती है कि समाज के भीतर विरोधाभास न केवल स्वाभाविक हैं, बल्कि वे ही उसके विकास और परिवर्तन के प्रमुख प्रेरक हैं।

17. “यदि संघर्ष न हो तो वस्तु का विकास रुक जायेगा।” — यह कथन मार्क्स के किस नियम का द्योतक है?

(a) निषेध का निषेध
(b) विरोधाभास की एकता
(c) गुणात्मक परिवर्तन का सिद्धान्त
(d) ऐतिहासिक भौतिकवाद का नियम

उत्तर: (b) विरोधाभास की एकता (Unity of Opposites)

व्याख्या:

यह कथन मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) के उस मूल सिद्धान्त को दर्शाता है जिसे “विरोधाभास की एकता एवं संघर्ष” (Unity and Struggle of Opposites) कहा जाता है।

मार्क्स का मानना था कि —

“विकास का स्रोत वस्तु या समाज के भीतर विद्यमान आन्तरिक विरोध (internal contradictions) में निहित है।”

यदि किसी वस्तु या समाज में संघर्ष नहीं होगा, तो वह स्थिर (static) और अपरिवर्तनशील (unchanging) बन जाएगा — और उसका विकास रुक जाएगा।
यानी, संघर्ष ही गति (motion) और विकास (development) का वास्तविक कारण है।

दार्शनिक पृष्ठभूमि:

  • यह विचार हेगेल के द्वन्द्ववाद (Hegelian Dialectics) से आया, जहाँ थीसिस और एंटीथीसिस के संघर्ष से सिंथेसिस उत्पन्न होता है।
  • मार्क्स ने इसे भौतिक यथार्थ (material reality) पर लागू किया।
    उन्होंने कहा — समाज और प्रकृति दोनों में परिवर्तन विरोधों के संघर्ष से ही होता है, न कि किसी बाहरी शक्ति से।
“Contradiction is the root of all motion and vitality.”
Karl Marx, Economic and Philosophic Manuscripts (1844)

मुख्य बिंदु:

सिद्धान्तअर्थउदाहरण
विरोधाभास की एकताहर वस्तु या समाज के भीतर विरोधी शक्तियाँ सह-अस्तित्व में होती हैंपूँजीपति ↔ श्रमिक
संघर्ष का महत्वसंघर्ष न हो तो विकास रुक जाएगावर्ग-संघर्ष सामाजिक परिवर्तन लाता है
परिणामसंघर्ष से नया गुणात्मक परिवर्तन (qualitative change) उत्पन्न होता हैपूँजीवाद → समाजवाद
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार संघर्ष (conflict) वस्तु और समाज की आन्तरिक शक्ति है जो परिवर्तन और विकास को जन्म देती है।
“यदि संघर्ष न हो तो वस्तु का विकास रुक जायेगा” — यह वाक्य “विरोधाभास की एकता और संघर्ष” के सिद्धान्त का प्रत्यक्ष द्योतक है।

18. मार्क्स के अनुसार समाज में परिवर्तन किस प्रकार होता है?

(a) केवल गुणात्मक रूप से
(b) केवल परिमाणात्मक रूप से
(c) परिमाणात्मक परिवर्तनों के संचित होने से गुणात्मक परिवर्तन के रूप में
(d) बिना किसी कारण के स्वतः

उत्तर: (c) परिमाणात्मक परिवर्तनों के संचित होने से गुणात्मक परिवर्तन के रूप में।

व्याख्या:

मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) का यह दूसरा प्रमुख नियम है, जिसे “परिमाणात्मक परिवर्तन से गुणात्मक परिवर्तन का नियम” (Law of Transformation of Quantity into Quality) कहा जाता है।
यह नियम बताता है कि परिवर्तन अचानक नहीं होते, बल्कि धीरे-धीरे संचित परिमाणात्मक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप एक निर्णायक गुणात्मक छलांग (qualitative leap) के रूप में प्रकट होते हैं।

दार्शनिक अर्थ:

  • प्रकृति, समाज और इतिहास — तीनों में परिवर्तन क्रमिक (gradual) और संचयी (accumulative) होते हैं।
  • जब ये छोटे-छोटे परिवर्तन एक सीमा (threshold) तक पहुँचते हैं, तो वे गुणात्मक परिवर्तन (qualitative change) का रूप ले लेते हैं।
“Mere quantitative changes, beyond a certain limit, lead to qualitative leaps.”
Friedrich Engels, Dialectics of Nature (1883)

उदाहरणों के माध्यम से समझें:

क्षेत्रपरिमाणात्मक परिवर्तनगुणात्मक परिवर्तन
भौतिक जगतपानी का तापमान बढ़ाना100°C पर उबाल कर वाष्प बन जाना
समाजआर्थिक असमानता में लगातार वृद्धिएक चरण पर पहुँचकर सामाजिक क्रांति (जैसे – फ्रांसीसी या रूसी क्रांति)
अर्थव्यवस्थाउत्पादन के साधनों में परिवर्तनपूँजीवाद से समाजवाद में रूपांतरण

मार्क्सवादी दृष्टि से सामाजिक परिवर्तन:

मार्क्स का मानना था कि आर्थिक ढाँचे (economic base) में धीरे-धीरे परिमाणात्मक बदलाव — जैसे
उत्पादन के साधनों में सुधार, तकनीकी प्रगति, पूँजी का संकेन्द्रण —
एक बिंदु पर पहुँचकर गुणात्मक परिवर्तन यानी क्रांति (revolution) का रूप ले लेते हैं।

“At a certain stage of their development, the material productive forces of society come in conflict with the existing relations of production.”
Karl Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)

यह संघर्ष ही सामाजिक व्यवस्था के गुणात्मक रूपांतरण (qualitative transformation of social order) का कारण बनता है।

तीन मुख्य बिंदु:

  1. क्रमिक संचय (Gradual Accumulation):
    परिवर्तन शुरुआत में छोटे और धीरे-धीरे होने वाले होते हैं।
  2. सीमा बिंदु (Critical Point):
    जब यह संचय एक सीमा पार करता है, तो प्रणाली अस्थिर हो जाती है।
  3. क्रांतिक छलांग (Revolutionary Leap):
    इस अस्थिरता से एक नई गुणवत्ता (new quality) या नई व्यवस्था (new order) जन्म लेती है।
समाज में परिवर्तन न तो अचानक होता है, न ही आकस्मिक,
बल्कि यह परिमाणात्मक परिवर्तनों के संचित प्रभाव का परिणाम होता है —
जो एक सीमा पार करते ही गुणात्मक रूपांतरण या क्रांति के रूप में प्रकट होता है।

19. निम्नलिखित में से कौन-सा द्वन्द्ववाद का दूसरा नियम है?

(a) निषेध का निषेध
(b) विरोधाभास की एकता
(c) परिमाणात्मक परिवर्तन का गुणात्मक में रूपांतरण
(d) वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त

उत्तर: (c) परिमाणात्मक परिवर्तन का गुणात्मक में रूपांतरण।

व्याख्या:

द्वन्द्ववाद (Dialectics) के तीन मूलभूत नियमों का उल्लेख Friedrich Engels ने अपनी प्रसिद्ध कृति “Dialectics of Nature” (1883) और “Anti-Dühring” (1878) में किया था।
दूसरा नियम है —

“परिमाणात्मक परिवर्तन से गुणात्मक परिवर्तन” (Transformation of Quantity into Quality)

इसका अर्थ है कि जब परिमाण (Quantity) में क्रमिक और निरंतर परिवर्तन एक सीमा बिंदु (threshold limit) पार कर लेते हैं, तो प्रणाली में गुणात्मक (Qualitative) परिवर्तन उत्पन्न होता है — यानी वस्तु या प्रणाली की मूल प्रकृति बदल जाती है।

दार्शनिक अर्थ:

  • यह नियम बताता है कि विकास (development) एक गतिशील, असंतुलित और क्रांतिकारी प्रक्रिया है।
  • परिवर्तन पहले धीरे-धीरे होता है — जब यह संचय एक नियत सीमा पार कर जाता है, तो नया गुण (new quality) प्रकट होता है।
“Mere quantitative changes, when pushed beyond certain limits, lead to qualitative leaps.”
Friedrich Engels, Anti-Dühring (1878)

भौतिक उदाहरण (Physical Examples):

क्षेत्रपरिमाणात्मक परिवर्तनगुणात्मक परिवर्तन
प्रकृतिपानी का तापमान बढ़ना100°C पर उबालकर वाष्प बन जाना
रसायनअणुओं में क्रमिक ताप परिवर्तनपदार्थ का अवस्थांतरण (solid → liquid → gas)
जीव विज्ञानकोशिकाओं की संख्या बढ़नाअंग या जीव का जन्म
समाजआर्थिक असमानता का बढ़नावर्ग संघर्ष या सामाजिक क्रांति

समाजशास्त्रीय अर्थ:

मार्क्स ने इस नियम को समाज के ऐतिहासिक परिवर्तन में लागू किया।
उनके अनुसार, जब उत्पादन के साधनों (means of production) और उत्पादन संबंधों (relations of production) के बीच विरोध एक सीमा तक बढ़ जाता है,
तो समाज में गुणात्मक परिवर्तन — यानी क्रांति (revolution) — होती है।

“At a certain stage of development, the material productive forces come in conflict with the existing relations of production.”
Karl Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)

अन्य दो द्वन्द्वात्मक नियमों से संबंध:

क्रमनियमअर्थ
पहलाविरोधाभास की एकता (Unity of Opposites)हर वस्तु में विरोधी तत्व मौजूद रहते हैं
दूसरापरिमाणात्मक से गुणात्मक परिवर्तन (Quantity → Quality)परिवर्तन संचय से गुणात्मक रूपांतरण होता है
तीसरानिषेध का निषेध (Negation of Negation)नया रूप पुराने का निषेध करके नया चरण उत्पन्न करता है

उदाहरण – सामाजिक परिप्रेक्ष्य में:

फ्रांसीसी क्रांति (1789):

  • लंबे समय से असमान कर व्यवस्था, आर्थिक संकट और वर्गीय अन्याय (quantitative tensions)

    अंततः जनता के विद्रोह और सामंती व्यवस्था के पतन (qualitative revolution) में परिणत हुए।
द्वन्द्ववाद का दूसरा नियम सिखाता है कि 

“परिवर्तन हमेशा संचित और क्रमिक होते हैं,
परंतु उनका परिणाम क्रांतिक और गुणात्मक होता है।”

इस प्रकार यह नियम समाज, प्रकृति और विचार — तीनों क्षेत्रों में विकास के वैज्ञानिक दर्शन की व्याख्या करता है।

20. मार्क्स के अनुसार विकास की प्रक्रिया कैसी है?

(a) एक ही स्थान पर चक्रीय पुनरावृत्ति
(b) स्थिर और रैखिक
(c) निरन्तर ऊपर की ओर गतिशील
(d) पूर्णतः आकस्मिक

उत्तर: (c) निरन्तर ऊपर की ओर गतिशील।

व्याख्या:

कार्ल मार्क्स के अनुसार विकास (Development) या परिवर्तन (Change) ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) के नियमों के अंतर्गत होता है।
यह विकास न तो स्थिर है और न ही चक्रीय, बल्कि यह एक निरंतर ऊर्ध्वमुखी (progressive and upward) प्रक्रिया है जिसमें हर नया चरण पिछले चरण से अधिक विकसित और जटिल होता है।

मार्क्स ने इतिहास को पाँच प्रमुख चरणों में बाँटा था —

  1. आदिम साम्यवाद (Primitive Communism)
  2. दास प्रथा (Slave Society)
  3. सामंतवाद (Feudalism)
  4. पूंजीवाद (Capitalism)
  5. साम्यवाद (Communism)

इन चरणों में प्रत्येक अगला चरण पुराने विरोधाभासों के समाधान से उत्पन्न होता है। उदाहरण के लिए —
सामंतवाद में वर्गीय विरोध से पूंजीवाद जन्म लेता है, और पूंजीवाद में उत्पन्न वर्ग-संघर्ष अंततः साम्यवाद की ओर ले जाता है।

अतः विकास की प्रक्रिया “विरोधों के समाधान और नई अवस्थाओं की रचना” के रूप में निरंतर ऊर्ध्वमुखी रहती है।

सैद्धांतिक आधार (Theoretical Foundation):

यह विचार मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) के तीसरे नियम — “निषेध का निषेध” (Negation of Negation) से संबंधित है।
इस नियम के अनुसार हर अवस्था स्वयं के विरोध (negation) को जन्म देती है, जो आगे चलकर उच्चतर अवस्था में रूपांतरित हो जाती है।
उदाहरण — बीज → पौधा → फल → पुनः बीज।
यह प्रक्रिया दोहराव जैसी दिखती है, पर वास्तव में यह ऊर्ध्व सर्पिल (spiral upward motion) है — हर स्तर पिछले से अधिक विकसित।

मार्क्स का विकास-दर्शन यह मानता है कि — 
“इतिहास की गति हमेशा आगे की ओर होती है, क्योंकि हर संघर्ष नई चेतना और नई सामाजिक संरचना को जन्म देता है।”
अतः विकास एक निरन्तर ऊर्ध्वमुखी, विरोधों पर आधारित, और प्रगतिशील प्रक्रिया है।

21. मार्क्स के अनुसार “निषेध के निषेध” (Negation of the Negation) का मुख्य अर्थ क्या है?

(a) पुरानी व्यवस्था का पूर्ण विनाश
(b) नयी व्यवस्था द्वारा पुरानी व्यवस्था का सुधार और रूपांतरण
(c) संघर्ष का समाप्त होना
(d) सभी सामाजिक विरोधों का एक साथ नष्ट हो जाना

उत्तर: (b) नयी व्यवस्था द्वारा पुरानी व्यवस्था का सुधार और रूपांतरण।

व्याख्या:

“निषेध का निषेध” (Negation of Negation) मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) का तीसरा नियम है,
जिसे उन्होंने हीगेल (Hegel) से अपनाया, परंतु उसका भौतिकवादी रूप प्रदान किया।

इस नियम का सार यह है कि —

“विकास की प्रत्येक अवस्था अपने भीतर ऐसे विरोधों को जन्म देती है जो अंततः उसे नकारते हैं,
परंतु यह नकार (negation) पूर्ण विनाश नहीं होता, बल्कि एक उच्चतर रूपांतरण (higher synthesis) होता है।”

अर्थात्, पुरानी व्यवस्था में जो श्रेष्ठ या उपयोगी तत्व हैं, वे नष्ट नहीं होते बल्कि नयी व्यवस्था में रूपांतरित (transformed) होकर बने रहते हैं।

उदाहरण के लिए:
सामंतवाद (Feudalism) का निषेध हुआ → पूंजीवाद (Capitalism) उभरा।
फिर पूंजीवाद का निषेध हुआ → समाजवाद (Socialism) उत्पन्न हुआ।
समाजवाद का निषेध → साम्यवाद (Communism) की ओर ले जाता है।

यह प्रक्रिया “विकास के ऊर्ध्व सर्पिल रूप” (Spiral Development) को दर्शाती है —
जहाँ प्रत्येक नई अवस्था पुरानी अवस्था से अधिक विकसित, जटिल और परिष्कृत होती है।

सैद्धांतिक आधार (Theoretical Basis):

  • यह नियम दिखाता है कि विकास केवल “नकार” (negation) का परिणाम नहीं है,
    बल्कि पुराने से नये की रचना (creation through transformation) है।
  • मार्क्स के अनुसार समाज की प्रत्येक ऐतिहासिक अवस्था में आंतरिक विरोधाभास (contradictions) होते हैं,
    जो नयी अवस्था को जन्म देते हैं।
  • इस प्रक्रिया में सतत संघर्ष बना रहता है, लेकिन परिणाम प्रगति की दिशा में होता है।

उदाहरण:

  1. बीज → पौधा → फल → पुनः बीज
    यह प्राकृतिक प्रक्रिया “निषेध के निषेध” का प्रतीक है।
    बीज नष्ट होता है, परंतु पौधे के रूप में जीवन की एक नई, उच्चतर अवस्था उत्पन्न होती है।
  2. सामाजिक परिवर्तन में
    • दास प्रथा का निषेध → सामंतवाद
    • सामंतवाद का निषेध → पूंजीवाद
    • पूंजीवाद का निषेध → साम्यवाद
      इस प्रकार प्रत्येक अवस्था पिछले की नकारात्मक परंतु सृजनात्मक निरंतरता है।
“निषेध का निषेध” का अर्थ है — पुरानी व्यवस्था को समाप्त करके उसे नष्ट नहीं करना,
बल्कि उसमें जो सार्थक है, उसे नए और उच्चतर रूप में रूपांतरित करना।
यह विकास की सतत, गतिशील और ऊर्ध्वमुखी प्रक्रिया का प्रतीक है।

Mohan Exam

22. “निषेध बाहर से प्रवेश नहीं करता, यह तो वस्तु के भीतर निहित होता है।” — इस कथन का अभिप्राय है कि:


