रॉबर्ट किंग मर्टन (Robert K. Merton)
आधुनिक समाजशास्त्र के बौद्धिक परिदृश्य में रॉबर्ट किंग मर्टन (Robert K. Merton) का स्थान एक युगान्तरकारी विचारक और सैद्धान्तिक पुरोधा के रूप में सुरक्षित है। बीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्र को एक वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और विश्लेषणात्मक दिशा प्रदान करने में मर्टन की भूमिका अद्वितीय रही है। उनका जन्म 4 जुलाई 1910 को फिलाडेल्फिया के एक स्लम क्षेत्र में पूर्वी यूरोप से आए यहूदी अप्रवासी माता-पिता के घर हुआ था । उनका मूल नाम मेयर रॉबर्ट स्कोल्निक (Meyer Robert Schkolnick) था, जिसे बाद में उन्होंने बदल लिया था । अत्यधिक अभावों के बावजूद, एंड्रयू कार्नेगी द्वारा स्थापित सार्वजनिक पुस्तकालय और उनकी अपनी बौद्धिक कुशाग्रता ने उन्हें हार्वर्ड विश्वविद्यालय (Harvard University) तक पहुँचाया, जहाँ उन्होंने समाजशास्त्र के कुछ सबसे महान विचारकों के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण की । मर्टन को अमेरिकन सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन (ASA) का 47वाँ अध्यक्ष चुना गया और 1994 में वे समाजशास्त्र के क्षेत्र में ‘नेशनल मेडल ऑफ साइंस’ (National Medal of Science) प्राप्त करने वाले पहले समाजशास्त्री बने । उनके पुत्र, रॉबर्ट सी. मर्टन ने भी अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर इस परिवार की अकादमिक श्रेष्ठता को सिद्ध किया ।
समाजशास्त्र के सैद्धान्तिक विकास में मर्टन की तुलना अक्सर टैल्कॉट पारसंस (Talcott Parsons) से की जाती है। यदि पारसंस को आधुनिक समाजशास्त्र का जनक या महा-सिद्धान्तों (Grand Theories) का निर्माता माना जाता है, तो उनके समकक्ष और उनकी टक्कर का दूसरा सबसे महान विचारक मर्टन को ही स्वीकार किया जाता है । दोनों ही विचारक अपने-अपने सैद्धान्तिक क्षेत्रों में एक-दूसरे से आगे हैं और आधुनिक समाजशास्त्र का अधिकांश सैद्धान्तिक साहित्य इन दोनों की ही बौद्धिक देन है । हालाँकि मर्टन एक अमेरिकी समाजशास्त्री थे, परन्तु उनका चिन्तन पूरी तरह से यूरोपीय समाजशास्त्रियों—विशेष रूप से कार्ल मार्क्स (Karl Marx), जॉर्ज सिमेल (Georg Simmel), मैक्स वेबर (Max Weber) और एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim)—से गहराई से प्रभावित था । एक विचारक के नाते मर्टन का सम्पूर्ण केन्द्र सामाजिक संरचनाओं, सांस्कृतिक लक्ष्यों और मानवीय व्यवहार के बीच के जटिल अन्तर्सम्बन्धों को समझना था।
कृतित्व (Major Works) और बौद्धिक विकास
मर्टन का अकादमिक लेखन न केवल विस्तृत है, बल्कि समाजशास्त्र की कई उप-शाखाओं का संस्थापक भी माना जाता है। उन्होंने अपने सम्पूर्ण करियर में वैज्ञानिक समाजशास्त्र, अपराधशास्त्र और सामान्य समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों पर विपुल साहित्य का सृजन किया ।
उनकी पहली प्रमुख कृति “साइन्स टेक्नोलोजी एण्ड सोसाइटी इन सेवलटिन्थ सेन्चुरी इंग्लैण्ड” (Science Technology and Society in Seventeenth Century England) थी, जो 1938 में उनके शोध प्रबन्ध के रूप में प्रकाशित हुई । जॉर्ज सार्टन (George Sarton), टैल्कॉट पारसंस और पिटिरिम सोरोकिन (Pitirim Sorokin) के निर्देशन में लिखे गए इस शोध ने ‘विज्ञान के समाजशास्त्र’ (Sociology of Science) नामक एक नई उप-शाखा को जन्म दिया । इस पुस्तक में मर्टन ने मैक्स वेबर के प्रोटेस्टैंट एथिक (Protestant Ethic) के सिद्धान्त का विस्तार करते हुए यह स्थापित किया कि 17वीं और 18वीं शताब्दी के इंग्लैंड में आधुनिक प्रायोगिक विज्ञान के उदय और प्यूरिटनवाद (Puritanism) तथा पाइटिज्म (Pietism) के बीच एक गहरा सकारात्मक सहसम्बन्ध था । प्यूरिटनवाद के मूल्यों ने वैज्ञानिकों को प्रकृति के रहस्यों को उद्घाटित करने के लिए एक धार्मिक औचित्य प्रदान किया, जिसने अनजाने में ही वैज्ञानिक क्रान्ति को जन्म दिया । बाद में चलकर उन्होंने “सोशियोलोजी ऑफ साइन्स” (Sociology of Science) नामक पुस्तक भी प्रकाशित की, जिसने विज्ञान के संस्थागत और मानदण्डनात्मक ढाँचे को पारिभाषित किया ।
