मार्क्स का समाजशास्त्र: वर्ग, उत्पादन और सामाजिक संरचना — MCQs

1. मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद के उदय का मुख्य आधार क्या है?

(a) उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बन्धों में परिवर्तन
(b) सामाजिक परम्पराओं में बदलाव
(c) राज्य की राजनीतिक शक्ति
(d) प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण

उत्तर: (a) उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बन्धों में परिवर्तन

व्याख्या:

मार्क्स के अनुसार इतिहास का आधार ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) है। इसका तात्पर्य है कि समाज का रूप—जैसे सामंतवाद, दासप्रथा, पूंजीवाद—किसी भी समय उत्पादन शक्तियों (Forces of Production) तथा उत्पादन सम्बन्धों (Relations of Production) के परस्पर सम्बन्ध पर निर्भर करता है।

1. उत्पादन शक्तियों में परिवर्तन

  • मशीनों का विकास
  • भाप इंजन और औद्योगिक तकनीक
  • श्रम की उत्पादक क्षमता में बहुत बड़ा बदलाव

इन तकनीकी परिवर्तनों ने पुरानी सामंती व्यवस्था को अप्रभावी बना दिया।

2. उत्पादन सम्बन्धों में परिवर्तन

  • सामंती स्वामित्व का क्षय
  • निजी पूँजी-आधारित स्वामित्व का उदय
  • मजदूर वर्ग (Proletariat) और पूँजीपति वर्ग (Bourgeoisie) का गठन

जब उत्पादन शक्तियाँ विकसित होती हैं, तो पुराने उत्पादन सम्बन्ध उनकी वृद्धि में बाधा बन जाते हैं।
मार्क्स इसे सामाजिक क्रांति (Social Revolution) की भौतिक नींव मानते हैं।

3. परिणाम: पूंजीवाद का उदय

इन परिवर्तनों से—

  • फैक्ट्री प्रणाली विकसित हुई
  • श्रम-विभाजन गहरा हुआ
  • मजदूर वर्ग का शोषण (exploitation) बढ़ा
  • पूंजी संचय (accumulation of capital) बढ़ा

इसी प्रक्रिया से पूंजीवाद स्थापित हुआ।

मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद किसी नैतिक, राजनीतिक या सांस्कृतिक कारण से नहीं, बल्कि उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बन्धों के द्वंद्व (contradiction) से उत्पन्न हुआ।

2. पूंजीवाद में उत्पादन शक्तियों के विकास का मुख्य साधन कौन सा है?

(a) कृषि विस्तार
(b) दस्तकारी
(c) मशीनरी और प्रोद्योगिकी
(d) सामुदायिक स्वामित्व

उत्तर: (c) मशीनरी और प्रोद्योगिकी

व्याख्या:

पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली का मूल आधार उत्पादन शक्तियों (Forces of Production) का निरंतर विकास है।
मार्क्स के अनुसार यह विकास मुख्यतः तकनीकी नवाचार (Technological Innovation) और मशीनरी (Machinery) द्वारा संचालित होता है।
औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन की प्रकृति को दस्तकारी से यांत्रिक (mechanised) बना दिया, जिससे श्रम-विभाजन, फैक्टरी प्रणाली और बड़े पैमाने के उत्पादन का जन्म हुआ।

मशीनें न केवल श्रम की उत्पादकता बढ़ाती हैं, बल्कि पूंजी संचय (Capital Accumulation) और लाभ-उन्मुख उत्पादन को भी तेज करती हैं।
मशीनरी के विकास से:

  • उत्पादन की गति कई गुना बढ़ती है
  • लागत घटती है
  • मुनाफा बढ़ता है
  • और पूंजी का निवेश और पुनर्निवेश (Reinvestment) तेज होता है

पूंजीवाद के विस्तार और स्थायित्व का सबसे निर्णायक साधन तकनीकी विकास और मशीनरी ही है।