(a) परिवर्तन बाहरी बल से होता है
(b) परिवर्तन आन्तरिक विरोधों से उत्पन्न होता है
(c) परिवर्तन आकस्मिक होता है
(d) परिवर्तन दिव्य इच्छा पर निर्भर करता है

उत्तर: (b) परिवर्तन आन्तरिक विरोधों से उत्पन्न होता है।

व्याख्या:

मार्क्स (Karl Marx) और एंगेल्स (Engels) के अनुसार द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) का मूल यह है कि

“हर वस्तु या घटना अपने भीतर ही ऐसे विरोधाभास (Contradictions) रखती है जो उसके परिवर्तन और विकास का कारण बनते हैं।”

इसलिए निषेध (Negation) बाहरी रूप से थोपे गए परिवर्तन से नहीं आता, बल्कि वस्तु या समाज के अन्तर्निहित विरोध (internal contradictions) से उत्पन्न होता है।

इस कथन का दार्शनिक अर्थ:

  1. परिवर्तन की जड़ें वस्तु के भीतर होती हैं:
    किसी भी वस्तु या समाज में विरोधी तत्व (जैसे — पूंजीपति बनाम श्रमिक) मौजूद होते हैं।
    यही विरोध धीरे-धीरे तीव्र होकर परिवर्तन या क्रांति (revolution) का कारण बनते हैं।
  2. बाहरी कारक केवल उत्प्रेरक (catalyst) होते हैं:
    बाहरी परिस्थितियाँ केवल आन्तरिक विरोधों को प्रकट या तेज कर सकती हैं,
    लेकिन मूल कारण वस्तु के भीतर की विरोधी शक्तियाँ ही हैं।
  3. यह सिद्धान्त “आन्तरिक गति” (internal motion) का द्योतक है:
    मार्क्स कहते हैं कि प्रकृति और समाज दोनों में परिवर्तन अंदरूनी प्रक्रिया है,
    जो निरन्तर संघर्ष, विरोध और रूपांतरण के माध्यम से आगे बढ़ती है।

उदाहरण:

  1. प्रकृति में उदाहरण:
    • बीज के भीतर ही अंकुरण की शक्ति होती है — बाहर से नहीं आती।
    • यह शक्ति बीज के विघटन (निषेध) से ही नए पौधे का रूप लेती है।
  2. समाज में उदाहरण:
    • पूंजीवादी समाज में श्रमिक वर्ग और पूंजीपति वर्ग के बीच आन्तरिक संघर्ष (class conflict) मौजूद है।
    • यही विरोध एक दिन प्रणाली का निषेध करता है और नयी व्यवस्था (समाजवाद) को जन्म देता है।

सैद्धांतिक आधार (Theoretical Foundation):

यह विचार सीधे तौर पर मार्क्स की रचना —
“Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy” (1859)
से जुड़ा है, जहाँ उन्होंने लिखा:

“At a certain stage of development, the material productive forces of society come into conflict with the existing relations of production...”
(यानी — जब समाज की भौतिक शक्तियाँ मौजूदा उत्पादन संबंधों से टकराती हैं, तो परिवर्तन भीतर से ही जन्म लेता है।)

एंगेल्स (Engels) ने भी “Dialectics of Nature” में कहा:

“The driving force of all motion and development lies in the contradiction within things.”
मार्क्स का यह सिद्धान्त द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आत्मा है।
यह बताता है कि समाज, प्रकृति और विचार — तीनों में परिवर्तन भीतर के विरोधों से होता है,
बाहरी शक्ति केवल उसे उजागर करती है।

23. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार “पुरानी परम्परा के विनाश के बाद क्या होता है?”

(a) इतिहास का अंत
(b) नयी परम्परा का जन्म
(c) स्थिरता और ठहराव
(d) व्यवस्था का विघटन

उत्तर: (b) नयी परम्परा का जन्म।

व्याख्या:

मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार विकास (development) एक निरन्तर द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया (continuous dialectical process) है —
जहाँ प्रत्येक नयी अवस्था (new stage) पुरानी अवस्था का निषेध करती है,
परंतु उस निषेध से पूर्ण विनाश नहीं, बल्कि नवीन रूप में पुनर्गठन (transformation) होता है।

दार्शनिक अर्थ (Philosophical Meaning):

“निषेध” का अर्थ है —
किसी पुरानी व्यवस्था, विचार या प्रणाली का अंत केवल इसलिए नहीं कि वह नष्ट हो जाए,
बल्कि ताकि एक उच्चतर रूप (higher form) में उसका रूपांतरण हो सके।

इसलिए जब पुरानी परम्परा या व्यवस्था समाप्त होती है,
तो वह अपने भीतर से ही एक नयी परम्परा (new synthesis) को जन्म देती है।

इसे मार्क्स और एंगेल्स ने कहा —

“Development proceeds by negating the old form and creating a new one, which preserves what was essential in the old.”
Engels, Dialectics of Nature

उदाहरण (Examples):

  1. सामाजिक विकास में:
    • सामंतवाद (Feudalism) → निषेध → पूँजीवाद (Capitalism) → निषेध → समाजवाद (Socialism) → अंततः साम्यवाद (Communism)
      यह प्रक्रिया बताती है कि पुरानी व्यवस्था के अंत के बाद एक नई, अधिक विकसित व्यवस्था जन्म लेती है।
  2. प्रकृति में:
    • बीज → पौधा → फूल → फल → नया बीज
      यहाँ बीज का निषेध पौधे में होता है, पर वह “समाप्त” नहीं होता —
      बल्कि एक नई, उच्च अवस्था में रूपांतरित होता है।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण (Historical View):

मार्क्स का इतिहास-दर्शन (Historical Materialism) भी इसी नियम पर आधारित है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक ऐतिहासिक अवस्था अपने भीतर विरोधों (contradictions) को जन्म देती है —
और जब ये विरोध पराकाष्ठा पर पहुँचते हैं, तो पुरानी व्यवस्था का अंत और नई व्यवस्था का आरम्भ होता है।

उदाहरण के लिए —

“The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.”
Marx & Engels, Communist Manifesto (1848)

इस वर्ग-संघर्ष (class struggle) के परिणामस्वरूप
नई सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाएँ जन्म लेती हैं।

मार्क्सवादी दर्शन के अनुसार हर “अंत” एक नये “आरम्भ” की भूमिका निभाता है।
पुरानी परम्परा के निषेध से नई, अधिक विकसित और उन्नत परम्परा का जन्म होता है।
यही द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की वैज्ञानिकता और प्रगतिशीलता का सार है।

24.
कथन (A): विकास की प्रक्रिया इतिहास की पुनरावृत्ति है।
कथन (B): मार्क्स के अनुसार विकास एक ऐसी गति है जो निरन्तर आगे बढ़ती है और ऊपर चढ़ती है।

निम्न में से कौन-सा सही है?

(a) केवल कथन (A) सही है
(b) केवल कथन (B) सही है
(c) दोनों सही हैं
(d) दोनों गलत हैं

उत्तर: (b) केवल कथन (B) सही है।

व्याख्या:

मार्क्स का विकास-दर्शन: द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism)

मार्क्स का मानना था कि विश्व, समाज और विचार — सबका विकास भौतिक परिस्थितियों (material conditions) और आन्तरिक विरोधाभासों (internal contradictions) के कारण होता है।
उन्होंने हेगेल के द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त (Dialectics) को भौतिक आधार पर पुनर्व्याख्यायित किया।

मार्क्स ने कहा — “मेरी द्वन्द्वात्मक पद्धति हेगेल की पद्धति का उल्टा संस्करण है; मैंने उसे सिर के बल खड़ा पाया और पैरों पर खड़ा किया।”
Karl Marx, “Capital”, Vol. I, Preface to the Second Edition (1873)

विकास चक्रीय (Cyclical) नहीं बल्कि सर्पिल (Spiral) गति है

मार्क्स के अनुसार विकास की गति “इतिहास की पुनरावृत्ति” नहीं है।
अर्थात् समाज या इतिहास वही स्थिति दोबारा नहीं दोहराता
बल्कि विकास की गति सर्पिल (spiral) रूप में होती है —
हर नया चरण पुराने चरण का निषेध करता है,
परंतु उसके श्रेष्ठ तत्वों को अपनाकर
एक उच्चतर अवस्था (higher stage) उत्पन्न करता है।

उदाहरण —

सामंतवाद (Feudalism) → पूँजीवाद (Capitalism) → समाजवाद (Socialism) → साम्यवाद (Communism)

यह क्रम पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि प्रगति (progressive movement) को दर्शाता है।

निषेध के निषेध का सिद्धान्त (Law of Negation of Negation)

मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार हर पुरानी व्यवस्था अपने भीतर ही विरोधाभासों को धारण करती है।
ये विरोधाभास एक समय के बाद नई व्यवस्था के जन्म का कारण बनते हैं।
नयी व्यवस्था पुरानी व्यवस्था का पूर्ण विनाश नहीं करती,
बल्कि उसके उपयोगी अंशों को संरक्षित रखती है।
इस प्रकार विकास एक संरचनात्मक रूपान्तरण (transformative evolution) होता है।

इतिहास का पुनरावृत्तिवाद क्यों गलत है?

कथन (A) — “विकास की प्रक्रिया इतिहास की पुनरावृत्ति है” — गलत है क्योंकि:

  • मार्क्स का इतिहास-विज्ञान “linear” और “progressive” है, “cyclical” नहीं।
  • यह नयी ऐतिहासिक परिस्थितियों और उत्पादन शक्तियों पर आधारित होता है।
  • प्रत्येक ऐतिहासिक अवस्था (mode of production) अद्वितीय होती है।
“Men make their own history, but they do not make it as they please; they make it under circumstances existing already.”
Karl Marx, The Eighteenth Brumaire of Louis Bonaparte (1852)

इस उद्धरण से स्पष्ट है कि प्रत्येक युग अपने विशिष्ट भौतिक और सामाजिक संदर्भों में विकसित होता है —
इसलिए इतिहास “स्वयं को दोहराता” नहीं, बल्कि नए रूप में आगे बढ़ता है।

मार्क्स के अनुसार इतिहास की गति:

  • गति का स्रोत: आन्तरिक विरोधाभास (class conflict)
  • गति का स्वरूप: द्वन्द्वात्मक (dialectical)
  • गति की दिशा: प्रगतिशील (progressive), ऊपर की ओर
  • गति का परिणाम: नयी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का निर्माण

इसलिए कथन (B) — “विकास निरन्तर आगे बढ़ता और ऊपर चढ़ता है” — मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार पूर्णतः सही है।

दार्शनिक प्रमाण (Philosophical Basis):

  • हेगेल ने विकास को “विचार” की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया बताया था।
  • मार्क्स ने उसे “वस्तुगत” बना दिया — यानि समाज और उत्पादन के ठोस संबंधों में जड़ दिया।
  • इसलिए मार्क्स का विकास-दर्शन वास्तविक भौतिक परिस्थितियों पर आधारित ऐतिहासिक द्वन्द्वात्मकता (Historical Dialectics) है।
मार्क्स के दृष्टिकोण में विकास का अर्थ “इतिहास की पुनरावृत्ति” नहीं बल्कि
“इतिहास का द्वन्द्वात्मक उन्नयन” (dialectical progression) है।

25. सूची मिलान प्रश्न

सूची-I (द्वन्द्व के नियम)सूची-II (उनका सार)
A. विरोधाभास की एकता3. विरोधी तत्वों का सह-अस्तित्व
B. परिमाण से गुण में परिवर्तन2. छोटे परिवर्तनों से बड़े परिवर्तन
C. निषेध का निषेध1. पुरानी व्यवस्था का नये रूप में रूपांतरण

(a) A-3, B-2, C-1
(b) A-1, B-2, C-3
(c) A-2, B-3, C-1
(d) A-3, B-1, C-2

उत्तर: (a) A-3, B-2, C-1

व्याख्या:

मार्क्स और एंगेल्स ने हेगेल के द्वन्द्ववाद (Dialectics) को भौतिकवादी आधार पर समझाया और तीन मुख्य नियमों में विभाजित किया।
ये नियम बताते हैं कि समाज और प्रकृति दोनों में परिवर्तन कैसे और क्यों होते हैं।

विरोधाभास की एकता (Unity of Opposites) → (A-3)

सार: विरोधी तत्वों का सह-अस्तित्व।

व्याख्या:
हर वस्तु या व्यवस्था अपने भीतर ही विरोधी शक्तियाँ रखती है —
जैसे पूँजीपति (bourgeoisie) और श्रमिक वर्ग (proletariat)।
ये दोनों एक-दूसरे के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकते,
फिर भी एक-दूसरे के विपरीत हैं।
यही विरोध और संघर्ष परिवर्तन की जड़ बनते हैं।

उदाहरण:

  • पूँजीवाद में उत्पादन सामूहिक है पर स्वामित्व निजी है → यही विरोध आगे चलकर समाजवाद की मांग उत्पन्न करता है।

परिमाण से गुण में परिवर्तन (Transformation of Quantity into Quality) → (B-2)

सार: छोटे-छोटे परिमाणात्मक परिवर्तन एक सीमा के बाद बड़े गुणात्मक परिवर्तन का रूप लेते हैं।

व्याख्या:
किसी वस्तु या समाज में धीरे-धीरे होने वाले परिमाणात्मक (quantitative) परिवर्तन जब एक सीमा पार कर जाते हैं,
तो वे अचानक गुणात्मक (qualitative) परिवर्तन में बदल जाते हैं।

उदाहरण:

  • पानी 100°C तक गर्म होने पर उबलने लगता है — यह गुणात्मक परिवर्तन है।
  • पूँजीवाद में धीरे-धीरे बढ़ती आर्थिक असमानता अंततः क्रांति (revolution) का रूप लेती है।

निषेध का निषेध (Negation of the Negation) → (C-1)

सार: पुरानी व्यवस्था का नये रूप में रूपांतरण।

व्याख्या:
यह नियम बताता है कि विकास केवल “विनाश” नहीं, बल्कि संरचनात्मक रूपांतरण (transformative evolution) है।
नई व्यवस्था पुरानी का निषेध करती है,
परंतु उसमें जो श्रेष्ठ तत्व हैं उन्हें अपनाकर एक उच्चतर अवस्था का निर्माण करती है।

उदाहरण:
सामंतवाद → पूँजीवाद → समाजवाद → साम्यवाद
यह क्रम दिखाता है कि इतिहास प्रत्येक चरण में ऊपर उठता है,
न कि स्वयं को दोहराता है।

संक्षिप्त सारणी

द्वन्द्व का नियममूल भावार्थउदाहरण
विरोधाभास की एकताविरोधी शक्तियों का सह-अस्तित्वपूँजीपति बनाम श्रमिक
परिमाण से गुण में परिवर्तनछोटे परिवर्तनों का गुणात्मक रूपांतरणआर्थिक असमानता → क्रांति
निषेध का निषेधपुरानी व्यवस्था का सुधारकर नये में रूपांतरणसामंतवाद → पूँजीवाद → समाजवाद
मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद यह स्पष्ट करता है कि — 
“परिवर्तन बाहरी नहीं, आन्तरिक विरोधों से उत्पन्न होता है;
और हर नयी अवस्था पुरानी अवस्था से उच्चतर होती है।

26. निषेध के निषेध के नियम में विकास की रेखा कैसी होती है?

(a) सीधी रेखा
(b) स्थिर रेखा
(c) सर्पिल
(d) चक्राकार

उत्तर: (c) सर्पिल (Spiral)

व्याख्या:

मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद में “निषेध का निषेध (Negation of the Negation)” तीसरा और अंतिम नियम है, जो यह समझाता है कि विकास केवल दोहराव या चक्र नहीं है, बल्कि एक सर्पिलाकार (spiral) प्रक्रिया है।

  • प्रत्येक नई अवस्था पुरानी अवस्था का निषेध करती है, परंतु उसमें पुराने के सार तत्वों (essential elements) को संरक्षित रखती है।
  • इस कारण विकास में पुनरावृत्ति (repetition) तो दिखाई देती है, पर यह ऊर्ध्वगामी (upward-moving) होती है — यानी हर बार एक उच्चतर स्तर (higher stage) पर पहुँचती है।
  • इसलिए इतिहास का विकास न तो सीधा (linear) है, न ही चक्रीय (circular) — बल्कि सर्पिल (spiral) है, जो आगे बढ़ते हुए अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है।

उदाहरण:
सामंतवाद → पूँजीवाद → समाजवाद → साम्यवाद
यह क्रम दिखाता है कि नई व्यवस्था, पुरानी को नकारते हुए भी उसके कुछ उपयोगी अंगों को नए स्वरूप में समाहित करती है।

27. “विकास प्रगतिशील होता है, क्योंकि प्रत्येक उच्चतर अवस्था अपने पूर्ववर्ती निम्नतर अवस्था का निषेध करती है।” — यह कथन किस द्वंद्वात्मक नियम का प्रतिपादन करता है?