शायद मर्टन की सर्वाधिक लोकप्रिय और समाजशास्त्र के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाने वाली पुस्तक “सोशल थ्योरी एण्ड सोशल स्ट्रक्चर” (Social Theory and Social Structure) है, जो 1949 में प्रकाशित हुई थी । इस पुस्तक की ख्याति इसलिए है क्योंकि इसमें मर्टन ने व्यवस्थित रूप से मध्यस्तरीय सिद्धान्तों (Middle Range Theories) की वैचारिकता को प्रस्तुत किया है । इसी ऐतिहासिक ग्रन्थ में उन्होंने संरचना-प्रकार्यवाद (Structure-Functional Analysis) के पेराडिम (Paradigm) को भी प्रस्तुत किया, जहाँ वे प्रकार्यात्मक विकल्पों (Functional Alternatives) और प्रकट तथा प्रच्छन्न प्रकार्यों (Manifest and Latent Functions) की विस्तृत और आलोचनात्मक चर्चा करते हैं । इसी पुस्तक से यह स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि मर्टन के भीतर एक अत्यंत परिपक्व सैद्धान्तिक दृष्टिकोण था, जो केवल दार्शनिक कल्पनाओं पर नहीं, बल्कि अनुभवजन्य तथ्यों पर आधारित था । इसके अतिरिक्त, मर्टन ने पॉल लाज़रफेल्ड (Paul Lazarsfeld) और अन्य विद्वानों के साथ मिलकर कई अन्य पुस्तकें भी सम्पादित कीं और अनुप्रयुक्त सामाजिक अनुसन्धान (Applied Social Research) को बढ़ावा दिया ।
यूरोपीय समाजशास्त्र का प्रभाव: मार्क्स और सिमेल की वैचारिक विरासत
मर्टन को समझने के लिए यह जानना नितान्त आवश्यक है कि वे एक अमेरिकी समाजशास्त्री होते हुए भी यूरोप के समाजशास्त्र से बराबर और गहराई से प्रभावित थे । उनकी दृष्टि में समाजशास्त्र केवल अमूर्त सिद्धान्तों का निर्माण नहीं था, बल्कि यह समझने का एक उपकरण था कि ऐतिहासिक और संरचनात्मक शक्तियों ने आधुनिक मानव को कैसे आकार दिया है। यूरोपीय विचारकों में कार्ल मार्क्स (Karl Marx) और जॉर्ज सिमेल (Georg Simmel) का मर्टन पर विशेष प्रभाव पड़ा ।
कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष और पूँजीवादी संरचनाओं के विश्लेषण ने मर्टन को यह समझने में मदद की कि समाज में सब कुछ सर्वसम्मत और सामंजस्यपूर्ण नहीं होता । पारसंस जहाँ समाज को एक सन्तुलित व्यवस्था मानते थे, वहीं मर्टन ने मार्क्सवादी आलोचना से यह दृष्टि प्राप्त की कि सामाजिक संरचनाएँ स्वयं में विरोधाभासों और असमानताओं को जन्म देती हैं । मर्टन का तनाव का सिद्धान्त (Strain Theory) मूलतः इसी मार्क्सवादी विचार से प्रेरित है कि पूँजीवादी समाज की आर्थिक संरचनाएँ और उसके सांस्कृतिक लक्ष्य समाज के निचले वर्गों के लिए अवसरों को अवरुद्ध कर देते हैं, जिससे अपराध और नियमहीनता उत्पन्न होती है ।
दूसरी ओर, जॉर्ज सिमेल (Georg Simmel) के ‘स्वरूपात्मक समाजशास्त्र’ (Formal Sociology) ने मर्टन के सूक्ष्म-समाजशास्त्रीय (Micro-sociological) दृष्टिकोण को आकार दिया । सिमेल का मानना था कि समाज में संघर्ष और सहयोग, एकीकरण और विभाजन साथ-साथ चलते हैं और ये सामाजिक जीवन के स्वाभाविक स्वरूप हैं । सिमेल से प्रेरित होकर मर्टन ने “समाजशास्त्रीय द्वैधता” (Sociological Ambivalence) का सिद्धान्त विकसित किया, जिसका अर्थ है कि एक ही सामाजिक भूमिका (Role) व्यक्ति से परस्पर विरोधी अपेक्षाएँ रखती है, जिससे व्यक्ति के भीतर तनाव उत्पन्न होता है । इसके अतिरिक्त, मर्टन का प्रसिद्ध विचार—“सप्रयोजन सामाजिक क्रिया के अप्रत्याशित परिणाम” (Unanticipated Consequences of Purposive Social Action)—सिमेल के आधुनिकता और उसके अप्रत्याशित प्रभावों के चिन्तन पर ही आधारित था । मर्टन ने दर्शाया कि कैसे मनुष्य कुछ विशेष लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कार्य करता है, परन्तु सामाजिक संरचनाओं की जटिलता के कारण उसके परिणाम प्रायः उसकी इच्छा के विपरीत निकलते हैं ।
मर्टन के समाजशास्त्र के क्षेत्र में प्रमुख योगदान –
(1) मध्यस्तरीय सिद्धान्त (Middle Range Theories),
(2) संरचना-प्रकार्यात्मक विश्लेषण का पेराडिम (Paradigm of Structure-Functional Analysis),
(3) सामाजिक संरचना और एनोमी अर्थात् नियमहीनता (Social Structure and Anomie),
(4) संदर्भ समूह (Reference group),
(5). विज्ञान का समाजशास्त्र (Sociology of Science) और अप्रत्याशित परिणाम
1. मध्यस्तरीय सिद्धान्त (Middle Range Theories)
बीसवीं सदी के मध्य में अमेरिकी समाजशास्त्र एक वैचारिक चौराहे पर खड़ा था। एक ओर पिटिरिम सोरोकिन और टैल्कॉट पारसंस जैसे विचारक थे जो ‘ग्रैंड थ्योरी‘ (Grand Theories) के निर्माण में लगे थे । पारसंस का उद्देश्य एक ऐसा सार्वभौमिक और अमूर्त सैद्धान्तिक ढाँचा (जैसे कि AGIL मॉडल) तैयार करना था जो हर काल और हर समाज की सभी सामाजिक घटनाओं की व्याख्या कर सके । दूसरी ओर, समाजशास्त्र का एक वर्ग ऐसा था जो केवल छोटे-छोटे अनुभवजन्य तथ्यों को एकत्र करने में लगा था, जिनका कोई व्यापक सैद्धान्तिक आधार नहीं था ।