पूंजीवाद मूलतः तकनीकी प्रगति और मशीनरी-आधारित उत्पादन का परिणाम है।
मशीनों ने श्रम, उत्पादन संगठन और पूंजी संचय के पूरे ढांचे को बदलकर पूंजीवाद को शक्तिशाली और वैश्विक प्रणाली में रूपांतरित किया।
इसीलिए मार्क्स के अनुसार आधुनिक पूंजीवाद की वास्तविक प्रेरक शक्ति मशीनरी और प्रोद्योगिकी ही है।

3. (कथन-1 / कथन-2):

कथन-1: पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों में मजदूर अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए विवश होता है।
कथन-2: पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्ध मजदूर को शोषण से स्वतंत्र बनाते हैं।

(a) केवल कथन-1 सही है
(b) केवल कथन-2 सही है
(c) दोनों कथन सही हैं
(d) दोनों कथन गलत हैं

उत्तर: (a) केवल कथन-1 सही है

व्याख्या:

मार्क्सवादी सिद्धांत के अनुसार पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्ध निजी स्वामित्व, वस्तु-निर्माण (commodity production) और वर्ग-संबंधों पर आधारित होते हैं।
इस व्यवस्था में मजदूर उत्पादन के साधनों (machines, tools, raw materials) का स्वामी नहीं होता।
इसलिए जीविका चलाने के लिए वह अपनी श्रम-शक्ति को एक वस्तु (commodity) की तरह बाजार में बेचने के लिए मजबूर होता है।

कथन-1 इसी वास्तविकता को दर्शाता है और पूरी तरह सही है।

इसके विपरीत, कथन-2 गलत है, क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था मजदूर को शोषण से “मुक्त” नहीं करती।
बल्कि यह शोषण को नए और छिपे हुए रूप में संगठित करती है।
मजदूर को मजदूरी तो मिलती है, पर उसका श्रम जो मूल्य उत्पन्न करता है, उसमें से एक हिस्सा पूंजीपति “अधिशेष मूल्य (surplus value)” के रूप में अपने पास रख लेता है।
यही पूंजीवादी शोषण की मूल प्रक्रिया है।

इसलिए कथन-2 मार्क्सवादी विश्लेषण के प्रतिकूल है।

पूंजीवाद मजदूर को श्रम-शक्ति बेचने के लिए बाध्य करता है और उसके श्रम से अधिशेष मूल्य निकालकर शोषण को पुनरुत्पादित करता है।
इसलिए कथन-1 सही है जबकि कथन-2 तथ्यात्मक रूप से गलत है।

4. मार्क्स ने पूंजीवाद की उत्पत्ति और विकास में निम्नलिखित किन कारकों को मुख्य माना है?

(a) अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value) का शोषण
(b) उत्पादन का विस्तार और प्रोद्योगिकी का विकास
(c) पूंजीपतियों के बीच प्रतियोगिता और पूंजीवादी अन्तर्विरोध
(d) सभी उपरोक्त

उत्तर: (d) सभी उपरोक्त

व्याख्या:

मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद की उत्पत्ति और विकास किसी एक कारण का परिणाम नहीं, बल्कि अनेक आर्थिक प्रक्रियाओं और अन्तर्विरोधों (contradictions) का संयुक्त प्रभाव है।

  1. अधिशेष मूल्य (Surplus Value) का शोषण
    पूंजीवाद का मूल सिद्धांत मजदूर के श्रम से उत्पन्न अतिरिक्त मूल्य का पूंजीपति द्वारा अधिग्रहण है।
    इसी प्रक्रिया से पूंजी संचय (Accumulation of Capital) बढ़ता है, जो आगे पूंजीवाद को विस्तार देता है।
  2. उत्पादन का विस्तार और प्रोद्योगिकी का विकास
    औद्योगिक क्रांति के बाद मशीनरी, तकनीक और वैज्ञानिक नवाचारों ने उत्पादन की क्षमता कई गुना बढ़ाई।
    मार्क्स के अनुसार “continuous revolutionising of the instruments of production” पूंजीवाद की विशेषता है।
  3. पूंजीपतियों के बीच प्रतियोगिता और अन्तर्विरोध
    प्रतिस्पर्धा पूंजीपति को अधिक उत्पादन करने, लागत घटाने और तकनीक अपनाने के लिए मजबूर करती है।
    लेकिन यही प्रतिस्पर्धा आर्थिक संकटों, बेरोज़गारी और वर्ग-संघर्ष को जन्म देती है—जो पूंजीवाद का आंतरिक अन्तर्विरोध है।