(a) परस्पर विरोधों की एकता का नियम
(b) परिमाणात्मक परिवर्तन का गुणात्मक में रूपांतरण का नियम
(c) निषेध के निषेध का नियम
(d) गतिशीलता का नियम

उत्तर: (c) निषेध के निषेध का नियम

व्याख्या:

‘निषेध के निषेध’ का नियम मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) का तीसरा मूल सिद्धांत है।
इसे कार्ल मार्क्स ने हेगेल (Hegel) के आदर्शवादी द्वंद्ववाद से लिया, किंतु उसे भौतिकवादी दृष्टिकोण (Materialist View) में रूपांतरित किया।

इस नियम के अनुसार —

“विकास की प्रत्येक अवस्था अपने भीतर ऐसे विरोधों (contradictions) को जन्म देती है, जो अंततः उसे नकारते हैं (negate),
परंतु यह नकार पूर्ण विनाश नहीं होता, बल्कि एक उच्चतर, अधिक विकसित रूप में रूपांतरण (higher synthesis) होता है।”

अर्थात्, जब कोई पुरानी अवस्था अपनी सीमाओं तक पहुँच जाती है, तो उसमें से एक नई अवस्था जन्म लेती है, जो पुरानी के उपयोगी तत्त्वों को अपने भीतर समाहित करते हुए आगे बढ़ती है।

यह प्रक्रिया प्रगतिशील (progressive) होती है और समाज, प्रकृति, तथा विचार — तीनों क्षेत्रों में लागू होती है।

उदाहरण:

  1. प्रकृति में:
    बीज → पौधा → फल → पुनः बीज
    यहाँ प्रत्येक अवस्था पिछले की निषेध है, परंतु जीवन चक्र निरंतर ऊपर की ओर बढ़ता है।
  2. समाज में (मार्क्सवादी ऐतिहासिक दृष्टिकोण):
    • दास प्रथा (Slavery) → सामंतवाद (Feudalism)
    • सामंतवाद → पूंजीवाद (Capitalism)
    • पूंजीवाद → समाजवाद (Socialism)
    • समाजवाद → साम्यवाद (Communism)

प्रत्येक नई व्यवस्था, पुरानी का निषेध करती है, परंतु उसे पूर्णतः नष्ट नहीं करती; बल्कि उसके उपयोगी तत्वों को उच्चतर रूप में आत्मसात करती है।

इस नियम से यह स्पष्ट होता है कि विकास रेखीय (linear) नहीं बल्कि सर्पिल (spiral) रूप में होता है —
जहाँ हर नई अवस्था, पुरानी अवस्था की नकारात्मक परंतु सृजनात्मक निरंतरता होती है।

28. मार्क्स के अनुसार समाज का विकास उदाहरण —
आदिम साम्यवाद → दास प्रथा → सामन्तवाद → पूँजीवाद → समाजवाद → साम्यवाद
किस सिद्धान्त को दर्शाता है?


(a) गतिशीलता का नियम
(b) निषेध का निषेध
(c) परस्पर विरोधों की एकता
(d) परिमाण से गुण में परिवर्तन

उत्तर: (b) निषेध का निषेध।

व्याख्या:

यह उदाहरण मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) के तीसरे सिद्धांत
“निषेध का निषेध” (Negation of the Negation) — को व्यावहारिक रूप से स्पष्ट करता है।

मार्क्स के अनुसार समाज का विकास एक ऐतिहासिक-द्वंद्वात्मक प्रक्रिया (Historical-Dialectical Process) है।
हर सामाजिक व्यवस्था अपने भीतर ऐसे विरोधाभास (contradictions) उत्पन्न करती है जो अंततः उसके निषेध (negation) का कारण बनते हैं।
लेकिन यह निषेध पूर्ण विनाश नहीं होता —
बल्कि पुरानी व्यवस्था के उपयोगी तत्त्वों को समाहित करते हुए एक नई, उच्चतर अवस्था (higher synthesis) का निर्माण करता है।

क्रम का दार्शनिक अर्थ:

पुरानी व्यवस्थानई व्यवस्था (जो उसे निषेध करती है)विकास का अर्थ
आदिम साम्यवाददास प्रथासंपत्ति व वर्ग का उद्भव
दास प्रथासामंतवादउत्पादन के साधनों में परिवर्तन
सामंतवादपूंजीवादनिजी संपत्ति और औद्योगिक क्रांति
पूंजीवादसमाजवादवर्ग-संघर्ष द्वारा श्रमिक नियंत्रण
समाजवादसाम्यवादवर्गहीन समाज की स्थापना

इस पूरी श्रृंखला में प्रत्येक नई अवस्था पुरानी अवस्था का निषेध करती है,
लेकिन उसमें निहित सकारात्मक या प्रगतिशील तत्वों को अपने भीतर समाहित भी करती है।
इसीलिए समाज का विकास रेखीय नहीं, बल्कि सर्पिल (spiral) रूप में होता है।

मुख्य बिंदु:

  • समाज का विकास विरोधों और संघर्षों से उत्पन्न होता है।
  • प्रत्येक अवस्था अपनी सीमाओं और विरोधाभासों से जूझते हुए नई अवस्था को जन्म देती है।
  • यह प्रक्रिया सतत, गतिशील और प्रगतिशील है।
इसलिए आदिम साम्यवाद से साम्यवाद तक की यह यात्रा,
“निषेध के निषेध” (Negation of Negation) के सिद्धांत की सबसे सशक्त व्याख्या है,
जो यह सिद्ध करती है कि विकास का स्वरूप सृजनात्मक रूपांतरण (creative transformation) है,
न कि केवल विनाश या प्रतिस्थापन।

29. मार्क्स का गतिशीलता का नियम किसे प्रमुख मानता है?

(a) स्थिरता और जड़ता
(b) निरन्तर परिवर्तन और प्रवाह
(c) केवल बाहरी प्रभाव
(d) संयोग और आकस्मिक घटना

उत्तर: (b) निरन्तर परिवर्तन और प्रवाह।

व्याख्या:

गतिशीलता का नियम (Law of Motion or Law of Constant Change),
मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) का एक मौलिक सिद्धांत है,
जिसके अनुसार —

“प्रकृति, समाज और विचार — तीनों निरन्तर परिवर्तनशील और गतिशील अवस्थाओं में हैं।
कुछ भी स्थिर या अपरिवर्तनीय नहीं है।”

मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार,
वस्तुओं, प्रक्रियाओं और संस्थाओं का अस्तित्व केवल गति, परिवर्तन और विकास के माध्यम से ही संभव है।

यह नियम हेगेल के द्वंद्ववाद से प्रेरित है,
परंतु मार्क्स ने इसे भौतिकवादी रूप दिया —
अर्थात् परिवर्तन का स्रोत विचार नहीं, बल्कि भौतिक परिस्थितियाँ (material conditions) होती हैं।

मुख्य तत्त्व:

  1. परिवर्तन सार्वभौमिक (Universal) है:
    चाहे वह प्रकृति हो, समाज हो या विचार — सब निरन्तर परिवर्तनशील हैं।
  2. गति का स्रोत आंतरिक है:
    परिवर्तन किसी बाहरी शक्ति से नहीं बल्कि वस्तु के भीतर मौजूद विरोधाभासों (internal contradictions) से उत्पन्न होता है।
  3. स्थिरता अस्थायी होती है:
    हर स्थिर अवस्था अपने भीतर परिवर्तन के बीज लिए रहती है,
    जो एक नई अवस्था के जन्म का कारण बनते हैं।
  4. इतिहास का गतिशील दृष्टिकोण:
    मार्क्स के अनुसार, इतिहास ठहरा हुआ नहीं बल्कि गतिशील प्रक्रिया (dynamic process) है,
    जो उत्पादन संबंधों (relations of production) और उत्पादन शक्तियों (forces of production) में निरन्तर परिवर्तन से संचालित होती है।

उदाहरण:

  • प्रकृति में —
    ऋतुओं का चक्र, जन्म और मृत्यु, जल का वाष्प बनना और वर्षा —
    ये सभी परिवर्तन की निरंतरता के उदाहरण हैं।
  • समाज में —
    आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक संरचनाएँ समय के साथ बदलती रहती हैं।
    जैसे — सामंतवाद से पूंजीवाद, और पूंजीवाद से समाजवाद का विकास।
मार्क्स का “गतिशीलता का नियम” यह स्पष्ट करता है कि — 

“दुनिया स्थिर नहीं, बल्कि परिवर्तनशील है;
स्थिरता केवल परिवर्तन की गति में एक अस्थायी संतुलन है।”

इसलिए यह नियम भौतिक जगत और समाज — दोनों में सतत विकास, संघर्ष और रूपांतरण की व्याख्या करता है।

30. निम्न में से कौन-सा कथन मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के सिद्धांत के अनुरूप है?

(a) वस्तु स्थायी और अपरिवर्तनीय है
(b) प्रत्येक वस्तु में जन्म और निर्वाण की स्थिति है
(c) विचार के बिना वस्तु का अस्तित्व नहीं है
(d) केवल बाहरी शक्तियाँ परिवर्तन लाती हैं

उत्तर: (b) प्रत्येक वस्तु में जन्म और निर्वाण की स्थिति है।

व्याख्या:

मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) यह मानता है कि

"भौतिक संसार और समाज दोनों ही निरंतर गति, परिवर्तन और विकास की अवस्था में हैं।
कोई भी वस्तु स्थायी या अपरिवर्तनीय नहीं है।"

इस दृष्टिकोण के अनुसार —
हर वस्तु या प्रक्रिया के भीतर विरोधी शक्तियाँ (contradictions) निहित होती हैं,
जो उसे जन्म (emergence) और नाश (dissolution) की ओर ले जाती हैं।

अर्थात् —
हर वस्तु का अस्तित्व संघर्ष पर आधारित है, और वही संघर्ष उसके विकास का मूल कारण है।

मुख्य तत्त्व :

  1. वस्तु का भौतिक अस्तित्व प्राथमिक है:
    विचार वस्तु से उत्पन्न होता है, न कि वस्तु विचार से।
    यानी — Being determines consciousness (अस्तित्व चेतना को निर्धारित करता है)।
  2. निरंतर परिवर्तन का नियम:
    हर वस्तु में जन्म और विनाश की प्रक्रिया चलती रहती है —
    यह गतिशीलता का नियम (Law of Motion) और विरोधों की एकता का नियम (Unity of Opposites) दोनों को दर्शाता है।
  3. आंतरिक विरोध ही परिवर्तन का स्रोत है:
    वस्तु के भीतर मौजूद विरोधाभास (contradictions) ही
    उसके रूपांतरण और नये स्वरूप में विकास का कारण बनते हैं।
  4. प्रकृति और समाज दोनों परिवर्तनशील हैं:
    जैसे —
    • जल का वाष्प बनना और पुनः वर्षा होना
    • सामंती व्यवस्था का पूँजीवाद में बदलना
      ये सभी निरंतर जन्म और निर्वाण (birth and death) की प्रक्रियाओं का उदाहरण हैं।

दार्शनिक निहितार्थ:

मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद यह बताता है कि —

“विकास का अर्थ केवल नया बनना नहीं, बल्कि पुराने का रूपांतरण है।”

इसलिए समाज और प्रकृति में जो भी वस्तुएँ अस्तित्व में हैं,
वे नित्य गतिशीलता, संघर्ष, और रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजर रही हैं।

 “प्रत्येक वस्तु में जन्म और विनाश की स्थिति निहित है;
स्थायित्व केवल परिवर्तन की गति में एक अस्थायी ठहराव है।”

31. एंजिल्स के अनुसार मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद संसार और प्रकृति को कैसे देखता है?

(a) स्थिर और अचल
(b) अस्थायी, गतिशील और परिवर्तनशील
(c) केवल आन्तरिक दृष्टि से
(d) केवल बाहरी परिवर्तन से

उत्तर: (b) अस्थायी, गतिशील और परिवर्तनशील।

व्याख्या:

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की मूल अवधारणा

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) मार्क्सवादी दर्शन की आधारशिला है।
यह दो तत्वों का समन्वय है —

  1. भौतिकवाद (Materialism) — वास्तविकता का आधार भौतिक (matter) है, न कि चेतना (consciousness)।
  2. द्वंद्ववाद (Dialectics) — संसार निरंतर विरोधों (contradictions) और उनके समाधान की प्रक्रिया में परिवर्तनशील है।

इस दृष्टिकोण में, विकास का सार “विरोधों की एकता और संघर्ष” में निहित है।

एंगेल्स की दृष्टि में प्रकृति

एंगेल्स ने मार्क्स के विचारों को “Dialectics of Nature” (प्रकृति का द्वंद्ववाद) में आगे बढ़ाया।
उन्होंने कहा —

“Nature is not a state of rest and immobility, but a state of continuous motion and change.”
(प्रकृति स्थिरता की नहीं, बल्कि सतत गति और परिवर्तन की अवस्था है।)

अर्थात,

  • कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है।
  • हर चीज़ में उत्पत्ति (birth) और विनाश (death) का तत्व अंतर्निहित है।
  • परिवर्तन बाहरी नहीं, बल्कि वस्तु की आंतरिक विरोधात्मक शक्तियों से होता है।

“अस्थायी, गतिशील और परिवर्तनशील” — तीनों का दार्शनिक अर्थ

तत्वअर्थद्वंद्वात्मक दृष्टि से महत्व
अस्थायी (Temporary)कुछ भी स्थायी नहीं है; सबका आरंभ और अंत है।समाज और प्रकृति दोनों का विकास इतिहास में परिवर्तनों के माध्यम से होता है।
गतिशील (Dynamic)सब कुछ निरंतर गति में है।स्थिरता भ्रम है; परिवर्तन ही वास्तविकता है।
परिवर्तनशील (Changing)वस्तुएँ लगातार रूपांतरित होती हैं।प्रत्येक वस्तु अपने विरोधों के समाधान से नई अवस्था में प्रवेश करती है।

इस दृष्टि से, विकास का अर्थ क्रमिक रूपांतरण (gradual transformation) है —
जहाँ पुरानी अवस्था का निषेध होता है, लेकिन उसका कुछ तत्व नए रूप में संरक्षित रहता है।

समाज और इतिहास पर इसका अनुप्रयोग

एंगेल्स और मार्क्स दोनों ने प्रकृति के इस नियम को मानव समाज के विकास पर लागू किया।
उदाहरण:

आदिम साम्यवाद → दास प्रथा → सामंतवाद → पूंजीवाद → समाजवाद → साम्यवाद

यह क्रम दिखाता है कि समाज निरंतर गतिशील है; प्रत्येक नई व्यवस्था अपने पूर्ववर्ती को निषेध करती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्व

मार्क्स और एंगेल्स ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को वैज्ञानिक विश्वदृष्टि (Scientific Worldview) कहा, क्योंकि —

  • यह स्थिर ईश्वरीय व्यवस्था को अस्वीकार करता है।
  • यह प्राकृतिक और सामाजिक घटनाओं की व्याख्या वस्तुनिष्ठ नियमों (objective laws) से करता है।
  • यह मानव ज्ञान को भी एक गतिशील प्रक्रिया मानता है।
एंगेल्स के अनुसार — 

“संसार और प्रकृति स्थिर नहीं हैं; वे निरंतर गति, परिवर्तन और विकास की प्रक्रिया में हैं।”

अतः मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद एक ऐसा वैज्ञानिक सिद्धांत है जो प्रकृति, समाज और विचार — तीनों को गतिशील और परिवर्तनशील प्रक्रिया के रूप में देखता है।

Mohan Exam

32. मार्क्स के अनुसार विकास की गति का स्वरूप क्या है?