मर्टन ने इन दोनों अतिवादी दृष्टिकोणों का खण्डन किया। उनका मानना था कि समाजशास्त्र अभी भौतिकी या रसायन विज्ञान जैसी परिपक्व अवस्था में नहीं पहुँचा है कि वह आइंस्टीन (Einstein) के समान कोई एक ‘एकीकृत सिद्धान्त’ (Unified Theory) प्रस्तुत कर सके । बहुत अधिक अमूर्त महा-सिद्धान्त वास्तविकता से इतने दूर होते हैं कि उनका परीक्षण नहीं किया जा सकता, और बहुत छोटे अनुभवजन्य शोधों से समाज के व्यापक स्वरूप को नहीं समझा जा सकता । इसी वैचारिक रिक्ति को भरने के लिए मर्टन ने “मध्यस्तरीय सिद्धान्तों” (Middle Range Theories) की संकल्पना प्रस्तुत की ।
मध्यस्तरीय सिद्धान्तों की प्रकृति और आवश्यकता
मध्यस्तरीय सिद्धान्त वे सिद्धान्त हैं जो उन छोटी और आवश्यक कार्य-परिकल्पनाओं (Working hypotheses) और सभी सामाजिक व्यवहारों की व्याख्या करने वाले सर्वसमावेशी महा-सिद्धान्तों के बीच में स्थित होते हैं । मर्टन के अनुसार, समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों को काल्पनिक उड़ान न होकर अनुभवजन्य तथ्यों पर आधारित होना चाहिए । मध्यस्तरीय सिद्धान्त एक विशिष्ट सामाजिक घटना या परिघटना से आरम्भ होते हैं और उनसे कुछ ऐसे सामान्य निष्कर्ष निकालते हैं जिन्हें आँकड़ों (Data) द्वारा जाँचा और परखा जा सके ।
मर्टन ने समाजशास्त्रियों से आग्रह किया कि वे सामाजिक गतिशीलता (Social mobility), भूमिका-संघर्ष (Role conflict), संदर्भ समूह (Reference groups), और विचलन (Deviance) जैसे सीमित और विशिष्ट विषयों पर सिद्धान्त बनाएँ । इन छोटे-छोटे मध्यस्तरीय सिद्धान्तों को जब आपस में जोड़ा जाएगा, तो भविष्य में समाजशास्त्र स्वतः ही एक व्यापक और प्रामाणिक ग्रैंड थ्योरी विकसित कर लेगा ।
| तुलना का आधार | टैल्कॉट पारसंस (महा-सिद्धान्त / Grand Theory) | रॉबर्ट के. मर्टन (मध्यस्तरीय सिद्धान्त / Middle Range Theory) |
| क्षेत्र और महत्वाकांक्षा | सार्वभौमिक, सर्वसमावेशी और अत्यधिक अमूर्त। समाज की हर गतिविधि को एक ही ढाँचे में समझाने का प्रयास । | विशिष्ट, सीमित और अनुभवजन्य। समाज के किसी एक विशेष पहलू (जैसे अपराध, विज्ञान, गतिशीलता) को समझाने पर केन्द्रित । |
| यथार्थ से सम्बन्ध | अनुभवजन्य वास्तविकता से दूर, परीक्षण करना अत्यन्त कठिन । | यथार्थ के अत्यंत निकट, आँकड़ों और अनुसन्धान के माध्यम से परीक्षण करना सरल । |
| सामाजिक परिवर्तन के प्रति दृष्टिकोण | संतुलन और सामाजिक व्यवस्था (Equilibrium) पर अधिक बल, रूढ़िवादी स्वरूप । | संघर्ष, परिवर्तन, नियमहीनता और दुष्प्रकार्यों को समझने में लचीला और अधिक प्रासंगिक । |
| अनुसन्धान में उपयोगिता | दार्शनिक बहसों के लिए उत्कृष्ट, परन्तु व्यावहारिक शोध कार्यक्रमों में अनुवाद करना कठिन । | समकालीन समाजशास्त्रीय शोध, नीति-निर्माण और व्यावहारिक अनुप्रयोगों के लिए एक सशक्त उपकरण । |
मर्टन के इस क्रान्तिकारी दृष्टिकोण ने समाजशास्त्र को दार्शनिक अटकलों से बाहर निकालकर एक प्रामाणिक विज्ञान का रूप दिया। आज विश्लेषणात्मक समाजशास्त्र (Analytical Sociology) में जो भी कार्य हो रहा है, वह मर्टन के इसी मध्यस्तरीय सिद्धान्त के दर्शन पर आधारित है ।
2. संरचना-प्रकार्यात्मक विश्लेषण का पेराडिम (Paradigm of Structure-Functional Analysis)
मर्टन ने प्रकार्यात्मक संदर्श (Functional Perspective) को विकसित और परिमार्जित कर उसे एक नई ऊँचाई प्रदान की । दूसरे विश्व युद्ध के बाद के युग में समाजशास्त्रियों, विशेषकर प्रकार्यवादियों ने सामाजिक साम्यानुकूलन (Social Adaptation) और सामाजिक एकीकरण (Social Integration) की तलाश की । इस युग में समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों का बहुत बड़ा अभिस्थापन (Orientation) प्रकार्यवाद की ओर था, और इस बौद्धिक तलाश का नेतृत्व करने वालों में मर्टन अग्रणी थे ।
तथापि, मर्टन पहले प्रकार्यवादी थे जिन्होंने यह साहसपूर्वक कहा कि समाज में सब कुछ सर्वसम्मत रूप से नहीं होता । ए. आर. रैडक्लिफ-ब्राउन (A. R. Radcliffe-Brown), ब्रॉनिस्लॉ मैलिनोव्स्की (Bronisław Malinowski) और टैल्कॉट पारसंस जैसे पारम्परिक प्रकार्यवादी यह मानते थे कि समाज की हर संस्था, प्रथा या परम्परा समाज के लिए कुछ न कुछ सकारात्मक कार्य (Function) करती है । इस विचार ने प्रकार्यवाद को एक अत्यन्त रूढ़िवादी और यथास्थितिवादी (Status-quoist) सिद्धान्त बना दिया था, क्योंकि इसके अनुसार समाज में मौजूद हर कुप्रथा भी ‘उपयोगी’ मान ली जाती थी ।
मर्टन ने प्रकार्यात्मक विश्लेषण को इस रूढ़िवाद से मुक्त करने के लिए पारम्परिक प्रकार्यवाद की तीन प्रमुख मान्यताओं (Postulates) का कड़ा खण्डन किया :
i. प्रकार्यात्मक एकता की मान्यता का खण्डन (Critique of the Postulate of Functional Unity)