इस तरह मार्क्स ने इन सभी कारकों को पूंजीवादी व्यवस्था के विकास के केन्द्र में रखा है।

मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद का विकास अधिशेष मूल्य के शोषण, तकनीकी क्रांति, उत्पादन-विस्तार, वर्ग-संघर्ष और पूंजीपति प्रतिस्पर्धा की संयुक्त ऐतिहासिक प्रक्रिया है।

Mohan Exam

5. (सूची-I / सूची-II मिलान)

सूची-I (अवयव)
A. बुनियादी संरचना (Infrastructure)
B. अधिसंरचना (Superstructure)
C. पूँजी (Capital)

सूची-II (विवरण)

  1. उत्पादन संबंध एवं उत्पादन के साधन
  2. राजनीतिक-कानूनी-सांस्कृतिक संरचना
  3. पूँजी के स्वरूप—मशीनें, उपकरण, उत्पादन सामग्री, वस्तुएँ

(a) A-2, B-3, C-1
(b) A-3, B-1, C-2
(c) A-1, B-2, C-3
(d) A-1, B-3, C-2

उत्तर: (c) A-1, B-2, C-3

व्याख्या:

मार्क्स ने समाज के विश्लेषण में आधार (Base) और अधिसंरचना (Superstructure) का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार किसी भी समाज की मूल संरचना को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि—
(1) उत्पादन कैसे होता है?
(2) उत्पादन के साधनों पर किसका नियंत्रण है?
(3) उसी आधार पर राजनीतिक-कानूनी-वैचारिक ढाँचे कैसे बनते हैं?

इन्हीं तत्वों को सूची-I और सूची-II के माध्यम से समझाया गया है।

A. बुनियादी संरचना (Infrastructure / Base) → 1. उत्पादन संबंध एवं उत्पादन के साधन

मार्क्स के अनुसार बुनियादी संरचना समाज की आर्थिक नींव है, जिसमें शामिल हैं—

  • उत्पादन के साधन (Means of Production)
    • भूमि
    • मशीनरी
    • तकनीक
    • कच्चा माल
  • उत्पादन संबंध (Relations of Production)
    • मजदूर और पूँजीपति के बीच संबंध
    • स्वामित्व की प्रणाली
    • नियंत्रण/शोषण के ढाँचे

यह आर्थिक आधार ही समाज की अधिसंरचना को निर्धारित करता है।

मार्क्स का कथन:
The mode of production of material life determines the general character of the social, political and intellectual life.
(भौतिक उत्पादन का तरीका ही राजनीति, समाज और विचारों की प्रकृति तय करता है।)

B. अधिसंरचना (Superstructure) → 2. राजनीतिक-कानूनी-सांस्कृतिक संरचना

अधिसंरचना उन सभी संस्थाओं और विचारों का समूह है जो आर्थिक आधार पर खड़ी होती हैं—

  • राज्य (State)
  • राजनीतिक व्यवस्था
  • विधि एवं न्याय प्रणाली
  • धर्म
  • शिक्षा
  • मीडिया
  • कला, संस्कृति, मूल्य और विचारधाराएँ

मार्क्स कहता है कि ये सभी संस्थाएँ उस वर्ग के हितों की रक्षा करती हैं जिसके पास आर्थिक शक्ति (Means of Production) होती है।

मार्क्स का मूल कथन (German Ideology)
The superstructure grows out of the economic base and functions to stabilize it.
(अधिसंरचना आर्थिक आधार से उत्पन्न होती है और उसे स्थिर रखने का काम करती है।)