(a) सरल रेखा
(b) रैखिक और स्थिर
(c) सर्पिल और प्रगतिशील
(d) चक्राकार और जड़

उत्तर: (c) सर्पिल (Spiral) और प्रगतिशील (Progressive)

व्याख्या:

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और विकास की अवधारणा

मार्क्सवादी दर्शन का प्रमुख सिद्धांत है —
“द्वंद्वात्मक भौतिकवाद” (Dialectical Materialism),
जो यह मानता है कि विकास विरोधों के संघर्ष (struggle of opposites) के माध्यम से होता है।

इसमें प्रत्येक नई अवस्था (stage) पुरानी अवस्था का निषेध करती है, परंतु पूरी तरह समाप्त नहीं करती —
बल्कि उसमें से कुछ आवश्यक तत्वों को संरक्षित रखकर उच्चतर रूप में विकसित होती है।

सर्पिल (Spiral) गति का अर्थ

सर्पिल गति (Spiral motion) का अर्थ है —
विकास सीधी रेखा में नहीं, बल्कि घुमावदार तरीके से आगे बढ़ता है।

  • प्रत्येक नई अवस्था पुरानी अवस्था से ऊपर के स्तर पर पहुँचती है।
  • लेकिन वह कुछ समान तत्वों को पुनः ग्रहण करती है (इसलिए यह वृत्ताकार नहीं बल्कि सर्पिल है)।
  • यह निरंतर ऊर्ध्वगामी (upward) और प्रगतिशील (progressive) होती है।

एंगेल्स ने कहा:

“In dialectics, progress is not a simple repetition, but a spiral in which each turn marks an advance.”
(द्वंद्ववाद में प्रगति मात्र दोहराव नहीं है, बल्कि सर्पिल रूप में होती है जहाँ प्रत्येक चक्र एक ऊँचे स्तर का संकेत देता है।)

मार्क्सवादी दृष्टि से “प्रगतिशील विकास”

मार्क्स के अनुसार, समाज का विकास इस सर्पिल गति का उत्कृष्ट उदाहरण है —

आदिम साम्यवाद → दास प्रथा → सामंतवाद → पूँजीवाद → समाजवाद → साम्यवाद

हर नई व्यवस्था पुरानी व्यवस्था का निषेध (negation) करती है,
परंतु उसमें से कुछ आवश्यक तत्वों को संरक्षित (preserved) रखकर उच्चतर रूप में पुनः स्थापित करती है।
यह प्रक्रिया “निषेध के निषेध का नियम” कहलाती है।

सर्पिल विकास बनाम चक्रीय विकास

तुलनासर्पिल विकासचक्रीय विकास
दिशाऊपर की ओर प्रगतिशीलएक ही स्तर पर घूमता रहता है
स्वरूपपरिवर्तन और सुधार का संयोगपुनरावृत्ति और स्थिरता
उदाहरणसमाज का ऐतिहासिक विकासऋतु परिवर्तन या ज्योतिषीय चक्र

इसलिए मार्क्स का दृष्टिकोण चक्रीय नहीं बल्कि सर्पिल और ऐतिहासिक (historical-progressive) है।

दार्शनिक सारांश

मार्क्स के अनुसार —

“History repeats itself, first as tragedy, then as farce.”
(इतिहास दोहराता है, परंतु प्रत्येक पुनरावृत्ति भिन्न और उच्चतर स्तर पर होती है।)

यह कथन स्पष्ट करता है कि विकास समान नहीं, बल्कि रूपांतरित (transformed) होता है —
इसलिए उसे “सर्पिल गति” कहा गया है।

मार्क्स की विकास-दृष्टि में —

  • परिवर्तन आवश्यक (necessary) और नियमबद्ध (law-governed) है।
  • यह न तो चक्रीय है, न रैखिक;
  • बल्कि यह सर्पिल (spiral) और प्रगतिशील (progressive) है —
    जो समाज को हर बार एक उच्चतर अवस्था की ओर अग्रसर करती है।
मार्क्सवादी विकास-दृष्टि में 

“विकास सीधी रेखा नहीं, बल्कि सर्पिल गति में होता है —
जहाँ प्रत्येक नई अवस्था पुरानी का निषेध करते हुए एक उच्चतर स्तर पर प्रगतिशील रूप में उभरती है।”

33. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में “गतिशीलता का नियम” का महत्व क्या है?

(a) यह दर्शाता है कि कोई वस्तु स्थायी है
(b) यह प्राकृतिक और सामाजिक परिवर्तन की निरन्तरता को बताता है
(c) यह केवल विचारधाराओं का अध्ययन करता है
(d) यह केवल इतिहास के एक भाग पर केन्द्रित है

उत्तर: (b) यह प्राकृतिक और सामाजिक परिवर्तन की निरन्तरता को बताता है।

व्याख्या:

मार्क्स और एंगेल्स ने अपने दर्शन — द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) — में यह प्रतिपादित किया कि

“संसार की हर वस्तु निरन्तर परिवर्तनशील (constantly changing) और गतिशील (dynamic) है।”

इस दृष्टिकोण के अनुसार, स्थिरता (stability) केवल परिवर्तन के एक क्षणिक रूप (momentary form) मात्र है।

गतिशीलता का नियम (Law of Motion / Law of Change)

इस नियम का मूल सिद्धांत यह है कि —

“प्रकृति और समाज की प्रत्येक वस्तु निरंतर गति और परिवर्तन में रहती है।”

मार्क्स और एंगेल्स ने कहा कि —

“Motion is the mode of existence of matter.”
(गति पदार्थ का अस्तित्वात्मक रूप है।)

अर्थात्, जहाँ पदार्थ है, वहाँ गति और परिवर्तन अनिवार्य है।

नियम का दार्शनिक सार

  • कोई भी वस्तु स्थायी (permanent) नहीं है।
  • सब कुछ उत्पन्न (coming into being) होता है, और फिर नष्ट (passing away) होता है।
  • यह प्रक्रिया निरंतर (continuous) चलती रहती है।
  • परिवर्तन केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक विरोधों (internal contradictions) के कारण होता है।

इस प्रकार, गतिशीलता का नियम यह स्पष्ट करता है कि परिवर्तन वस्तुओं की अंतर्निहित प्रकृति (inner nature) है,
न कि कोई बाहरी या आकस्मिक प्रक्रिया।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण में समाज का गतिशील स्वरूप

मार्क्स ने समाज को एक गतिशील तंत्र (dynamic system) माना —
जहाँ आर्थिक संरचना (economic base) और अधिरचना (superstructure) के बीच निरंतर परस्पर क्रिया (interaction) होती है।

उदाहरण के लिए:

  • आर्थिक शक्तियाँ (forces of production) बदलती हैं →
  • उत्पादन संबंध (relations of production) बदलते हैं →
  • सामाजिक संरचना (social structure) भी बदल जाती है।

इसलिए समाज निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया में है —
यह न तो स्थिर है, न जड़, बल्कि सदैव गतिशील और ऐतिहासिक (dynamic and historical) है।

प्रकृति और विज्ञान में गतिशीलता का प्रमाण

एंगेल्स ने Dialectics of Nature में कहा कि —

“The entire nature is in constant motion, from the smallest particle to the biggest galaxy.”

उदाहरण:

  • परमाणु के भीतर इलेक्ट्रॉनों की गति
  • ग्रहों की परिक्रमा
  • जैविक विकास की प्रक्रिया
    ये सब “गतिशीलता के नियम” के प्रमाण हैं।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण में परिवर्तन का महत्व

गतिशीलता का नियम यह दर्शाता है कि —

  • कोई भी सामाजिक व्यवस्था स्थायी नहीं है।
  • पूँजीवाद, सामंतवाद, दास प्रथा — सब अपने विरोधाभासों के कारण समाप्त होती हैं।
  • इस प्रकार, समाज का इतिहास निरंतर संघर्ष, परिवर्तन और प्रगति की गाथा है।

अन्य विचारकों के सन्दर्भ में तुलना

विचारकदृष्टिकोण
हेगेलपरिवर्तन को विचारों के द्वंद्व से जोड़ते हैं।
मार्क्सपरिवर्तन को भौतिक परिस्थितियों और उत्पादन संबंधों से जोड़ते हैं।
एंगेल्सपरिवर्तन को प्रकृति और समाज दोनों में सार्वभौमिक मानते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • गतिशीलता का नियम द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की मौलिक आधारशिला है।
  • यह बताता है कि परिवर्तन सार्वभौमिक, अनिवार्य और ऐतिहासिक है।
  • समाज, प्रकृति और विचार — तीनों ही इस नियम के अधीन हैं।
“गतिशीलता का नियम यह प्रतिपादित करता है कि परिवर्तन ही संसार का शाश्वत सत्य है।
प्रत्येक वस्तु, समाज और विचार निरंतर गति और रूपांतरण की प्रक्रिया में है —
यही द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का प्राण तत्व (essence) है।”

Mohan Exam

34. मार्क्स के अनुसार समाज के विकास और विनाश का विश्लेषण कैसे किया जाना चाहिए?

(a) केवल विकास के आधार पर
(b) केवल विनाश के आधार पर
(c) उनके अन्तः सम्बन्ध और अन्तः निर्भरता के आधार पर
(d) केवल संयोग पर

उत्तर: (c) उनके अन्तः सम्बन्ध और अन्तः निर्भरता के आधार पर।

व्याख्या:

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का मूल भाव

मार्क्स का दर्शन — द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) — यह मानता है कि

“विकास और विनाश दो अलग-अलग या विरोधी प्रक्रियाएँ नहीं हैं,
बल्कि एक ही वस्तु के दो परस्पर सम्बद्ध (interconnected) पहलू हैं।”

इसलिए किसी भी सामाजिक या ऐतिहासिक घटना को केवल एक पक्ष (विकास या विनाश) के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
उसे उसके अंतःसंबंधों (internal relations) और अंतःनिर्भरता (interdependence) के आधार पर समझना आवश्यक है।

समाज के विकास-विनाश का द्वंद्वात्मक विश्लेषण

मार्क्स के अनुसार, समाज का इतिहास “विरोधों के संघर्ष” (struggle of opposites) का इतिहास है।
हर सामाजिक व्यवस्था अपने भीतर ऐसे आंतरिक विरोधाभास (internal contradictions) रखती है,
जो उसके विनाश (destruction) का कारण बनते हैं,
और उन्हीं विरोधों से नयी व्यवस्था (new order) का जन्म होता है।

उदाहरण:
दास प्रथा में श्रमिक वर्ग का शोषण → सामंतवाद की उत्पत्ति।
सामंतवाद में आर्थिक असमानता → पूँजीवाद की उत्पत्ति।
पूँजीवाद में वर्ग संघर्ष → समाजवाद की उत्पत्ति।

इस प्रकार विनाश ही विकास का मार्ग प्रशस्त करता है,
और विकास अपने भीतर विनाश के बीज रखता है।

अन्तः सम्बन्ध और अन्तः निर्भरता (Interrelation & Interdependence)

मार्क्स और एंगेल्स ने स्पष्ट किया कि —

“Reality is a totality of interconnected processes.”
(वास्तविकता परस्पर संबद्ध प्रक्रियाओं का समुच्चय है।)

इसका अर्थ यह है कि:

  • किसी एक घटना को पृथक (isolated) रूप में नहीं समझा जा सकता।
  • हर सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक व्यवस्था और ऐतिहासिक घटना एक-दूसरे पर निर्भर है।
  • विकास और विनाश — दोनों एक-दूसरे के बिना अस्तित्वहीन हैं।

जैसे:

  • विकास के बिना विनाश का अर्थ नहीं,
  • और विनाश के बिना विकास संभव नहीं

समाज-विश्लेषण में इसका प्रयोग

मार्क्सवादी पद्धति समाज के अध्ययन के लिए समग्र (holistic) और वैज्ञानिक दृष्टि अपनाती है।
इस दृष्टिकोण से समाज को एक जीवंत, परिवर्तनशील और परस्पर-संबद्ध इकाई माना जाता है।

इसलिए समाज के विकास या विनाश को केवल “नैतिक” या “संयोगवश” नहीं,
बल्कि वस्तुगत ऐतिहासिक परिस्थितियों (objective historical conditions) के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

दार्शनिक सारांश

हेगेल ने कहा था —

“Every being contains within itself the seed of its own negation.”
(हर अस्तित्व अपने भीतर अपने निषेध का बीज रखता है।)

मार्क्स ने इसे भौतिकवादी रूप (materialist form) में रूपांतरित करते हुए कहा कि —

“Every social order bears within itself the conditions for its own dissolution.”
(हर सामाजिक व्यवस्था अपने विनाश की परिस्थितियों को अपने भीतर संजोए रहती है।)

इसलिए विकास और विनाश विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर-निर्भर प्रक्रियाएँ हैं।

मुख्य बिंदु:

प्रमुख बिंदुविवरण
विकास और विनाशदोनों परस्पर सम्बद्ध हैं।
अध्ययन की विधिवैज्ञानिक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद पर आधारित।
विश्लेषण का आधारअन्तः सम्बन्ध (internal relation) और अन्तः निर्भरता (interdependence)।
परिणामपरिवर्तन और प्रगति निरंतर जारी रहती है।
“मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार समाज के विकास और विनाश को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
वे एक ही प्रक्रिया के दो पहलू हैं, जिनके अन्तः सम्बन्ध और अन्तः निर्भरता से ही वास्तविक परिवर्तन और प्रगति संभव होती है।”

35. (कथन आधारित)

कथन (A): द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में वस्तु और विचार दोनों समान रूप से प्राथमिक हैं।
कथन (B): पदार्थ विचार से स्वतंत्र और प्राथमिक है।

सही उत्तर क्या है?

(a) केवल A सही
(b) केवल B सही
(c) दोनों सही
(d) दोनों गलत

उत्तर: (b) केवल B सही।

व्याख्या:

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) मार्क्सवाद की मूल दार्शनिक नींव है।
यह हिगेल के द्वन्द्ववाद (Dialectics) को अपनाता है, लेकिन उसमें “विचार” की जगह “पदार्थ” को केंद्रीय बनाता है।

हिगेल के अनुसार — विचार (Idea) प्राथमिक है, और पदार्थ उसका परिणाम है।
मार्क्स ने इसे उलट दिया और कहा —

“It is not the consciousness of men that determines their being, but their social being that determines their consciousness.”
(मनुष्य की चेतना उसका अस्तित्व नहीं बनाती, बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना को निर्धारित करता है।)

इस प्रकार, मार्क्स ने पदार्थ (Matter) को वास्तविकता का आधार (Primary Reality) माना और विचार (Idea) को उसका द्वितीयक (Secondary) परिणाम बताया।

36. मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद क्यों प्रस्तुत किया?

(a) पूंजीवादी और औद्योगिक समाज की मूर्त वास्तविकता को समझने के लिए
(b) केवल प्राकृतिक विज्ञान के भौतिकवाद को मान्यता देने के लिए
(c) हीगेल के आदर्शवाद को सिद्ध करने के लिए
(d) सोवियत रूस में बोल्शेविक दफ्तरशाही का समर्थन करने के लिए

उत्तर: (a) पूंजीवादी और औद्योगिक समाज की मूर्त वास्तविकता को समझने के लिए

व्याख्या:

मार्क्स के समय का यूरोप — विशेष रूप से 19वीं शताब्दी —

  • औद्योगिक क्रांति से प्रभावित,
  • पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के विस्तार का युग था।

इस दौर में श्रमिक वर्ग (Proletariat) का शोषण तीव्र था, और समाज की संरचना वर्गों में बँटी हुई थी।

मार्क्स ने देखा कि उस समय के दार्शनिक या तो आदर्शवादी (Idealists) थे (जैसे हीगेल), जो केवल विचारों और चेतना को मूल मानते थे,
या सांवेदी भौतिकवादी (Sensuous Materialists) थे (जैसे फ्यूरबाक), जो केवल प्रकृति के स्थिर रूपों पर ध्यान देते थे।

मार्क्स ने कहा —

“Philosophers have only interpreted the world in various ways; the point, however, is to change it.”
Karl Marx, Theses on Feuerbach

अर्थात्, उनका उद्देश्य केवल व्याख्या नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ को वैज्ञानिक ढंग से समझना और बदलना था।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का प्रयोजन

मार्क्स ने हीगेल के द्वन्द्ववाद (Dialectics) को अपनाया, परन्तु उसकी दिशा पलट दी —
विचार नहीं, पदार्थ (Material conditions) ही वास्तविकता का आधार हैं।
इसलिए इसे कहा गया — “द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद”

इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य था —

  • समाज और इतिहास को वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) तथा
  • उत्पादन के भौतिक साधनों (Means of Production) के आधार पर समझना।

प्रमुख बिंदु

  1. मार्क्स का उद्देश्य “सामाजिक यथार्थ का वैज्ञानिक विश्लेषण” था।
  2. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ने समाजशास्त्र में आर्थिक कारकों की प्रधानता (Economic Determinism) स्थापित की।
  3. यह दर्शन वर्ग-संघर्ष, ऐतिहासिक भौतिकवाद, और अधिरचना (Superstructure) के सिद्धांतों की नींव है।
  4. मार्क्स का दृष्टिकोण सक्रिय और परिवर्तनशील था, केवल चिंतनात्मक नहीं।

37. द्वन्द्व की व्याख्या में कौन-से तीन प्रकार के द्वन्द्व मार्क्स द्वारा प्रतिपादित किए गए हैं?