पारम्परिक विचार यह था कि समाज के सभी अंग आपस में पूरी तरह से गुँथे हुए हैं और प्रत्येक अंग सम्पूर्ण समाज के लिए कार्य करता है । मर्टन ने तर्क दिया कि यह छोटे, आदिम समाजों के लिए तो सत्य हो सकता है, परन्तु आधुनिक और जटिल समाजों में सब कुछ एकरूप नहीं होता । एक आधुनिक समाज में विभिन्न समूहों के अपने-अपने मूल्य होते हैं। जो संस्था या प्रथा एक समूह के लिए प्रकार्यात्मक (लाभदायक) है, वही प्रथा दूसरे समूह के लिए दुष्प्रकार्यात्मक (हानिकारक) हो सकती है ।
ii. सार्वभौमिक प्रकार्यवाद की मान्यता का खण्डन (Critique of Universal Functionalism)
पारसंस और अन्य विद्वान मानते थे कि यदि कोई संस्था अस्तित्व में है, तो अवश्य ही वह समाज के लिए सकारात्मक कार्य कर रही होगी । इसके विपरीत मर्टन ने ‘दुष्प्रकार्य’ (Dysfunction) की अवधारणा प्रस्तुत की । मर्टन के अनुसार, सामाजिक ढाँचे के कुछ तत्व समाज के सन्तुलन को बिगाड़ने का कार्य भी करते हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका में अश्वेतों और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव (Discrimination) समाज के विकास के लिए पूर्णतः दुष्प्रकार्यात्मक है, परन्तु यह व्यवस्था इसलिए बनी हुई है क्योंकि यह समाज के एक छोटे और शक्तिशाली समूह (जैसे श्वेत पुरुषों) के लिए प्रकार्यात्मक और लाभदायक है । इसी प्रकार दास प्रथा (Slavery) आर्थिक उत्पादन के लिए प्रकार्यात्मक रही होगी, परन्तु मानवीय और व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण से यह एक भयंकर दुष्प्रकार्य थी । मर्टन ने इस दृष्टि से प्रकार्यवाद को देखने का आग्रह किया, जो सामाजिक तनाव और परिवर्तन की व्याख्या कर सके ।
iii. अपरिहार्यता की मान्यता का खण्डन और प्रकार्यात्मक विकल्प (Critique of Indispensability and Functional Alternatives)
पारसंस मानते थे कि धर्म, परिवार या राज्य जैसी कुछ संस्थाएँ समाज के अस्तित्व के लिए अपरिहार्य (Indispensable) हैं और उनके बिना समाज नष्ट हो जाएगा । मर्टन ने इस मान्यता को चुनौती दी और “प्रकार्यात्मक विकल्पों” (Functional Equivalents / Alternatives) की अवधारणा प्रस्तुत की । मर्टन का तर्क था कि एक ही प्रकार्य को कई भिन्न-भिन्न संस्थाओं द्वारा पूरा किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि पारसंस कहते हैं कि बच्चों का समाजीकरण केवल एकल परिवार (Nuclear Family) द्वारा ही सम्भव है, तो मर्टन कहते हैं कि एकल माता-पिता (Single parents), सम्बन्धी, या डे-केयर (Day-care) भी यह कार्य उतनी ही कुशलता से कर सकते हैं । इसी प्रकार, समाज में जो मानसिक और सामाजिक सन्तुलन पारम्परिक रूप से ‘धर्म’ (Religion) प्रदान करता है, वही प्रकार्य आधुनिक युग में एक राजनीतिक विचारधारा जैसे कि ‘साम्यवाद’ (Communism) भी प्रदान कर सकती है । इस अवधारणा ने समाजशास्त्र को यह दृष्टि दी कि कोई भी एक संस्था समाज के लिए अनिवार्य नहीं है, उसके विकल्प मौजूद हैं।
प्रकट और प्रच्छन्न प्रकार्य (Manifest and Latent Functions)
मर्टन ने सामाजिक क्रियाओं के परिणामों का गहराई से विश्लेषण करने के लिए ‘प्रकट’ (Manifest) और ‘प्रच्छन्न’ (Latent) प्रकार्यों का वर्गीकरण किया ।
- प्रकट प्रकार्य (Manifest Functions): ये वे परिणाम हैं जो कर्ता द्वारा पूर्व-निर्धारित, इच्छित और अपेक्षित होते हैं । ये किसी भी संस्था के अस्तित्व के घोषित उद्देश्य होते हैं। जैसे, उच्च शिक्षा का प्रकट प्रकार्य ज्ञान अर्जन करना और कॅरियर के लिए तैयारी करना है ।
- प्रच्छन्न प्रकार्य (Latent Functions): ये वे परिणाम हैं जो अप्रत्याशित, अघोषित और कर्ता की इच्छा के बिना ही उत्पन्न हो जाते हैं । कर्ता प्रायः इनके प्रति जागरूक नहीं होता, परन्तु समाज के सन्तुलन में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। उच्च शिक्षा का प्रच्छन्न प्रकार्य युवाओं को विवाह के लिए साथी ढूँढने का अवसर देना या युवा आबादी को कुछ समय के लिए बेरोजगारी की कतार से बाहर रखना हो सकता है ।
मर्टन ने इसे समझाने के लिए ‘होपी’ (Hopi) आदिवासियों के ‘रेन-डांस’ (Rain-dance) का एक अत्यंत प्रसिद्ध उदाहरण दिया । जब अकाल पड़ता है, तो होपी आदिवासी वर्षा कराने के लिए जादू-टोना और नृत्य करते हैं। उनका उद्देश्य (प्रकट प्रकार्य) वर्षा कराना होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह नृत्य वर्षा नहीं करा सकता, अतः यह अपने प्रकट प्रकार्य में विफल है। परन्तु मर्टन समझाते हैं कि इस नृत्य का एक प्रच्छन्न प्रकार्य है—अकाल और विपत्ति के समय डरे हुए और बिखरे हुए समाज को एक साथ लाना, उनमें सामाजिक एकजुटता (Solidarity) और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा की भावना भरना । इस प्रच्छन्न प्रकार्य के कारण ही यह अनुष्ठान आज तक जीवित है। मर्टन की यह दृष्टि दर्शाती है कि समाजशास्त्री का वास्तविक कार्य उन प्रच्छन्न परिणामों को खोजना है जो सामान्य आँखों से दिखाई नहीं देते ।