C. पूँजी (Capital) → 3. मशीनें, उपकरण, उत्पादन सामग्री, वस्तुएँ

मार्क्स के अनुसार पूँजी केवल धन नहीं है, बल्कि—
“वह मूल्य है जो श्रम के शोषण से स्वयं को बढ़ाता है।”

पूँजी कई रूपों में होती है—

  • स्थिर पूँजी (Fixed Capital) → मशीनें, औज़ार, उपकरण, फैक्ट्री
  • परिवर्ती पूँजी (Variable Capital) → मजदूरों की श्रम-शक्ति
  • वस्तु-पूँजी (Commodity Capital) → उत्पादित वस्तुएँ
  • उत्पादन पूँजी (Productive Capital) → उत्पादन प्रक्रिया में लगी कुल संपदा

इन सभी रूपों में पूँजी का मूल उद्देश्य—
लाभ (Profit) और अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value) का अधिकतम अधिग्रहण है।

मार्क्स (Capital, Volume I):
Capital is dead labour which, vampire-like, lives only by sucking living labour.
(पूँजी मृत श्रम है जो जीवित श्रम का शोषण करके ही बढ़ती है।)

  • बुनियादी संरचना समाज की आर्थिक नींव है।
  • अधिसंरचना उसी नींव पर उभरने वाली राजनीतिक-कानूनी-सांस्कृतिक दुनिया है।
  • पूँजी उत्पादन साधनों का वह रूप है जो श्रम के शोषण के माध्यम से स्वयं को बढ़ाती है।

6. मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद का मुख्य उद्देश्य क्या है?

(a) सामाजिक कल्याण
(b) मुनाफाखोरी
(c) उत्पादन का सामुदायिक नियंत्रण
(d) उत्पादन में स्थिरता

उत्तर: (b) मुनाफाखोरी

व्याख्या:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से पूंजीवाद केवल आर्थिक प्रणाली नहीं, बल्कि मूल्य-उन्मुख (profit-oriented) सामाजिक संबंधों का जाल है।

  1. मुनाफाखोरी (Profit Maximization) पूंजीवाद का केंद्रीय उद्देश्य
    • पूंजीवादी उत्पादन का मुख्य लक्ष्य अधिकतम अधिशेष मूल्य (Surplus Value) प्राप्त करना है।
    • यह अधिशेष मूल्य मजदूर की श्रम-शक्ति से उत्पन्न होता है और पूंजीपति के लाभ में बदल जाता है।
  2. पूंजी का नियंत्रण
    • पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपति उत्पादन के साधनों और श्रम पर नियंत्रण रखते हैं।
    • इसका उद्देश्य समाज या श्रमिक कल्याण नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और वर्गीय लाभ बढ़ाना है।
  3. सिद्धांत और व्यवहार
    • पूंजीवाद में सामाजिक कल्याण केवल तभी संभव होता है जब यह मुनाफे को बढ़ाने में सहायक हो।
    • उत्पादन का सामुदायिक नियंत्रण या स्थिरता प्राथमिक उद्देश्य नहीं है; पूंजीवादी प्रणाली में परिवर्तन और प्रतियोगिता ही निरंतर रहते हैं।

इसलिए, मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद का केंद्रीय उद्देश्य है — मुनाफाखोरी।

पूंजीवाद का उद्देश्य सामाजिक कल्याण नहीं, बल्कि मुनाफा और अधिशेष मूल्य का अधिकतम अधिग्रहण है।
पूंजी का नियंत्रण, श्रम का संगठन और उत्पादन की तीव्रता सभी इसी केंद्रीय उद्देश्य को पूरा करने के साधन हैं।

7. पूंजीवाद के उद्भव की प्रक्रिया में सामन्तवाद का क्या योगदान रहा?