(a) प्राकृतिक, राजनीतिक, आर्थिक
(b) ज्ञान मीमांसा सम्बन्धी, जीव विकास विज्ञान, संसर्गी
(c) ऐतिहासिक, सामाजिक, दार्शनिक
(d) मानवीय, नैतिक, भौतिक

उत्तर: (b) ज्ञान मीमांसा सम्बन्धी, जीव विकास विज्ञान, संसर्गी

व्याख्या:

मार्क्स ने द्वन्द्व (Dialectics) को सिर्फ एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method) के रूप में प्रस्तुत किया, जिसके माध्यम से हम प्रकृति, समाज और विचार – तीनों के विकास को समझ सकते हैं।

द्वन्द्ववाद का सार यह है कि —

“विकास विरोधों (Contradictions) के संघर्ष से होता है।”

ज्ञान मीमांसा सम्बन्धी द्वन्द्व (Epistemological Dialectics)

यह द्वन्द्व ज्ञान और विचार की प्रकृति से सम्बंधित है।
मार्क्स के अनुसार, हमारा ज्ञान स्थिर नहीं है — यह वस्तुगत यथार्थ के साथ संघर्ष, परीक्षण और संशोधन की प्रक्रिया से विकसित होता है।

उदाहरण:
मनुष्य जब किसी सामाजिक घटना को समझने का प्रयास करता है, तो वह गलतियाँ करता है, अनुभव से सीखता है, और ज्ञान को और अधिक सटीक बनाता है — यही द्वन्द्व है।

जीव विकास विज्ञान का द्वन्द्व (Ontological Dialectics)

यह द्वन्द्व प्रकृति, जीवन और अस्तित्व की वास्तविकता (Being and Becoming) से सम्बंधित है।
मार्क्स और एंजिल्स ने कहा कि सम्पूर्ण प्रकृति एक सतत परिवर्तनशील प्रक्रिया है —

“Nothing is stable, everything is in motion.” (Engels, Dialectics of Nature)

उदाहरण:
बीज → पौधा → वृक्ष → फल → पुनः बीज — यह सृष्टि और विनाश की सतत सर्पिल गति है।

संसर्गी द्वन्द्व (Relational Dialectics)

यह द्वन्द्व मानव समाज और सामाजिक संबंधों (Human Relations) में प्रकट होता है।
मार्क्स ने कहा कि समाज विरोधी वर्गों के संघर्ष (Class Struggle) से आगे बढ़ता है।
उत्पादन संबंधों (Relations of Production) में द्वन्द्व ही ऐतिहासिक परिवर्तन की शक्ति है।

उदाहरण:
मजदूर बनाम पूँजीपति का द्वन्द्व → समाजवाद की ओर विकास।

प्रमुख बिंदु

  1. मार्क्स के लिए Dialectics = Movement + Conflict + Change
  2. यह सार्वभौमिक नियम (Universal Law of Change) है — जो प्रकृति, समाज और विचार – तीनों में समान रूप से कार्य करता है।
  3. एंजिल्स ने कहा — “Nature is the test of dialectics.” (Engels, Anti-Dühring)

38. द्वन्द्ववाद के अनुसार ज्ञान के क्षेत्र में क्या होता है?

(a) स्थिर और अपरिवर्तनीय ज्ञान
(b) विचारधाराओं के बीच अंतर्संघर्ष
(c) केवल धार्मिक मान्यताओं का विश्लेषण
(d) बाहरी ताकतों से ज्ञान का निर्माण

उत्तर: (b) विचारधाराओं के बीच अंतर्संघर्ष

व्याख्या:

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में “ज्ञान” की प्रकृति

मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार ज्ञान (Knowledge) एक गतिशील और संघर्षशील प्रक्रिया है।
यह किसी “स्थिर सत्य” (Static Truth) का परिणाम नहीं है, बल्कि विरोधी विचारों, अनुभवों और सामाजिक परिस्थितियों के बीच चलने वाले निरंतर संघर्ष से विकसित होता है।

“Truth is always concrete and historical.” — Lenin, Materialism and Empirio-Criticism (1909)

इसका अर्थ है कि हर युग का ज्ञान अपने सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में सापेक्ष (relative) होता है।

विचारधाराओं के अंतर्संघर्ष का अर्थ

द्वन्द्ववाद का मूल सिद्धांत है —

“विरोधों की एकता और संघर्ष” (Unity and Struggle of Opposites)

ज्ञान के क्षेत्र में भी यह लागू होता है।
हर नई अवधारणा या विचार पुराने विचार का निषेध (negation) करती है, लेकिन उसके कुछ तत्वों को अपने में समाहित भी करती है।
इससे विचारों का विकास “सर्पिल और प्रगतिशील रूप” (spiral and progressive form) में होता है।

उदाहरण:

  • फ्यूडल विचारधाराबुर्जुआ (capitalist) विचारधारासमाजवादी विचारधारा
    हर चरण में ज्ञान का रूप बदलता गया, लेकिन विकास की दिशा ऊपर की ओर रही।

मार्क्स का दृष्टिकोण:

मार्क्स ने कहा —

“मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना को निर्धारित करता है।”
— कार्ल मार्क्स, राजनीतिक अर्थशास्त्र की समालोचना की भूमिका (1859)

इससे स्पष्ट है कि विचार (ideology) और ज्ञान (knowledge) का निर्माण सामाजिक संघर्ष और भौतिक जीवन की परिस्थितियों से होता है।
विभिन्न वर्गों की विचारधाराएँ टकराती हैं — यह टकराव ही ज्ञान की प्रगति को जन्म देता है।

द्वन्द्वात्मक ज्ञान की प्रक्रिया (Dialectical Process of Knowledge)

  1. थीसिस (Thesis): कोई विद्यमान विचार या मत।
  2. एण्टीथीसिस (Antithesis): उसका विरोधी विचार या प्रतिक्रिया।
  3. सिन्थेसिस (Synthesis): दोनों के अंतर्संघर्ष से उत्पन्न नया, उच्चतर विचार।

यही प्रक्रिया बार-बार चलती है और ज्ञान का विकास होता रहता है।

आधुनिक दृष्टिकोण में प्रासंगिकता

  • मार्क्सवादी शिक्षा सिद्धांत में “Critical Pedagogy” (Paulo Freire) इसी विचार से प्रेरित है।
  • ज्ञान को हमेशा सामाजिक संघर्ष का उत्पाद माना गया — न कि किसी दैवी या स्थायी स्रोत का।

उदाहरण:

  1. न्यूटन का यांत्रिक दृष्टिकोणआइंस्टाइन का सापेक्षता सिद्धांत → आगे क्वांटम दृष्टिकोण
    → यह वैज्ञानिक ज्ञान का द्वन्द्वात्मक विकास है।
  2. पूंजीवादी आर्थिक विचारसमाजवादी आर्थिक विचार → दोनों का संघर्ष ही नए आर्थिक विमर्शों को जन्म देता है।
द्वन्द्वात्मक दृष्टिकोण के अनुसार — 
ज्ञान स्थिर नहीं, बल्कि संघर्ष और विरोधाभास की प्रक्रिया में विकसित होने वाला ऐतिहासिक-सामाजिक सत्य है।

ज्ञान की प्रगति विचारधाराओं के संघर्ष, आलोचना और संश्लेषण से होती है — यही “Dialectics of Knowledge” का सार है।

39. मार्क्सवादी मानवतावाद किस कारण उत्पन्न हुआ?

(a) द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के अप्रासंगिक होने और विसंगतियों के कारण
(b) हीगेल के आदर्शवाद को स्वीकारने के लिए
(c) प्राकृतिक विज्ञान में भौतिकवाद को समर्थन देने के लिए
(d) स्टालिन की आलोचना करने के लिए

उत्तर: (a) द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के अप्रासंगिक होने और विसंगतियों के कारण

व्याख्या:

20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों (1920–1950) के बीच,
मार्क्सवाद के दो प्रमुख रूप विकसित हुए —

  1. औपचारिक / डॉगमैटिक मार्क्सवाद (Dogmatic Marxism) – जो सोवियत रूस में राज्य की विचारधारा के रूप में विकसित हुआ।
  2. मानवतावादी मार्क्सवाद (Humanist Marxism) – जो पश्चिमी विद्वानों (जैसे लुकाच, ग्राम्शी, एरिक फ़्रॉम, हर्बर्ट मार्क्यूज़ आदि) के बीच उभरा।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की विसंगतियाँ:

सोवियत संघ में स्टालिन के दौर में,
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) एक कठोर वैचारिक औजार बन गया था।
इसमें

  • व्यक्ति की स्वतंत्रता,
  • रचनात्मकता,
  • नैतिकता,
  • और मानवीय संवेदनाएँ
    लगभग उपेक्षित हो गईं।

इससे मार्क्सवाद एक “यांत्रिक भौतिकवाद” (mechanical materialism) में बदल गया —
जहाँ केवल आर्थिक संरचना और वर्ग-संघर्ष को ही महत्व मिला।

परिणामस्वरूप — मार्क्सवादी मानवतावाद का उदय:

इस कठोर भौतिक दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया में,
पश्चिमी मार्क्सवादी विचारकों ने मार्क्स के शुरुआती लेखनों —
विशेषकर “Economic and Philosophic Manuscripts of 1844” — को पुनः खोजा।

इन लेखनों में मार्क्स ने “मानव की परकाया (alienation)”, रचनात्मक श्रम (creative labor) और मानव की आत्म-सिद्धि (self-realization) की चर्चा की थी।

यहीं से मार्क्सवादी मानवतावाद (Marxist Humanism) की धारा विकसित हुई।

मुख्य तर्क:

मार्क्सवादी मानवतावाद यह मानता है कि —

मार्क्स का वास्तविक उद्देश्य केवल आर्थिक व्यवस्था का परिवर्तन नहीं था,
बल्कि मानव की मुक्ति (Human Emancipation) और सृजनात्मक चेतना का पुनरुत्थान था।

इसलिए, मार्क्सवाद को केवल वर्ग-संघर्ष का दर्शन नहीं, बल्कि मानव स्वतंत्रता का दर्शन भी समझा जाना चाहिए।

5. प्रमुख समर्थक:

  • जॉर्ज लुकाच (Georg Lukács) – “History and Class Consciousness”
  • अन्तोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) – “Prison Notebooks”
  • एरिक फ़्रॉम (Erich Fromm) – “Marx’s Concept of Man”
  • हर्बर्ट मार्क्यूज़ (Herbert Marcuse) – “One-Dimensional Man”

इन विचारकों ने मानवतावादी दृष्टिकोण से मार्क्सवाद को पुनर्परिभाषित किया।

पहलूपारंपरिक मार्क्सवादमानवतावादी मार्क्सवाद
मुख्य आधारआर्थिक संरचना (Economic Structure)मानव स्वतंत्रता (Human Freedom)
केंद्र बिंदुवर्ग-संघर्षपरकाया और आत्म-साक्षात्कार
दृष्टिकोणयांत्रिक, वस्तुगतनैतिक, मानवीय
प्रतिनिधिलेनिन, स्टालिनलुकाच, ग्राम्शी, फ़्रॉम
मार्क्सवादी मानवतावाद की उत्पत्ति,
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की सीमाओं और अमानवीय कठोरता के विरोध में हुई थी।
इसका उद्देश्य था —

“मार्क्स के दर्शन को पुनः मानवीय और नैतिक संदर्भ में पुनर्स्थापित करना।”

40. लुकाज (Lukacs) और कोर्ष (Korsch) ने द्वन्द्ववाद की व्याख्या में क्या किया?

(a) प्राकृतिक विज्ञानों के भौतिकवाद को स्वीकार किया
(b) प्राकृतिक विज्ञानों के भौतिकवाद को नकारा और हीगेल के द्वन्द्ववाद को स्थापित किया
(c) द्वन्द्ववाद को हीगेल से पूरी तरह अलग किया
(d) केवल बोल्शेविक दफ्तरशाही पर ध्यान दिया

उत्तर: (b) प्राकृतिक विज्ञानों के भौतिकवाद को नकारा और हीगेल के द्वन्द्ववाद को स्थापित किया

व्याख्या:

1920 के दशक में यूरोप में मार्क्सवाद दो धाराओं में विभाजित होने लगा —

  1. सोवियत मार्क्सवाद (Dialectical Materialism) — जो विज्ञान और भौतिकता पर आधारित था।
  2. पश्चिमी मार्क्सवाद (Western Marxism) — जिसने मानवीय चेतना और दर्शन को पुनः महत्व दिया।

इसी पश्चिमी परंपरा के दो प्रमुख विचारक थे —
जॉर्ज लुकाज (Georg Lukács) और कार्ल कोर्ष (Karl Korsch)

उनका बौद्धिक उद्देश्य:

लुकाज और कोर्ष ने देखा कि सोवियत परंपरा में
मार्क्सवाद यांत्रिक भौतिकवाद (Mechanical Materialism) बन गया है —
जहाँ मनुष्य, चेतना, और संस्कृति की भूमिका नगण्य मानी गई।

इसलिए उन्होंने कहा कि
मार्क्सवाद को प्राकृतिक विज्ञानों की नकल करने की आवश्यकता नहीं,
बल्कि उसे एक ऐतिहासिक और सामाजिक दर्शन (historical-social philosophy) के रूप में समझा जाना चाहिए।

प्राकृतिक विज्ञानों के भौतिकवाद का विरोध:

लुकाज और कोर्ष का मानना था कि —
Natural sciences explain the external world mechanically,
लेकिन समाज और इतिहास मानव चेतना और क्रिया (praxis) से निर्मित होते हैं।

इसलिए उन्होंने भौतिकवाद के यांत्रिक और वैज्ञानिक रूप (mechanistic materialism) को अस्वीकार किया।

हीगेल के द्वन्द्ववाद की पुनर्स्थापना:

उन्होंने कहा कि मार्क्स का द्वन्द्ववाद
हीगेल के दार्शनिक द्वन्द्ववाद (Hegelian Dialectics) की निरंतरता है —
बस फर्क इतना है कि मार्क्स ने उसे “भौतिक” आधार पर पुनर्परिभाषित किया।

लुकाज की पुस्तक: History and Class Consciousness (1923)
में उन्होंने लिखा:

“Dialectics is not a law of nature, but a method of understanding social totality.”
(“द्वन्द्ववाद प्रकृति का नियम नहीं, बल्कि समाज की समग्रता को समझने की विधि है।”)

इससे यह स्पष्ट हुआ कि उन्होंने द्वन्द्ववाद को ऐतिहासिक-चेतनात्मक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया।

कोर्ष (Korsch) का योगदान:

कार्ल कोर्ष ने अपनी पुस्तक Marxism and Philosophy (1923) में कहा कि —

“मार्क्सवाद स्वयं दर्शन के खिलाफ नहीं, बल्कि एक नए दर्शन की ओर कदम है।”

उन्होंने यह दिखाया कि मार्क्स के विचारों को दर्शन, राजनीति और इतिहास के एकीकृत दृष्टिकोण में समझना चाहिए।

मुख्य अंतर:

पहलूसोवियत द्वन्द्वात्मक भौतिकवादलुकाज–कोर्ष का द्वन्द्ववाद
आधारप्रकृति और विज्ञानइतिहास और चेतना
दृष्टिकोणयांत्रिक, वस्तुगतमानवीय, दार्शनिक
प्रेरणाप्राकृतिक भौतिकवादहीगेल का द्वन्द्ववाद
लक्ष्यवर्ग संघर्ष की वैज्ञानिकतावर्ग चेतना की दार्शनिकता

लुकाज और कोर्ष ने मार्क्सवाद को “वैज्ञानिक भौतिकवाद” से हटाकर “दार्शनिक मानवतावाद” की ओर मोड़ा।
उनका जोर था कि —

द्वन्द्ववाद केवल वस्तुओं का नहीं, बल्कि चेतनात्मक सामाजिक संबंधों का भी अध्ययन करता है।
लुकाज और कोर्ष की व्याख्या ने
पश्चिमी मार्क्सवाद (Western Marxism) की नींव रखी,
जहाँ मार्क्स को केवल अर्थशास्त्री नहीं, बल्कि
दार्शनिक और मानवमुक्ति के विचारक के रूप में पुनः प्रस्तुत किया गया।
“Dialectics is the science of totality.” — Georg Lukács, History and Class Consciousness (1923) 

“द्वन्द्ववाद समग्रता का विज्ञान है।” — जॉर्ज लुकाज, इतिहास और वर्ग चेतना (1923)

41. मार्क्स के द्वन्द्ववाद का कौन सा पहलू सम्पूर्ण वास्तविकता की व्याख्या में सहायक है?

(a) जीव विकास विज्ञान का द्वन्द्व
(b) प्राकृतिक भौतिकवाद
(c) आर्थिक विश्लेषण केवल
(d) बाहरी सामाजिक दबाव

उत्तर: (a) जीव विकास विज्ञान का द्वन्द्व

व्याख्या:

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सार

मार्क्स ने यह प्रतिपादित किया कि वास्तविकता (Reality) कोई स्थिर वस्तु नहीं है,
बल्कि यह निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया (Dynamic Process) है।

इस परिवर्तन को समझने के लिए उन्होंने द्वन्द्वात्मक विधि (Dialectical Method) अपनाई,
जो हेगेल से ली गई थी, परंतु उसे भौतिक आधार (Material Base) पर पुनःस्थापित किया गया।

मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद के तीन आयाम हैं —

  1. ज्ञानमीमांसीय द्वन्द्व (Epistemological Dialectics) – ज्ञान और विचार की अंतःक्रिया।
  2. सत्तामीमांसीय / जीव-विकास विज्ञान का द्वन्द्व (Ontological Dialectics) – अस्तित्व और उसके परिवर्तन के नियम।
  3. संबंधात्मक द्वन्द्व (Relational Dialectics) – सामाजिक संबंधों की परस्पर क्रियाएँ।

जीव-विकास विज्ञान का द्वन्द्व क्या है?