3. सामाजिक संरचना और एनोमी अर्थात् नियमहीनता (Social Structure and Anomie)
आदमी विवेकी है और वह अपने लक्ष्यों को ध्यान में रखकर काम करता है। परन्तु समाज में सांस्कृतिक प्रतिरोध (Cultural Resistance) होता है, और इन सभी अव्यवस्थाओं का मुख्य स्रोत व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक कमियाँ नहीं, अपितु समाज की ‘सामाजिक संरचना’ (Social Structure) होती है । मर्टन की 1938 में प्रकाशित अवधारणा “सामाजिक संरचना और एनोमी” ने अपराधशास्त्र (Criminology) और समाजशास्त्र में एक क्रान्ति ला दी ।
एमिल दुर्खीम ने एनोमी (Anomie) का अर्थ ‘मानकों का अभाव’ या ‘नियमहीनता’ बताया था जो समाज में अचानक आए परिवर्तन (जैसे आर्थिक मंदी) के कारण उत्पन्न होती है । परन्तु मर्टन ने इस अवधारणा को अमेरिकी समाज के पूँजीवादी ढाँचे के सन्दर्भ में पुनर्व्याख्यायित किया। मर्टन के अनुसार, अपराध या विचलन (Deviance) किसी व्यक्ति की जैविक या मानसिक बीमारी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक असन्तुलित सामाजिक संरचना की स्वाभाविक और तार्किक प्रतिक्रिया है ।
सांस्कृतिक लक्ष्य और संस्थागत साधन
मर्टन ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक समाज के दो प्रमुख अंग होते हैं:
- सांस्कृतिक लक्ष्य (Cultural Goals): ये वे लक्ष्य हैं जिन्हें समाज मूल्यवान मानता है और समाज के हर व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह इन्हें प्राप्त करे (जैसे अमेरिका में ‘अमेरिकन ड्रीम’ – अपार धन, समृद्धि और उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त करना) ।
- संस्थागत साधन (Institutionalized Means): ये वे वैधानिक, नैतिक और समाज द्वारा स्वीकृत तरीके हैं जिनसे इन लक्ष्यों को प्राप्त किया जाना चाहिए (जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त करना, कठिन परिश्रम करना, ईमानदारी से व्यापार करना) ।
जब समाज लोगों पर सफल होने (धन कमाने) का भारी सांस्कृतिक दबाव डालता है, परन्तु सामाजिक संरचना सभी वर्गों को उन लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए समान और उचित साधन (जैसे अच्छी शिक्षा या रोजगार) उपलब्ध नहीं कराती, तो एक गहरे तनाव (Strain) और नियमहीनता (Anomie) की स्थिति उत्पन्न होती है । एक गरीब पृष्ठभूमि से आने वाला व्यक्ति विवेकी है, वह भी धन कमाना चाहता है, परन्तु सांस्कृतिक प्रतिरोध और संरचनात्मक असमानता उसे वैध साधनों का उपयोग करने से रोकते हैं । इसी अंतराल (Gap) के कारण समाज में अपराध जन्म लेता है।
अनुकूलन के पाँच स्वरूप (Five Modes of Adaptation)
मर्टन ने बताया कि जब व्यक्ति सांस्कृतिक लक्ष्यों और उपलब्ध साधनों के बीच इस तनाव का सामना करता है, तो वह समाज में स्वयं को समायोजित करने के लिए पाँच में से किसी एक तरीके को अपनाता है :
| अनुकूलन का स्वरूप (Mode of Adaptation) | सांस्कृतिक लक्ष्य (Cultural Goals) | संस्थागत साधन (Institutional Means) | समाजशास्त्रीय व्याख्या और उदाहरण |
| 1. अनुरूपता (Conformity) | स्वीकार (+) | स्वीकार (+) | यह एक स्थिर समाज का सबसे सामान्य स्वरूप है। व्यक्ति समाज के लक्ष्यों को भी मानता है और उन्हें प्राप्त करने के लिए केवल वैध साधनों (शिक्षा, नौकरी) का ही प्रयोग करता है, भले ही उसे सफलता मिले या न मिले । |
| 2. नवाचार (Innovation) | स्वीकार (+) | अस्वीकार (-) | व्यक्ति लक्ष्य (धन) तो प्राप्त करना चाहता है, परन्तु वैध साधन उपलब्ध न होने के कारण वह अवैध या आपराधिक साधनों (चोरी, भ्रष्टाचार, ड्रग्स की तस्करी) का प्रयोग करता है। अधिकांश आर्थिक अपराध इसी श्रेणी में आते हैं । |
| 3. कर्मकाण्डवाद / रीतिवाद (Ritualism) | अस्वीकार (-) | स्वीकार (+) | व्यक्ति लक्ष्य (उच्च महत्वाकांक्षा) को त्याग देता है क्योंकि उसे लगता है कि वह कभी सफल नहीं हो पाएगा, परन्तु वह यंत्रवत रूप से नियमों और साधनों का पालन करता रहता है। उदाहरण: एक क्लर्क जो बिना किसी पदोन्नति की इच्छा के बस रोज नियम से अपना काम करता है । |
| 4. प्रत्यावर्तन / पलायनवाद (Retreatism) | अस्वीकार (-) | अस्वीकार (-) | व्यक्ति समाज के लक्ष्यों और साधनों, दोनों को पूर्णतः नकार देता है और समाज से कटकर अलग-थलग हो जाता है। उदाहरण: नशेड़ी, शराबी, भिखारी, या वैरागी जो समाज की सफलता की दौड़ से पूरी तरह बाहर हो चुके हैं । |