Ontology का अर्थ है — “अस्तित्व का विज्ञान” (Science of Being)।
इसलिए Ontological Dialectics वह दृष्टिकोण है जो वस्तुओं, समाज और प्रकृति के अस्तित्व तथा उनके परिवर्तन के नियमों को स्पष्ट करता है।

मार्क्स के अनुसार —

“The history of nature and the history of men are mutually dependent.”
(प्रकृति का इतिहास और मानव का इतिहास परस्पर निर्भर हैं।)

इसका आशय यह है कि —
प्रकृति और समाज दोनों एक समान द्वन्द्वात्मक नियमों — परिवर्तन (Change), विरोध (Contradiction) और विकास (Development) से संचालित होते हैं।

Ontological Dialectics का महत्व

पहलूव्याख्या
1. वास्तविकता की वैज्ञानिक व्याख्यायह सिद्ध करता है कि वास्तविकता कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया (Process) है।
2. विरोध ही परिवर्तन का स्रोतप्रत्येक वस्तु में आंतरिक विरोध (Internal Contradiction) मौजूद होता है जो उसके विकास का कारण है।
3. समाज और प्रकृति की एकतायह दर्शाता है कि प्रकृति और समाज दोनों एक ही सार्वभौमिक नियमों से संचालित होते हैं।
4. सामाजिक परिवर्तन की वैज्ञानिक समझपरिवर्तन विचारों से नहीं, बल्कि भौतिक परिस्थितियों और वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) से उत्पन्न होता है।

उदाहरण

  • प्रकृति में: तत्व, अणु और जीवन-रूप निरंतर परिवर्तित होते हैं।
  • समाज में: उत्पादन संबंध, वर्ग-संरचना और विचारधाराएँ विरोध और संघर्ष के माध्यम से विकसित होती हैं।
  • यह पूरी प्रक्रिया द्वन्द्वात्मक गति (Dialectical Motion) कहलाती है।

मार्क्स की दृष्टि से Ontological Dialectics

मार्क्स ने हेगेल के “Absolute Idea” की जगह Material Reality को केंद्र में रखा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि —

“Life is not determined by consciousness, but consciousness by life.”
Karl Marx, The German Ideology (1846)
(जीवन चेतना से निर्धारित नहीं होता, बल्कि चेतना जीवन से निर्धारित होती है।)

अर्थात्,
वास्तविकता की गति (movement) चेतना से नहीं, बल्कि भौतिक परिस्थितियों से उत्पन्न होती है।

Ontological Dialectics का सार

तत्वOntological Dialectics में भूमिका
प्रकृतिनिरंतर परिवर्तनशील और गतिशील।
समाजभौतिक परिस्थितियों के द्वन्द्व से संचालित।
मनुष्यसामाजिक संबंधों का उत्पाद।
परिणामवास्तविकता की वैज्ञानिक, भौतिक और विकासशील व्याख्या।
Ontological Dialectics मार्क्सवादी दर्शन का सबसे गहन, वैज्ञानिक और सार्वभौमिक पहलू है,
क्योंकि यह न केवल सामाजिक परिवर्तन, बल्कि
पूरी वास्तविकता (Total Reality) — यानी प्रकृति, समाज और मनुष्य — तीनों की व्याख्या करता है।
“वास्तविकता का सार परिवर्तन है।” — Karl Marx, Das Kapital

Mohan Exam

42. संसर्गी द्वन्द्व किसके अध्ययन में उपयोगी है?

(a) प्राकृतिक विज्ञान में
(b) मानव व्यवहार और सामाजिक इंटरैक्शन में
(c) केवल विचारधाराओं में
(d) अर्थशास्त्र में

उत्तर: (b) मानव व्यवहार और सामाजिक इंटरैक्शन में

व्याख्या:

संसर्गी द्वन्द्व (Relational Dialectics) का अर्थ

शब्द “Dialectics” का अर्थ है — विरोधों (Contradictions) के बीच संबंधों और उनके विकास का अध्ययन।
जब इसे “Relational” शब्द के साथ जोड़ा जाता है, तो इसका अर्थ होता है —

“मानव संबंधों और सामाजिक परस्पर क्रियाओं में उत्पन्न विरोधों और उनके संतुलन की प्रक्रिया।”

दूसरे शब्दों में,
Relational Dialectics यह बताता है कि
हर संबंध — चाहे वह व्यक्ति-व्यक्ति, वर्ग-वर्ग, या समाज-राज्य के बीच हो —
हमेशा विरोध, संघर्ष और समन्वय की प्रक्रिया में होता है।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से संसर्गी द्वन्द्व

मार्क्स ने समाज को “संबंधों का समूह” (ensemble of relations) कहा है।

“The essence of man is the ensemble of social relations.”
Karl Marx, Theses on Feuerbach (1845)
(“मनुष्य का सार उसके सामाजिक संबंधों का समूह है।”)

इस दृष्टि से —

  • कोई भी व्यक्ति अपने संबंधों (relations) से अलग नहीं समझा जा सकता।
  • समाज निरंतर परिवर्तनशील है क्योंकि इन संबंधों में द्वन्द्व निहित हैं —
    जैसे पूँजीपति और श्रमिक, पुरुष और स्त्री, शासक और शासित इत्यादि।

इसलिए, संसर्गी द्वन्द्व मार्क्सवादी दर्शन में यह स्पष्ट करता है कि —

“सामाजिक परिवर्तन संबंधों के भीतर निहित विरोधों से उत्पन्न होता है।”

आधुनिक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण

समाजशास्त्रियों Leslie Baxter और Barbara Montgomery ने
“Relational Dialectics Theory” (1988) विकसित की।
उन्होंने कहा —

“Relationships are not linear and static, but dynamic and contradictory.”

अर्थात् —
संबंध (relationships) हमेशा तनाव (tension) और विरोध (contradiction) की अवस्था में रहते हैं,
और यही विरोध उन्हें जीवित और विकासशील बनाता है।

उन्होंने तीन प्रमुख द्वन्द्वों का उल्लेख किया —

द्वन्द्व (Dialectic)अर्थउदाहरण
Openness – Closednessसंबंधों में खुलापन और निजता के बीच संतुलनपरिवार में हर बात साझा करना बनाम कुछ बातें निजी रखना
Autonomy – Connectionस्वतंत्रता और जुड़ाव के बीच द्वन्द्वमित्रता में स्वतंत्र रहना बनाम घनिष्ठ जुड़ाव चाहना
Predictability – Noveltyस्थिरता और नवीनता के बीच द्वन्द्वदांपत्य जीवन में रोज़मर्रा की स्थिरता बनाम नएपन की चाह

संसर्गी द्वन्द्व के तीन स्तर

स्तरविवरणउदाहरण
व्यक्तिगत (Intrapersonal)व्यक्ति के भीतर के विरोधस्वतंत्र रहना बनाम संबंधों की चाह
अंतरव्यक्तिगत (Interpersonal)दो व्यक्तियों के बीच विरोधमित्रता में खुलापन बनाम सीमाएँ
सामाजिक (Societal)समाज के समूहों और वर्गों के बीच विरोधपूँजीपति बनाम श्रमिक

मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य में महत्व

पहलूव्याख्या
सामाजिक परिवर्तन का आधारसमाज में संबंधों (relations of production) के भीतर के द्वन्द्व वर्ग-संघर्ष को जन्म देते हैं।
मानव व्यवहार की समझव्यक्ति के व्यवहार में विरोधों (freedom vs dependence, private vs public) की पहचान होती है।
संबंधों की गतिशीलतासमाज और व्यक्ति दोनों स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, संघर्ष और समायोजन की प्रक्रिया में हैं।
संवाद और विकासविरोध (contradiction) ही विकास (development) का स्रोत है — चाहे वह संबंध हो या समाज।

उदाहरण

  1. परिवारिक संबंधों में:
    माता-पिता और बच्चों के बीच प्यार और अनुशासन का द्वन्द्व।
  2. कार्यस्थल पर:
    सहकर्मी एक-दूसरे से सहयोग भी करते हैं और प्रतिस्पर्धा भी।
  3. सामाजिक स्तर पर:
    परंपरा (tradition) और आधुनिकता (modernity) के बीच द्वन्द्व।

मार्क्स के उद्धरण (Quotes)

“The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.”
Communist Manifesto (1848)
(“अब तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास है।”)

यह कथन सामाजिक संबंधों में निहित विरोधों की मूल भावना को स्पष्ट करता है —
संसर्गी द्वन्द्व इन्हीं संघर्षों का विश्लेषण करने का उपकरण है।

संसर्गी द्वन्द्व यह सिखाता है कि —

  • समाज या संबंध कोई स्थिर वस्तु नहीं है,
    बल्कि विरोधों, संवादों और परिवर्तन की जीवंत प्रक्रिया है।
  • यह मनुष्य के व्यवहार, सामाजिक संबंधों और वर्गीय संरचनाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने में मदद करता है।

43. मार्क्स के अनुसार द्वन्द्ववाद का मुख्य लक्ष्य क्या है?

(a) केवल तत्वज्ञान प्रस्तुत करना
(b) समाज और इतिहास के विकास की वैज्ञानिक व्याख्या देना
(c) केवल आर्थिक व्यवस्था का समर्थन करना
(d) राजनीतिक सत्ता बनाए रखना

उत्तर: (b) समाज और इतिहास के विकास की वैज्ञानिक व्याख्या देना

व्याख्या:

द्वन्द्ववाद (Dialectics) का अर्थ

द्वन्द्ववाद का अर्थ है —
विरोधों (Contradictions) के माध्यम से विकास (Development) और परिवर्तन (Change) की व्याख्या करने की वैज्ञानिक विधि।

हेगेल ने इसे “विचार की गति” (movement of thought) के रूप में समझाया था,
जबकि मार्क्स ने इसे भौतिक दुनिया और समाज की गति (movement of material reality) से जोड़ा।

इसलिए मार्क्स का द्वन्द्ववाद दार्शनिक (philosophical) नहीं बल्कि वैज्ञानिक (scientific) उपकरण है।

मार्क्स का उद्देश्य

मार्क्स ने हेगेल के आदर्शवादी द्वन्द्ववाद (Idealist Dialectics) को उलट दिया
और उसे भौतिकवादी आधार (Materialist Foundation) पर पुनः स्थापित किया।

“My dialectical method is not only different from Hegel’s, but is its direct opposite.”
Karl Marx, Das Kapital (1867)

अर्थात् —
हेगेल का द्वन्द्ववाद विचारों के भीतर परिवर्तन खोजता है,
जबकि मार्क्स वास्तविक भौतिक परिस्थितियों (economic and social relations) में परिवर्तन की खोज करते हैं।

द्वन्द्ववाद का मुख्य लक्ष्य — वैज्ञानिक व्याख्या

मार्क्स का लक्ष्य किसी आदर्शवाद या दर्शन का समर्थन करना नहीं था,
बल्कि समाज, इतिहास और मानव व्यवहार के वैज्ञानिक नियमों को उजागर करना था।

पहलूमार्क्स का दृष्टिकोण
उद्देश्यसमाज और इतिहास के परिवर्तन को समझना
माध्यमभौतिक परिस्थितियों और वर्ग-संघर्ष के द्वन्द्व
परिणामसमाज के विकास के नियमों की वैज्ञानिक व्याख्या
स्वरूपवैज्ञानिक, भौतिकवादी और ऐतिहासिक दृष्टिकोण

उदाहरण: इतिहास और समाज का विकास

मार्क्स ने कहा कि इतिहास की गति विचारों से नहीं,
बल्कि उत्पादन संबंधों (Relations of Production) और वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) से संचालित होती है।

“The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.”
Communist Manifesto (1848)

इस दृष्टि से —
द्वन्द्ववाद समाज और इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या का उपकरण बन जाता है,
जो यह दिखाता है कि सामाजिक परिवर्तन भौतिक विरोधों (material contradictions) से उत्पन्न होता है।

द्वन्द्ववाद के तीन प्रमुख सिद्धांत (मार्क्सवादी दृष्टि से)

सिद्धांतविवरणउदाहरण
परस्पर विरोध का नियम (Law of Contradiction)प्रत्येक वस्तु में विरोध निहित है जो परिवर्तन लाता हैपूँजीपति बनाम श्रमिक
परिमाण से गुणात्मक परिवर्तन (Law of Quantitative to Qualitative Change)छोटे-छोटे बदलाव मिलकर बड़ा परिवर्तन लाते हैंऔद्योगिक क्रांति
निषेध के निषेध का नियम (Law of Negation of Negation)प्रत्येक अवस्था अपने निषेध से आगे बढ़ती हैसामंतवाद → पूँजीवाद → समाजवाद

इन नियमों से समाज के विकास की वैज्ञानिक प्रक्रिया समझी जा सकती है।

“Philosophers have only interpreted the world in various ways; the point, however, is to change it.”
Karl Marx, Theses on Feuerbach (1845)

(दार्शनिकों ने अब तक केवल संसार की व्याख्या की है;
परंतु बात यह है कि उसे बदलना चाहिए।)

इस कथन से स्पष्ट है कि
मार्क्स का द्वन्द्ववाद केवल विचारात्मक या तत्वमीमांसीय नहीं,
बल्कि क्रियाशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण है जो समाज के वास्तविक परिवर्तन का आधार प्रदान करता है।

मार्क्स के अनुसार —
द्वन्द्ववाद का लक्ष्य विचारों का तर्कशास्त्र बनाना नहीं,
बल्कि समाज और इतिहास में परिवर्तन के भौतिक नियमों की वैज्ञानिक व्याख्या करना है।

इसलिए यह वैज्ञानिक समाजवाद (Scientific Socialism) का दार्शनिक आधार बन जाता है।

सारांश

तत्वविवरण
मुख्य लक्ष्यसमाज और इतिहास के विकास की वैज्ञानिक व्याख्या देना
दृष्टिकोणभौतिकवादी (Materialist)
केंद्रबिंदुवर्ग-संघर्ष और उत्पादन संबंध
उपयोगसामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया समझने में
प्रमुख उद्धरण“Philosophers have only interpreted the world… the point is to change it.”

44. मार्क्स ने द्वन्द्व के लिए हीगेल से क्या उधार लिया?

(a) तत्वमीमांसा का दृष्टिकोण
(b) आदर्शवादी द्वन्द्व की अवधारणा
(c) पूंजीवादी समाज का विश्लेषण
(d) प्राकृतिक भौतिकवाद

उत्तर: (b) आदर्शवादी द्वन्द्व की अवधारणा

व्याख्या:

पृष्ठभूमि: हेगेल और मार्क्स का संबंध

जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल (1770–1831)
— जर्मन दार्शनिक थे जिन्होंने आदर्शवादी द्वन्द्ववाद (Idealist Dialectics) की रचना की।

उनके अनुसार —

“वास्तविकता (Reality) विचार (Idea) की अभिव्यक्ति है।”

अर्थात्, विचार (Idea or Spirit) ही मूल है, और भौतिक जगत उसी का परिणाम है।
हेगेल के द्वन्द्व का केंद्र विचार (Consciousness) था, न कि पदार्थ (Matter)।

मार्क्स ने क्या अपनाया?

मार्क्स ने हेगेल की द्वन्द्वात्मक पद्धति (Dialectical Method) को तो स्वीकार किया,
परन्तु उसकी आदर्शवादी नींव (Idealist Foundation) को अस्वीकार कर दिया।

“My dialectical method is not only different from Hegel’s, but is its direct opposite.”
Karl Marx, Das Kapital (1867)

मार्क्स ने कहा कि हेगेल का द्वन्द्व “सीधे सिर के बल खड़ा था”,
इसलिए उन्होंने उसे “पैरों पर खड़ा कर दिया” — यानी भौतिक आधार (Material Base) पर।

मार्क्स ने हेगेल से क्या “उधार” लिया?

पहलूहेगेल से लिया गयामार्क्स द्वारा संशोधित
द्वन्द्व की संरचनाThesis → Antithesis → Synthesisसमान संरचना रखी
द्वन्द्व की गतिविचारों के भीतर संघर्षभौतिक परिस्थितियों और वर्ग-संघर्ष के भीतर संघर्ष
विकास का सिद्धांतआत्मा (Spirit) का विकाससमाज और इतिहास का भौतिक विकास
द्वन्द्व की भूमिकातर्कशास्त्र का नियमसामाजिक परिवर्तन की वैज्ञानिक विधि

मार्क्स का सुधार — “भौतिकवादी द्वन्द्व”

हेगेल का द्वन्द्व था आदर्शवादी (Idealist Dialectics)
→ जिसमें विचार ही वास्तविकता का मूल था।

मार्क्स ने इसे बदला और बनाया भौतिकवादी द्वन्द्व (Materialist Dialectics)
→ जिसमें भौतिक जीवन की परिस्थितियाँ, उत्पादन संबंध और वर्ग-संघर्ष समाज की गति निर्धारित करते हैं।

“It is not the consciousness of men that determines their being,
but their social being that determines their consciousness.”
Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)

(मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती,
बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना को निर्धारित करता है।)

तुलना: हेगेल बनाम मार्क्स

तत्वहेगेलमार्क्स
दर्शन का प्रकारआदर्शवादी (Idealism)भौतिकवादी (Materialism)
मूल तत्वविचार या आत्माभौतिक परिस्थितियाँ
परिवर्तन का कारणविचारों का द्वन्द्वभौतिक विरोध (Class Conflict)
लक्ष्यआत्मा का आत्म-साक्षात्कारसमाज का वैज्ञानिक परिवर्तन
द्वन्द्व की प्रकृतिदार्शनिकऐतिहासिक और सामाजिक
“The mystical shell of Hegel’s dialectic must be broken.”
Karl Marx, Capital (1867)

(हेगेल के द्वन्द्व की रहस्यमयी खोल को तोड़ना आवश्यक है।)

अर्थात् —
मार्क्स ने हेगेल की द्वन्द्वात्मक “रचना” (form) को बनाए रखा,
पर उसकी “विषयवस्तु” (content) को आदर्शवाद से निकालकर भौतिकवाद में बदल दिया।

इस प्रकार,
मार्क्स ने हेगेल से द्वन्द्व की संरचना और प्रक्रिया (Dialectical Framework) उधार ली,
परंतु उसके आदर्शवादी स्वरूप को हटाकर उसे वैज्ञानिक और भौतिकवादी रूप में परिवर्तित किया।

सारांश सारणी

तत्वविवरण
हेगेल से लिया गयाआदर्शवादी द्वन्द्व की अवधारणा
मार्क्स द्वारा परिवर्तनभौतिकवादी द्वन्द्व में रूपांतरित
केंद्रबिंदुभौतिक परिस्थितियाँ और वर्ग-संघर्ष
उद्देश्यसमाज और इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या
प्रमुख उद्धरण“My dialectical method is the direct opposite of Hegel’s.”

45. मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद में विचार और पदार्थ का संबंध कैसा है?

(a) विचार ही प्राथमिक है
(b) पदार्थ ही प्राथमिक है
(c) दोनों समान रूप से प्राथमिक हैं
(d) दोनों अप्रासंगिक हैं

उत्तर: (b) पदार्थ ही प्राथमिक है

व्याख्या:

1. विचार और पदार्थ का संबंध (Relation between Idea and Matter):
मार्क्स ने कहा कि पदार्थ (Matter) — यानि भौतिक वास्तविकता — विचार (Idea) से पहले अस्तित्व में आती है।
मनुष्य का चेतन (Consciousness) पदार्थ से उत्पन्न होता है, न कि इसके विपरीत।

इस प्रकार, मनुष्य का विचार उसके भौतिक जीवन की परिस्थितियों (economic and material conditions) का उत्पाद है।

2. हीगेल से भिन्नता:

  • हीगेल का द्वन्द्व आदर्शवादी (Idealist) था — वह मानता था कि विचार (Idea) ही वास्तविकता को जन्म देता है।
  • मार्क्स ने इस दृष्टिकोण को उलट दिया और कहा —
    “It is not the consciousness of men that determines their existence, but their social existence that determines their consciousness.”
    [“मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना को निर्धारित करता है।”]

3. परिणाम (Implication):
इसका अर्थ यह है कि समाज, इतिहास, और राजनीति को समझने के लिए हमें पहले उसके भौतिक आधार (material base) — जैसे उत्पादन प्रणाली, वर्ग-संबंध, और आर्थिक ढांचे — को समझना चाहिए, न कि केवल विचारधाराओं को।

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • यह सिद्धांत ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) का भी आधार है।
  • मार्क्सवाद में “पदार्थ प्राथमिक” का अर्थ यह है कि विचार वास्तविकता को नहीं बनाता, बल्कि वास्तविकता विचार को बनाती है।
मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद का मूल यही है कि “पदार्थ (Matter) ही प्राथमिक और वास्तविक है, जबकि विचार (Idea) उसका प्रतिबिंब है।”

46. मार्क्स द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को किस रूप में देखते हैं?

(a) तत्वमीमांसा प्रधान
(b) कर्म प्रधान
(c) विचारधाराओं प्रधान
(d) राजनीतिक

उत्तर: (b) कर्म प्रधान (Praxis-oriented / Action-centered)

व्याख्या:

मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) केवल विचारों का दर्शन नहीं है, बल्कि यह वास्तविक जीवन की गतिविधियों (real-life activity) और कर्म (praxis) पर आधारित एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।

विचार नहीं, कर्म है मूल:

मार्क्स ने हेगेल के आदर्शवाद का विरोध करते हुए कहा —

“Philosophers have only interpreted the world, in various ways; the point, however, is to change it.”
Karl Marx, Theses on Feuerbach (1845)

“दार्शनिकों ने अब तक केवल संसार की व्याख्या की है, परंतु मुद्दा यह है कि उसे बदला जाए।”

इस कथन से स्पष्ट है कि —
मार्क्स का दर्शन कर्मप्रधान (praxis-oriented) है, न कि केवल चिंतन या व्याख्या तक सीमित।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का मूल भाव:

मार्क्स ने द्वन्द्व (dialectics) को भौतिक आधार (material base) से जोड़ा।
उन्होंने कहा कि समाज में परिवर्तन केवल विचारों से नहीं, बल्कि
भौतिक संघर्षों (material struggles) और मानवीय कर्मों से उत्पन्न होता है।

इसलिए उनके लिए —

  • विचार — द्वितीयक (secondary)
  • कर्म और उत्पादन प्रक्रिया — प्राथमिक (primary) है।

“Praxis” का अर्थ:

मार्क्स ने “Praxis” शब्द का प्रयोग इस रूप में किया कि —

“विचार और कर्म का एकत्व ही वास्तविक परिवर्तन लाता है।”

अर्थात् —
ज्ञान और क्रिया (theory and practice) का समन्वय ही इतिहास की गति को आगे बढ़ाता है।

सारांश:

तत्वमार्क्सवादी दृष्टि
दर्शन का प्रकारकर्मप्रधान एवं वैज्ञानिक
परिवर्तन का स्रोतसामाजिक और आर्थिक संघर्ष
विचार की भूमिकाकर्म का परिणाम
उद्देश्यसमाज को बदलना, केवल समझना नहीं
मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद 

“कर्मप्रधान, यथार्थवादी और परिवर्तनशील दर्शन” है,
जो इस सिद्धांत पर आधारित है कि —
“वास्तविकता को समझने का सर्वोत्तम तरीका है — उसे बदलने के लिए कार्य करना।”

Mohan Exam

47. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में किसी भी वस्तु को कैसे देखा जाता है?

(a) स्थिर और अपरिवर्तनीय
(b) गतिशील और संघर्षशील
(c) केवल मानसिक और आदर्श
(d) केवल भौतिक और जड़

उत्तर: (b) गतिशील और संघर्षशील (Dynamic and Contradictory)

व्याख्या:

मार्क्सवादी द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) का मूल सिद्धांत यह है कि —

“वास्तविकता (Reality) सदैव परिवर्तनशील, गतिशील और विरोधाभासों से भरी होती है।”

मार्क्स ने हेगेल के “द्वन्द्व” (Dialectic) को भौतिक जगत पर लागू किया और कहा कि —

“प्रकृति, समाज और विचार — सभी निरंतर परिवर्तन की अवस्था में हैं।”

वस्तु स्थिर नहीं, बल्कि प्रक्रिया (Process) है:

मार्क्स के अनुसार,

कोई भी वस्तु (thing) या सामाजिक संस्था एक “स्थिर इकाई” नहीं, बल्कि एक “प्रक्रिया” है,
जो निरंतर अंदरूनी विरोध (inner contradiction) के कारण बदलती रहती है।

उदाहरण के लिए —

  • बीज → पौधा → वृक्ष → मृत्यु — यह निरंतर विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया है।
  • समाज में भी वर्गों के बीच विरोध (class conflict) के कारण परिवर्तन और नई व्यवस्था उत्पन्न होती है।

द्वन्द्व का नियम (Law of Contradiction):

मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार,

“विकास का स्रोत वस्तुओं के भीतर निहित विरोध (contradiction) है।”

यानी हर वस्तु में दो विपरीत शक्तियाँ (forces) कार्य करती हैं —
एक जो स्थिरता (continuity) बनाए रखती है।
दूसरी जो परिवर्तन (change) लाती है।

इन दोनों के संघर्ष (conflict) से ही नया विकास (development) होता है।

द्वन्द्वात्मक गति का उदाहरण:

क्षेत्रविरोधाभास (Contradiction)परिणाम
प्रकृतिजीवन बनाम मृत्युजैविक विकास
समाजपूँजीपति बनाम श्रमिकसामाजिक परिवर्तन
विचारपुराना बनाम नयावैचारिक प्रगति

एंगेल्स का कथन:

“Nature is not a state of rest, but a state of motion and change.”
Dialectics of Nature

“प्रकृति स्थिर नहीं, बल्कि गति और परिवर्तन की अवस्था में है।”

सारांश:

पहलूद्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में दृष्टि
वस्तु का स्वरूपगतिशील (Dynamic)
परिवर्तन का कारणआंतरिक द्वन्द्व (Inner Contradiction)
विकास की दिशासर्पिल रूप (Spiral Progress)
दर्शन का स्वभाववैज्ञानिक और भौतिकवादी
मार्क्सवादी दृष्टिकोण में — 

“कोई भी वस्तु, विचार या समाज स्थिर नहीं है।”
बल्कि —
“वह निरंतर विरोध और संघर्ष के माध्यम से विकास की दिशा में आगे बढ़ता है।”

संक्षिप्त सूत्र:

“परिवर्तन ही वास्तविकता का नियम है।” — मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद

48. मार्क्स के अनुसार समाज की वास्तविकता किसमें निहित है?

(a) विचारधारा में
(b) पदार्थ में
(c) कानून में
(d) राजनीति में

उत्तर: (b) पदार्थ में

व्याख्या:

मार्क्स (Karl Marx) ने समाज की वास्तविकता (Reality of Society) को भौतिक आधार (Material Base) पर स्थापित किया।
उन्होंने कहा कि समाज का निर्माण और उसका स्वरूप —

“विचारों” या “चेतना” से नहीं, बल्कि भौतिक परिस्थितियों (Material Conditions) से निर्धारित होता है।

मार्क्स का भौतिकवादी दृष्टिकोण (Materialist Outlook):

मार्क्स ने कहा —

“It is not the consciousness of men that determines their existence,
but their social existence that determines their consciousness.”
Karl Marx, Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy (1859)

“मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती,
बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व ही उसकी चेतना को निर्धारित करता है।”

इसका अर्थ है —
समाज की मूल वास्तविकता विचार नहीं, बल्कि भौतिक जीवन और उत्पादन संबंध (Material Life and Production Relations) हैं।

समाज का भौतिक आधार (Material Base):

मार्क्स ने समाज को दो भागों में बाँटा —

भागविवरण
आर्थिक आधार (Economic Base)उत्पादन के साधन (Means of Production) और उत्पादन संबंध (Relations of Production) — जैसे भूमि, पूँजी, श्रम आदि।
अधिरचना (Superstructure)कानून, राजनीति, धर्म, शिक्षा और विचारधाराएँ — जो आर्थिक आधार पर निर्भर करती हैं।

इस प्रकार,

आर्थिक आधार (Base) = समाज की वास्तविकता
अधिरचना (Superstructure) = उसी आधार की उपज

पदार्थ की भूमिका:

मार्क्स का मत था कि —

  • भौतिक परिस्थितियाँ (Material Conditions) ही समाज की संरचना, वर्ग-संघर्ष और इतिहास को निर्धारित करती हैं।
  • विचार, चेतना और संस्थाएँ इन परिस्थितियों की उपज हैं, न कि उनका कारण।

उदाहरण:
जब उत्पादन प्रणाली बदलती है (जैसे सामंतवाद → पूँजीवाद),
तो समाज की विचारधारा, कानून और राजनीति भी बदल जाती हैं।

अन्य दार्शनिकों से भिन्नता:

विचारकदृष्टिकोण
हेगेल (Hegel)विचार (Idea) को वास्तविकता का आधार मानते थे।
मार्क्स (Marx)पदार्थ (Matter) को वास्तविकता का आधार मानते हैं। उन्होंने कहा — “मैंने हेगेल को उल्टा खड़ा किया।”

सारांश:

पहलूमार्क्स का दृष्टिकोण
वास्तविकता का आधारपदार्थ (Matter)
चेतना का स्रोतभौतिक अस्तित्व (Material Existence)
समाज का विकासउत्पादन संबंधों के द्वन्द्व से
दर्शन का स्वरूपभौतिकवादी और वैज्ञानिक
मार्क्स के अनुसार — 

“समाज की वास्तविकता उसके विचारों में नहीं,
बल्कि उसकी भौतिक उत्पादन प्रणाली और जीवन की परिस्थितियों में निहित है।”

यानी —

“पदार्थ समाज की मूर्त वास्तविकता है, और चेतना उसकी उपज।”

49. द्वन्द्व की उत्पत्ति कहाँ से होती है?

(a) बाहरी शक्तियों से
(b) पदार्थ के अन्तर्विरोध से
(c) केवल मानसिक संघर्ष से
(d) सरकार द्वारा

उत्तर: (b) पदार्थ के अन्तर्विरोध से

व्याख्या:

मार्क्स (Karl Marx) के अनुसार —
द्वन्द्व (Dialectic) का वास्तविक स्रोत पदार्थ के भीतर निहित विरोधाभास (Internal Contradictions of Matter) हैं।
यह हेगेल के आदर्शवादी द्वन्द्ववाद से भिन्न एक भौतिकवादी द्वन्द्ववाद (Materialist Dialectics) है।

द्वन्द्व की मूल अवधारणा (Concept of Dialectic)

Dialectic’ का अर्थ है —

“विकास या परिवर्तन की वह प्रक्रिया जो विरोधी तत्वों (Contradictions) के संघर्ष से उत्पन्न होती है।”

मार्क्स के अनुसार —

“हर वस्तु, हर समाज, हर व्यवस्था के भीतर ऐसे अंतर्विरोध होते हैं
जो समय के साथ संघर्ष में बदलते हैं, और वही संघर्ष परिवर्तन लाता है।”

द्वन्द्व का स्रोत: पदार्थ के अन्तर्विरोध

मार्क्स ने कहा कि —

“वास्तविकता (Reality) अपने भीतर विरोधाभास रखती है।
यही विरोध (Contradiction) गति और परिवर्तन का कारण है।”

अर्थात् —
द्वन्द्व बाहरी शक्तियों द्वारा नहीं,
बल्कि स्वयं पदार्थ के भीतर मौजूद अंतर्विरोधों से उत्पन्न होता है।

उदाहरण:

  • प्रकृति में:
    गर्मी और सर्दी, दिन और रात, जीवन और मृत्यु — ये विरोध एक-दूसरे पर निर्भर हैं और संतुलन बनाते हैं।
  • समाज में:
    पूँजीवादी समाज में पूँजीपति (Capitalist) और मजदूर वर्ग (Proletariat) — दोनों के बीच संघर्ष आर्थिक संरचना के भीतर ही मौजूद है।
    यही संघर्ष अंततः सामाजिक परिवर्तन (Social Change) लाता है।

हेगेल बनाम मार्क्स का दृष्टिकोण

पहलूहेगेल (Hegel)मार्क्स (Marx)
द्वन्द्व का स्रोतविचार (Idea) के अंतर्विरोध सेपदार्थ (Matter) के अंतर्विरोध से
परिवर्तन का स्वरूपमानसिक और आदर्शभौतिक और वास्तविक
लक्ष्यआत्मा का विकाससमाज का वैज्ञानिक परिवर्तन

मार्क्स ने कहा —

“मैंने हेगेल के द्वन्द्व को उल्टा खड़ा कर दिया है।”
अर्थात् — विचार नहीं, भौतिक वास्तविकता परिवर्तन का कारण है।

पूँजीवाद का उदाहरण: द्वन्द्व की व्यावहारिक अभिव्यक्ति

पूँजीवादी व्यवस्था में —

  • शोषण (Exploitation) और उत्पादन (Production) एक साथ चलते हैं।
  • पूँजीपति लाभ चाहता है, मजदूर वेतन।
  • यह वर्ग-संघर्ष (Class Conflict) पूँजीवाद के भीतर का आंतरिक विरोध है।

मार्क्स ने कहा —

“Bourgeois society contains within itself the seeds of its own destruction.”
(बुर्जुआ समाज अपने विनाश के बीज अपने भीतर ही रखता है।)

दार्शनिक अर्थ में:

पदार्थ स्वयं सक्रिय (Active) और गतिशील (Dynamic) है।
उसकी गति (Movement) बाहरी नहीं,
बल्कि उसके भीतर के विरोधी तत्वों के संघर्ष (Contradictory Forces) से संचालित होती है।

इसी को Dialectical Motion कहा गया है —

“Motion is the mode of existence of matter.”
(गति ही पदार्थ के अस्तित्व का स्वरूप है।)

मुख्य बिंदु

बिंदुविवरण
द्वन्द्व का स्रोतपदार्थ के अंतर्विरोध
परिवर्तन का कारणविरोधी शक्तियों का संघर्ष
प्रकृति और समाज मेंदोनों में द्वन्द्व मौजूद
उद्देश्यवास्तविकता की वैज्ञानिक व्याख्या
परिणामविकास और परिवर्तन
मार्क्स के अनुसार — 

“द्वन्द्व बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है।”
“पदार्थ के भीतर निहित विरोध ही समाज और प्रकृति की गति तथा परिवर्तन का मूल कारण हैं।”

अर्थात् —

“विरोध ही विकास का जनक है।”

50. मार्क्स के अनुसार समाज में विकास का मुख्य माध्यम क्या है?