| 5. विद्रोह (Rebellion) | नवीन स्थापन (+/-) | नवीन स्थापन (+/-) | ये वे लोग हैं जो वर्तमान व्यवस्था (लक्ष्यों और साधनों) को पूरी तरह नष्ट करके एक नई सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं। उदाहरण: क्रान्तिकारी नेता, उग्रवादी संगठन या नई विचारधारा लाने वाले आन्दोलनकारी । |
मर्टन के इस तनाव के सिद्धान्त (Strain Theory) ने यह सिद्ध कर दिया कि निम्न वर्ग में अपराध की दर इसलिए अधिक नहीं होती कि वे लोग जन्मजात अपराधी होते हैं, बल्कि इसलिए होती है क्योंकि सामाजिक संरचना उन्हें सफलता के वैध साधनों से सबसे अधिक वंचिंत रखती है । यह सिद्धान्त आज भी आधुनिक समाजशास्त्र में श्वेत-वस्त्रधारी अपराधों (White-collar crimes) और सामाजिक असमानता के अध्ययन के लिए एक प्रामाणिक आधार है ।
4. संदर्भ समूह (Reference Group) और सापेक्ष वंचना (Relative Deprivation)
व्यक्ति समाज में अपने मूल्य, अपनी स्थिति और अपने व्यवहार का मूल्यांकन कैसे करता है? मर्टन ने इस सूक्ष्म-समाजशास्त्रीय प्रक्रिया को समझाने के लिए “संदर्भ समूह” (Reference Group) और “सापेक्ष वंचना” (Relative Deprivation) के सिद्धान्त का विस्तृत प्रतिपादन किया । यद्यपि संदर्भ समूह शब्द का प्रयोग सबसे पहले हर्बर्ट हाइमैन (Herbert Hyman) ने किया था, परन्तु मर्टन ने इसे एक व्यवस्थित समाजशास्त्रीय सिद्धान्त में परिवर्तित किया ।
संदर्भ समूह वह समूह है जिसके मानकों, मूल्यों और जीवन-शैली को कोई व्यक्ति अपने व्यवहार को ढालने और अपनी स्थिति के मूल्यांकन के लिए एक आधार या सन्दर्भ के रूप में प्रयोग करता है । कोलंबिया विश्वविद्यालय में मेडिकल छात्रों के समाजीकरण के अध्ययन के दौरान मर्टन ने ही सबसे पहले “रोल मॉडल” (Role Model) शब्द का प्रयोग किया था, जो आज आम बोलचाल का हिस्सा बन चुका है ।
सापेक्ष वंचना (Relative Deprivation)
मर्टन ने सैम्युअल स्टॉफर (Samuel Stouffer) द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों पर किए गए प्रसिद्ध अध्ययन “द अमेरिकन सोल्जर” (The American Soldier) के आँकड़ों का उपयोग करते हुए सापेक्ष वंचना के सिद्धान्त को स्पष्ट किया । सापेक्ष वंचना का अर्थ है कि कोई व्यक्ति स्वयं को कितना गरीब, दुखी या वंचित महसूस करता है, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसके पास वास्तव में कितनी कम वस्तुएँ (निरपेक्ष वंचना / Absolute Deprivation) हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपनी तुलना किस समूह से कर रहा है ।
स्टॉफर के अध्ययन में एक अत्यंत चौंकाने वाला तथ्य सामने आया था। ‘मिलिट्री पुलिस’ (Military Police) के जवानों की पदोन्नति (Promotion) की दर बहुत धीमी थी, फिर भी वे अपनी नौकरी से सन्तुष्ट थे। दूसरी ओर, ‘एयर कॉर्प्स’ (Air Corps) के जवानों की पदोन्नति बहुत तेज़ी से होती थी, परन्तु फिर भी वे अपनी व्यवस्था से अत्यधिक असन्तुष्ट और निराश थे । सामान्य बुद्धि (Common sense) यह कहती है कि जिन्हें पदोन्नति मिल रही है, उन्हें खुश होना चाहिए। मर्टन ने इसे संदर्भ समूह के आधार पर समझाया। एयर कॉर्प्स का जवान अपनी तुलना अपने उन साथियों से कर रहा था जो उससे भी अधिक तेज़ी से पदोन्नत हो रहे थे, इसलिए वह स्वयं को ‘सापेक्ष रूप से वंचित’ (Relatively Deprived) महसूस कर रहा था। वहीं मिलिट्री पुलिस का जवान अपनी तुलना अपने साथियों से कर रहा था जो उसकी ही तरह पदोन्नत नहीं हो रहे थे, इसलिए उसे कोई वंचना महसूस नहीं हुई ।
इसी प्रकार, एक प्राकृतिक आपदा में जिस परिवार का थोड़ा सा नुकसान हुआ है, वह भी अत्यधिक दुखी हो सकता है यदि वह अपनी तुलना उन पड़ोसियों से करे जिनका कोई नुकसान नहीं हुआ है। परन्तु यदि वह अपनी तुलना उन लोगों से करे जिनका सब कुछ तबाह हो गया है, तो भारी नुकसान सहने के बाद भी वह स्वयं को भाग्यशाली मानेगा ।
आधुनिक परिदृश्य में संदर्भ समूह और सापेक्ष वंचना का महत्व
आज के उपभोक्तावादी और डिजिटल समाज में मर्टन का यह सिद्धान्त अत्यधिक प्रासंगिक है। विपणन (Marketing) और ई-कॉमर्स कम्पनियाँ इसका भरपूर उपयोग करती हैं। लोग अपनी आवश्यकता के अनुसार वस्तुएँ नहीं खरीदते, बल्कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स (Social Media Influencers) या अपने आदर्श संदर्भ समूहों की जीवनशैली को देखकर खरीदारी करते हैं, ताकि वे भी उस समूह का हिस्सा दिख सकें ।