(a) सहमति और सहयोग
(b) संघर्ष
(c) शिक्षा
(d) तकनीकी प्रगति

उत्तर: (b) संघर्ष (Conflict)

व्याख्या:

मार्क्स (Karl Marx) के अनुसार —
संघर्ष (Conflict) समाज और इतिहास के विकास का मूल माध्यम (Primary Medium of Development) है।
यह संघर्ष वस्तुतः समाज के वर्गीय ढाँचे (Class Structure) और उत्पादन संबंधों (Relations of Production) के भीतर छिपे विरोधाभासों (Contradictions) से उत्पन्न होता है।

विकास का स्रोत — संघर्ष, न कि सहमति

हेगेल (Hegel) के अनुसार विकास “विचारों के द्वन्द्व” से होता है,
लेकिन मार्क्स ने इसे भौतिक आधार (Material Base) पर स्थापित किया।

उन्होंने कहा —

“The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.”
Karl Marx & Friedrich Engels, The Communist Manifesto (1848)

“अब तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास है।”

अर्थात् —
समाज में विकास तब होता है जब विरोधी वर्ग (Opposing Classes) के बीच संघर्ष अपने चरम पर पहुँचकर नई सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करता है।

संघर्ष की प्रकृति (Nature of Conflict)

मार्क्सवादी दृष्टिकोण में संघर्ष दो रूपों में कार्य करता है —

प्रकारविवरण
आंतरिक संघर्ष (Internal Conflict)समाज की आर्थिक संरचना और वर्ग-संबंधों के भीतर निहित विरोध — जैसे पूँजीपति बनाम मजदूर।
बाहरी संघर्ष (External Conflict)वर्गीय संघर्ष का परिणामस्वरूप समाजों या प्रणालियों के बीच टकराव — जैसे पूँजीवाद बनाम समाजवाद।

इन दोनों ही स्तरों पर संघर्ष समाज को आगे बढ़ाने का कार्य करता है।

वर्ग-संघर्ष: समाज परिवर्तन की शक्ति

मार्क्स का मानना था कि —
हर ऐतिहासिक युग में एक वर्ग “शोषक (Exploiter)” और दूसरा “शोषित (Exploited)” होता है।
इन दोनों के बीच आर्थिक विरोध (Economic Contradiction) और सामाजिक संघर्ष (Social Conflict)
समाज में परिवर्तन (Social Change) का कारण बनता है।

उदाहरण:

  • सामंतवाद (Feudalism) में संघर्ष था – सामंत (Lords) बनाम किसान (Serfs)
  • पूँजीवाद (Capitalism) में संघर्ष है – पूँजीपति (Capitalist) बनाम मजदूर (Worker)
  • यह संघर्ष अंततः समाजवाद (Socialism) की दिशा में अग्रसर होता है।

संघर्ष का परिणाम — विकास

संघर्ष का अर्थ केवल विनाश नहीं,
बल्कि रचनात्मक परिवर्तन (Creative Transformation) है।

मार्क्स ने दिखाया कि —

“विरोध (Contradiction) ही हर विकास का स्रोत है।”

जब पुराने उत्पादन संबंध (Old Relations of Production) नए उत्पादन बलों (New Forces of Production) के लिए बाधा बनते हैं,
तो संघर्ष उत्पन्न होता है, और यह संघर्ष समाज को एक नई अवस्था (New Stage of Development) की ओर ले जाता है।

दार्शनिक व्याख्या

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) में संघर्ष केवल सामाजिक ही नहीं,
बल्कि प्रकृति, विचार और वस्तु — सभी स्तरों पर विद्यमान है।

यह विरोधी शक्तियों (Opposite Forces) का संघर्ष है,
जो विकास की दिशा निर्धारित करता है।

“Without conflict, there is no progress.” — Karl Marx (interpreted)
“संघर्ष के बिना कोई प्रगति संभव नहीं।”

और एक अन्य विचार में —

“Life itself is a process of contradiction.”
(जीवन स्वयं विरोधों की प्रक्रिया है।)

मुख्य बिंदु

बिंदुविवरण
संघर्ष का स्वरूपवर्गीय और आर्थिक विरोध से उत्पन्न
संघर्ष का कारणउत्पादन संबंध और उत्पादन बलों का टकराव
संघर्ष का परिणामसमाज का विकास और रूपांतरण
संघर्ष का अर्थविनाश नहीं, रचनात्मक परिवर्तन
संघर्ष का स्तरव्यक्तिगत, सामाजिक और ऐतिहासिक
मार्क्स के अनुसार — 

“समाज का विकास सहमति से नहीं, संघर्ष से होता है।”
क्योंकि संघर्ष ही वह शक्ति है जो पुराने ढाँचों को तोड़कर नई ऐतिहासिक अवस्थाएँ निर्मित करता है।

अर्थात् —

“विरोध ही विकास का जनक है, और संघर्ष ही इतिहास की गति।”

51. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में विकास की दिशा कैसी होती है?

(a) सरल रेखा की तरह
(b) रुक-रुक कर
(c) गुणात्मक और सर्पिल
(d) केवल परिमाणात्मक

उत्तर: (c) गुणात्मक और सर्पिल

व्याख्या:

मार्क्स के अनुसार द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) में विकास की प्रक्रिया निरंतर, गतिशील और सर्पिल (spiral) होती है। इसका अर्थ है कि परिवर्तन केवल मात्रा (quantitative change) में नहीं रुकता, बल्कि एक निश्चित सीमा के बाद वह गुणात्मक (qualitative) परिवर्तन में परिवर्तित हो जाता है।

उदाहरण के लिए —

  • पूंजीवाद में मजदूर वर्ग (proletariat) और पूंजीपति वर्ग (bourgeoisie) के बीच परिमाणात्मक असमानता लगातार बढ़ती जाती है।
  • जब यह असमानता एक चरम सीमा पर पहुँचती है, तो यह गुणात्मक परिवर्तन यानी क्रांति (revolution) में बदल जाती है।

इसी प्रक्रिया में समाज का विकास सर्पिल रूप (spiral form) में आगे बढ़ता है —
यानी, समाज एक ही बिंदु पर लौटता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में वह एक ऊँचे स्तर पर पहुँच जाता है।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार विकास —

  • न तो रैखिक (linear) है,
  • न ही स्थिर (static),
    बल्कि यह सर्पिल (spiral) और गुणात्मक (qualitative) प्रक्रिया है जो संघर्ष और विरोधाभासों के माध्यम से आगे बढ़ती है।

52. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार वस्तु में कितने तत्व विद्यमान होते हैं?

(a) केवल एक
(b) दो – निरन्तरता और विरोध
(c) तीन – मानसिक, भौतिक, आध्यात्मिक
(d) चार – उत्पादन, वितरण, उपभोग, विनाश

उत्तर: (b) दो – निरन्तरता और विरोध

व्याख्या:

मार्क्सवादी द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) का मूल सिद्धांत यह है कि वास्तविकता स्थिर नहीं है, बल्कि निरंतर परिवर्तनशील और गतिशील है। किसी भी वस्तु या प्रक्रिया का अध्ययन करते समय हमें उसके आंतरिक विरोधाभासों (Contradictions) को समझना आवश्यक है।

  1. द्वैतात्मक तत्व (Two Contradictory Elements):
    • प्रत्येक वस्तु में दो मुख्य तत्व विद्यमान होते हैं:
      1. निरन्तरता (Continuity / Thesis): यह तत्व वस्तु की अस्तित्व की स्थायित्व और सततता बनाए रखता है।
      2. विरोध (Contradiction / Antithesis): यह तत्व उस निरन्तरता के खिलाफ कार्य करता है और परिवर्तन को उत्पन्न करता है।
    • इन दोनों तत्वों का संघर्ष वस्तु में विकास और रूपांतरण (Development and Transformation) का मूल स्रोत है।
  2. उदाहरण (Illustration):
    • प्रकृति में: बीज अपने आप में जीवन को निरंतर बनाए रखता है (Continuity), लेकिन वह अंकुरित होकर पौधा बनता है (Contradiction), जिससे विकास और परिवर्तन होता है।
    • समाज में: पूंजीवादी समाज अपनी व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास करता है (Continuity), लेकिन श्रमिक वर्ग के संघर्ष और विरोध (Contradiction) समाज में परिवर्तन और नया सामाजिक रूप पैदा करता है।
  3. महत्व (Significance):
    • यह सिद्धांत हमें बताता है कि विकास और परिवर्तन बाहरी नहीं, बल्कि वस्तु की आंतरिक संरचना और विरोधाभासों से उत्पन्न होता है।
    • मार्क्स के अनुसार, कोई भी वस्तु या समाज स्थिर नहीं है; प्रत्येक में परिवर्तन का बीज निहित है।
    • यह दृष्टिकोण विज्ञान, समाजशास्त्र और इतिहास में परिवर्तन की वैज्ञानिक समझ प्रदान करता है।

53. मार्क्स के दृष्टिकोण में संघर्ष न होना किसका संकेत है?

(a) समाज में स्थिरता
(b) विकास की कमी
(c) राजनीतिक शक्ति का संतुलन
(d) तकनीकी प्रगति

उत्तर: (b) विकास की कमी

व्याख्या:

मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) के अनुसार, संघर्ष (Struggle / Contradiction) किसी भी समाज या वस्तु के विकास का मूल स्रोत है।

  1. संघर्ष और विकास का संबंध:
    • समाज और वस्तु में परिवर्तन आंतरिक विरोधाभासों (Contradictions) से उत्पन्न होता है।
    • यदि समाज में संघर्ष न हो (यानी द्वन्द्वात्मक गतिविधि नहीं), तो विकास रुक जाता है।
    • संघर्ष के बिना समाज स्थिर नहीं रहता, बल्कि वह संकुचित या पिछड़ा हुआ बन सकता है।
  2. सामाजिक दृष्टि:
    • वर्ग संघर्ष (Class Struggle) समाज को गतिशील बनाता है।
    • जैसे, पूंजीपति और मजदूर वर्ग के बीच संघर्ष ने पूंजीवादी समाज में सुधार और परिवर्तन लाया।
    • यदि संघर्ष नहीं होता, तो समाज पिछड़ा रहता है और सामाजिक सुधार संभव नहीं होता।
  3. सैद्धांतिक आधार:
    • मार्क्स ने कहा: “History is the history of class struggles.”
      (इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है।)
    • अर्थात्, संघर्ष ही इतिहास और समाज के विकास की गति निर्धारित करता है।
  4. व्यावहारिक उदाहरण:
    • औद्योगिक क्रांति में श्रमिक आंदोलन: मजदूरों के संघर्ष ने कानून और श्रमिक अधिकारों में सुधार लाया।
    • राजनीतिक आंदोलन: अधिनायकवादी शासन या अन्याय के खिलाफ संघर्ष ने लोकतंत्र और सामाजिक सुधार को जन्म दिया।

महत्वपूर्ण बिंदु:

  • संघर्ष केवल नकारात्मक नहीं है; यह सृजनात्मक और विकासात्मक भी है।
  • द्वन्द्व और संघर्ष के बिना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास रुक जाता है।

Mohan Exam

54. पूंजीवादी समाज में वास्तविक द्वन्द्व कब देखने को मिलता है?

(a) मालिक और मजदूर के संघर्ष में
(b) केवल सरकार और जनता में
(c) शिक्षा और राजनीति के संघर्ष में
(d) तकनीकी और उत्पादन संबंध में

उत्तर: (a) मालिक और मजदूर के संघर्ष में

व्याख्या:

मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) और वर्ग संघर्ष (Class Struggle) के सिद्धांत के अनुसार, पूंजीवादी समाज में वास्तविक द्वन्द्व (Real Contradiction) मुख्य रूप से मालिक (Capitalists / Bourgeoisie) और मजदूर (Workers / Proletariat) के बीच होता है।

  1. पूंजीवाद और वर्ग भेद:
    • पूंजीवादी समाज में उत्पादन के साधनों (Means of Production) का स्वामित्व कुछ लोगों (मालिक वर्ग) के पास होता है।
    • मजदूर वर्ग अपने श्रम के बदले मजदूरी प्राप्त करता है, लेकिन उत्पादन का लाभ मालिकों को मिलता है।
    • यही स्थिति अंतर्विरोध (Contradiction) उत्पन्न करती है।
  2. संघर्ष का स्वरूप:
    • मजदूर अधिक वेतन, बेहतर कार्य परिस्थितियाँ और सामाजिक अधिकारों की मांग करते हैं।
    • मालिक वर्ग अधिक लाभ और उत्पादन नियंत्रण के लिए संघर्ष करता है।
    • इस विरोधाभास से सामाजिक संघर्ष और बदलाव उत्पन्न होते हैं।
  3. सैद्धांतिक आधार (Marx’s Perspective):
    • मार्क्स ने कहा: “The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.”
      (अब तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है।)
    • यानी, समाज की मुख्य गतिशील शक्ति वर्ग संघर्ष है।
  4. परिणाम:
    • यह संघर्ष केवल आर्थिक या सामाजिक बदलाव नहीं लाता, बल्कि पूंजीवादी संरचना में सुधार या क्रांति का मार्ग भी खोलता है।
    • उदाहरण: श्रमिक आंदोलनों, यूनियन स्ट्राइक और सामाजिक सुधार।
  5. विशेष ध्यान:
    • अन्य संघर्ष (सरकार और जनता, शिक्षा और राजनीति) भी द्वन्द्व उत्पन्न कर सकते हैं, लेकिन वास्तविक और मौलिक द्वन्द्व पूंजीवाद में मालिक और मजदूर के बीच ही होता है।

55. मार्क्स के अनुसार प्रारम्भिक परिमाणात्मक विकास किसमें बदलता है?

(a) स्थिरता
(b) गुणात्मक परिवर्तन
(c) मानसिक विचार
(d) राजनीतिक शक्ति

उत्तर: (b) गुणात्मक परिवर्तन

व्याख्या:

मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) में परिमाणात्मक (Quantitative) परिवर्तन और गुणात्मक (Qualitative) परिवर्तन का नियम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  1. परिमाणात्मक परिवर्तन (Quantitative Change):
    • ये छोटे, लगातार, और संख्या-आधारित बदलाव होते हैं।
    • उदाहरण: उत्पादन में थोड़ी वृद्धि, मजदूरी में बदलाव, जनसंख्या का वृद्धि।
    • ये परिवर्तन धीरे-धीरे जमा होते हैं, लेकिन स्वयं में प्रारंभ में बड़े बदलाव नहीं लाते।
  2. गुणात्मक परिवर्तन (Qualitative Change):
    • जब परिमाणात्मक परिवर्तन एक सीमा तक पहुँच जाते हैं, तो वे गुणात्मक परिवर्तन में बदल जाते हैं।
    • यह परिवर्तन मूलभूत और स्वरूप में नया होता है।
    • उदाहरण: मजदूरों के लगातार संघर्ष और असंतोष से सामाजिक क्रांति उत्पन्न होती है, और नया सामाजिक ढांचा बनता है।
  3. मार्क्स का दृष्टिकोण:
    • प्राकृतिक और सामाजिक प्रक्रियाओं में यही नियम लागू होता है।
    • परिमाणात्मक बदलावों का संचय समय आने पर नए रूप और संरचना का कारण बनता है।
    • यह सिद्धांत हीगेलियन द्वन्द्ववाद से लिया गया, लेकिन मार्क्स ने इसे भौतिकवादी आधार पर स्थापित किया।
  4. उदाहरण (Illustration):
    • परिमाणात्मक: मजदूरी में छोटे-छोटे सुधार, उत्पादन में वृद्धि।
    • गुणात्मक: मजदूर क्रांति और नया समाज।
    • इसी तरह प्राकृतिक दुनिया में पानी का तापमान बढ़ना (परिमाणात्मक) → बर्फ का पिघलना या भाप में बदलना (गुणात्मक)।

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