राजनीतिक समाजशास्त्र और सामाजिक आन्दोलनों (Social Movements) के अध्ययन में भी ‘सापेक्ष वंचना’ एक शक्तिशाली उपकरण है । क्रान्तियाँ या आन्दोलन केवल घोर गरीबी के कारण नहीं होते। जब कोई समाज प्रगति करता है और लोगों की अपेक्षाएँ बढ़ती हैं, परन्तु अचानक अर्थव्यवस्था रुक जाती है, तो लोगों को लगता है कि उन्हें वह नहीं मिल रहा जिसके वे हकदार हैं (सापेक्ष वंचना), और यही स्थिति बड़े सामाजिक आन्दोलनों और क्रांतियों को जन्म देती है ।
5. विज्ञान का समाजशास्त्र (Sociology of Science) और अप्रत्याशित परिणाम
मर्टन ने न केवल सामाजिक संरचना का विश्लेषण किया, बल्कि विज्ञान को भी एक सामाजिक संस्था के रूप में देखा। 1942 के आस-पास, जब नाजी जर्मनी और स्टालिनवादी रूस में विज्ञान को राजनीतिक विचारधाराओं के अधीन कर दिया गया था, तब मर्टन ने ‘विज्ञान के आचार-विचार’ (Ethos of Science) का प्रतिपादन किया । उन्होंने विज्ञान की स्वायत्तता को बचाने के लिए चार मानदण्ड (Norms) प्रस्तुत किए, जिन्हें संक्षेप में CUDOS कहा जाता है :
| वैज्ञानिक मानदण्ड (Mertonian Norms – CUDOS) | समाजशास्त्रीय अभिप्राय (Sociological Implication) |
| साम्यवाद / सामूहिकता (Communism / Communality) | वैज्ञानिक ज्ञान किसी की निजी सम्पत्ति नहीं है। इसे पूरे वैज्ञानिक समुदाय के साथ साझा किया जाना चाहिए ताकि सामूहिक प्रगति हो सके । यह गोपनीयता (Secrecy) के विरुद्ध है। |
| सार्वभौमिकता (Universalism) | किसी भी वैज्ञानिक सत्य का मूल्यांकन पूर्व-निर्धारित वस्तुनिष्ठ आधारों पर होना चाहिए, न कि वैज्ञानिक की जाति, धर्म, राष्ट्रीयता या राजनीतिक स्थिति के आधार पर । |
| निःस्वार्थता (Disinterestedness) | वैज्ञानिकों को व्यक्तिगत लाभ या धन के लिए नहीं, बल्कि विज्ञान की प्रगति और सत्य की खोज के लिए कार्य करना चाहिए । |
| संगठित संशयवाद (Organized Skepticism) | जब तक पर्याप्त साक्ष्य न मिल जाएँ, किसी भी सिद्धान्त या दावे को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक संस्थाओं को हर दावे की कठोर आलोचनात्मक जाँच करनी चाहिए । |
मर्टन ने दर्शाया कि जब समाज में राजनीतिक निष्ठा (जैसे नस्लवाद या राष्ट्रवाद) वैज्ञानिक सार्वभौमिकता पर हावी हो जाती है, तो विज्ञान का ढाँचा चरमरा जाता है ।
स्व-साधक भविष्यवाणी (Self-fulfilling Prophecy)
जॉर्ज सिमेल के विचारों का विस्तार करते हुए मर्टन ने “स्व-साधक भविष्यवाणी” (Self-fulfilling prophecy) की अत्यंत प्रसिद्ध अवधारणा गढ़ी । मर्टन के अनुसार, यदि लोग किसी झूठी स्थिति को सच मानकर व्यवहार करने लगें, तो उनके व्यवहार के परिणामस्वरूप वह झूठी स्थिति वास्तव में सच हो जाती है । उदाहरण के लिए, यदि किसी स्वस्थ बैंक के बारे में यह झूठी अफवाह फैल जाए कि वह दिवालिया होने वाला है, तो लोग घबराकर अपना सारा पैसा निकालने लगेंगे। इस अचानक निकासी (Bank run) के कारण वह बैंक वास्तव में दिवालिया हो जाएगा। इस अवधारणा ने समाजशास्त्र को यह सिद्ध कर दिखाया कि मानवीय धारणाएँ और विश्वास किस प्रकार वस्तुनिष्ठ सामाजिक वास्तविकता (Objective Social Reality) का निर्माण करते हैं।
निष्कर्ष
रॉबर्ट किंग मर्टन आधुनिक समाजशास्त्र के उन प्रमुख विचारकों में से हैं जिन्होंने समाजशास्त्र को अमूर्त दार्शनिक विमर्श से निकालकर अनुभवजन्य और शोध-आधारित विज्ञान के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जहाँ टैल्कॉट पारसंस ने व्यापक और अमूर्त ग्रैंड थ्योरी के माध्यम से समाजशास्त्र को दार्शनिक स्वरूप प्रदान किया, वहीं मर्टन ने मध्य-स्तरीय सिद्धान्त (Middle Range Theory) के माध्यम से समाजशास्त्र को वास्तविक सामाजिक तथ्यों, अनुसंधान और आँकड़ों से जोड़ने का प्रयास किया।
मर्टन ने यूरोपीय विचारकों, विशेषकर कार्ल मार्क्स और जॉर्ज सिमेल से प्राप्त अंतर्दृष्टियों का उपयोग करते हुए प्रकार्यवाद को उसके रूढ़िवादी स्वरूप से मुक्त किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि समाज पूर्णतः सर्वसम्मत नहीं होता, बल्कि सामाजिक संरचना में विरोधाभास और संघर्ष भी विद्यमान रहते हैं। उनके अनुसार जो सामाजिक व्यवस्था एक वर्ग के लिए लाभदायक (प्रकार्य) होती है, वही दूसरे वर्ग के लिए हानिकारक (दुष्प्रकार्य) भी सिद्ध हो सकती है।
अपने एनोमी और तनाव सिद्धान्त के माध्यम से मर्टन ने यह बताया कि जब समाज के सांस्कृतिक लक्ष्य और उन्हें प्राप्त करने के वैध साधनों के बीच असंतुलन उत्पन्न हो जाता है, तो व्यक्तियों में नियमहीनता और विचलन की प्रवृत्ति विकसित होती है। इसके अतिरिक्त प्रकट एवं प्रच्छन्न प्रकार्य, प्रकार्यात्मक विकल्प, संदर्भ समूह, सापेक्ष वंचना तथा स्व-साधक भविष्यवाणी जैसी अवधारणाएँ आज समाजशास्त्र की आधारभूत शब्दावली का हिस्सा बन चुकी हैं।
इस प्रकार मर्टन की समाजशास्त्र को दी गई तार्किक, विश्लेषणात्मक और अनुभवजन्य देन इतनी व्यापक है कि आधुनिक समाजशास्त्रीय साहित्य में उनके योगदान के बिना किसी भी सिद्धान्तात्मक चर्चा को पूर्ण नहीं माना जा सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात समाजशास्त्र को जो वैज्ञानिक और कार्यात्मक आधार मिला, उसके निर्माण में मर्टन का योगदान निःसंदेह अत्यंत महत्वपूर्ण और मौलिक रहा है।
| सिद्धांत या अवधारणा का नाम | प्रमुख कृति (पुस्तक) | मुख्य विशेषताएं और व्याख्या | प्रमुख उदाहरण | प्रभावित करने वाले विचारक |
|---|---|---|---|---|
| मध्यस्तरीय सिद्धांत (Middle Range Theories) | Social Theory and Social Structure (1949) | यह सिद्धांत अत्यधिक अमूर्त ‘महा-सिद्धान्तों’ (Grand Theories) और संकुचित अनुभवजन्य तथ्यों के बीच की वैचारिक रिक्ति को भरता है। यह विशिष्ट सामाजिक घटनाओं पर केंद्रित है जिन्हें आंकड़ों द्वारा जांचा जा सकता है। पारसंस के सर्वव्यापी और सार्वभौमिक ढांचे के विपरीत, मर्टन इसे अधिक यथार्थवादी और अनुभवजन्य परीक्षण के योग्य मानते हैं। | भूमिका-संघर्ष, सामाजिक गतिशीलता और विचलन का अध्ययन। | टैल्कॉट पारसंस (तुलना हेतु) और यूरोपीय समाजशास्त्री। |
| संदर्भ समूह और सापेक्ष वंचना (Reference Group & Relative Deprivation) | Social Theory and Social Structure | संदर्भ समूह वह समूह है जिससे व्यक्ति अपनी तुलना करता है और अपनी उपलब्धियों का मूल्यांकन करता है। सापेक्ष वंचना तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति अपने संदर्भ समूह की तुलना में स्वयं को वंचित महसूस करता है, भले ही उसकी स्थिति वस्तुनिष्ठ रूप से अच्छी हो। यह ‘रोल मॉडल’ की अवधारणा को भी आधार प्रदान करता है। | अमेरिकी सैनिकों (एयर कॉर्प्स बनाम मिलिट्री पुलिस) का अध्ययन: पदोन्नति की दर अधिक होने पर भी एयर कॉर्प्स में सापेक्ष वंचना के कारण असंतोष अधिक था। | हर्बर्ट हाइमैन, सैम्युअल स्टॉफर। |
| प्रकट और प्रच्छन्न प्रकार्य (Manifest and Latent Functions) | Social Theory and Social Structure (1949) | प्रकट प्रकार्य वे परिणाम हैं जो इच्छित, अपेक्षित और घोषित होते हैं। प्रच्छन्न प्रकार्य वे अप्रत्याशित और अघोषित परिणाम हैं जिनके प्रति कर्ता जागरूक नहीं होता। मर्टन ने दुष्प्रकार्यों (Dysfunctions – जो व्यवस्था को कमजोर करते हैं) और प्रकार्यात्मक विकल्पों (Functional Alternatives – एक ही कार्य के लिए वैकल्पिक साधन) के माध्यम से पारसंस के संतुलन मॉडल की आलोचना की। | होपी आदिवासियों का वर्षा नृत्य: प्रकट उद्देश्य वर्षा कराना है, जबकि प्रच्छन्न उद्देश्य समूह की एकजुटता और सामाजिक सुदृढ़ीकरण बढ़ाना है। | ए. आर. रैडक्लिफ-ब्राउन, ब्रॉनिस्लॉ मैलिनोव्स्की। |
| तनाव का सिद्धांत (Strain Theory/Anomie) | Social Structure and Anomie (1938) | यह सिद्धांत तब उत्पन्न होता है जब सांस्कृतिक लक्ष्यों (जैसे धन) और उन्हें प्राप्त करने के स्वीकृत संस्थागत साधनों के बीच असंतुलन होता है। मर्टन इसके पांच अनुकूलन स्वरूप बताते हैं: अनुरूपता, नवाचार, कर्मकाण्डवाद, प्रत्यावर्तन और विद्रोह। यह अपराध को व्यक्तिगत दोष के बजाय सामाजिक संरचना की उपज मानता है। | धन कमाने के सांस्कृतिक लक्ष्य को पाने के लिए अवैध साधनों जैसे चोरी या भ्रष्टाचार का सहारा लेना (नवाचार)। | एमिल दुर्खीम, कार्ल मार्क्स। |
| विज्ञान का समाजशास्त्र (CUDOS Norms) | The Sociology of Science / Science Technology and Society in 17th Century England | मर्टन ने विज्ञान के आचार-विचार हेतु CUDOS मानदंडों का प्रतिपादन किया: सामूहिकता (Communism), सार्वभौमिकता (Universalism), निःस्वार्थता (Disinterestedness), और संगठित संशयवाद (Organized Skepticism)। यह विज्ञान की स्वायत्तता और सामाजिक नैतिकता पर बल देता है। | 17वीं शताब्दी के इंग्लैंड में प्यूरिटनवाद और वैज्ञानिक क्रांति के बीच का संबंध। | मैक्स वेबर, जॉर्ज सार्टन। |
| स्व-साधक भविष्यवाणी (Self-fulfilling Prophecy) | Social Theory and Social Structure | यह एक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पहलू है जहाँ एक गलत धारणा या झूठी स्थिति को सच मानकर व्यवहार करने से वह व्यवहार उस स्थिति को अंततः वास्तविकता में बदल देता है। यह दर्शाता है कि मानवीय परिभाषाएं सामाजिक यथार्थ का निर्माण कैसे करती हैं। | किसी स्वस्थ बैंक के दिवालिया होने की अफवाह फैलने पर लोगों द्वारा सामूहिक रूप से पैसा निकालना, जिससे बैंक वास्तव में दिवालिया हो जाता है। | जॉर्ज सिमेल। |