(a) किसानों का स्वतंत्र स्वामित्व
(b) सामन्त द्वारा कर और बेगार से पूंजी का संचय
(c) राज्य का पूर्ण नियंत्रण
(d) मजदूरों का सामूहिक उत्पादन

उत्तर: (b) सामन्त द्वारा कर और बेगार से पूंजी का संचय

व्याख्या:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से पूंजीवाद की उत्पत्ति किसी एक चरण में नहीं हुई। यह इतिहासिक और आर्थिक प्रक्रियाओं का परिणाम है, जिसमें सामन्तवाद (Feudalism) का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

  1. सामन्तवाद में पूंजी का प्रारंभिक संचय
    • सामन्तों के पास भूमि का स्वामित्व और किसानों की श्रम शक्ति का नियंत्रण था।
    • किसानों से लिया गया कर और बेगार (Tribute and Corvée Labour) सामन्तों को आर्थिक शक्ति प्रदान करता था।
    • यह प्रारंभिक पूंजी (Initial Capital) शहरों और व्यापारिक वर्ग में निवेश के लिए उपलब्ध हुई।
  2. नगरों में पूंजीवादी व्यापार का विकास
    • सामन्तों द्वारा संचयित पूंजी का एक हिस्सा शहरी सेठों और व्यापारियों में निवेश हुआ।
    • इससे व्यापारिक पूंजी और औद्योगिक निवेश का आरंभ हुआ।
    • यह क्रमिक रूप से फ्यूडल व्यवस्था से पूंजीवादी उत्पादन संबंधों की ओर ले गया।
  3. सामन्तवाद से पूंजीवाद का ऐतिहासिक संबंध
    • सामन्तवाद ने भूमि पर अधिकार और श्रम की शोषित संरचना के माध्यम से पूंजी के प्रारंभिक स्रोत प्रदान किए।
    • यही ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थिति ने औद्योगिक क्रांति और आधुनिक पूंजीवादी उत्पादन की नींव रखी।

सामन्तवादी व्यवस्था ने कर और बेगार के माध्यम से प्रारंभिक पूंजी का संचय संभव किया, जिसने नगरों में व्यापारिक और औद्योगिक पूंजी के विकास को जन्म दिया।
इस प्रक्रिया से सामन्तवाद से पूंजीवाद का संक्रमण हुआ।

8. (कथन-1 / कथन-2):

कथन-1: पूंजीवाद में उत्पादन के साधनों का निजी स्वामित्व होता है।
कथन-2: पूंजीवाद में श्रमिकों को उत्पादन के निर्णयों में समान अधिकार प्राप्त होते हैं।

(a) केवल कथन-1 सही है
(b) केवल कथन-2 सही है
(c) दोनों कथन सही हैं
(d) दोनों कथन गलत हैं

उत्तर: (a) केवल कथन-1 सही है

व्याख्या:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार पूंजीवाद की मूल विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. उत्पादन के साधनों का निजी स्वामित्व
    • पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों में भूमि, मशीनरी, कच्चा माल और फैक्ट्रियाँ निजी पूंजीपतियों के हाथ में होती हैं।
    • निजी स्वामित्व का अर्थ है कि उत्पादन के साधनों पर पूंजीपति का पूर्ण नियंत्रण होता है।
  2. मजदूरों के अधिकार और स्थिति
    • मजदूर केवल अपनी श्रम-शक्ति बेचते हैं, लेकिन उत्पादन की प्रक्रिया या उत्पादन निर्णयों में उनका कोई वास्तविक अधिकार नहीं होता।
    • श्रमिक उत्पादन के साधनों पर नियंत्रित नहीं होते और न ही उत्पादन प्रक्रिया में समान भागीदारी होती है।
  3. कथन-1 और कथन-2 का मूल्यांकन
    • कथन-1 सही है, क्योंकि पूंजीवाद में उत्पादन के साधनों का स्वामित्व निजी पूंजीपतियों के पास होता है।
    • कथन-2 गलत है, क्योंकि पूंजीवादी प्रणाली श्रमिकों को उत्पादन निर्णयों में समान अधिकार नहीं देती।

मार्क्स इसे पूंजीवादी शोषण और अधिशेष मूल्य (Surplus Value) सृजन का आधार मानते हैं।

पूंजीवाद निजी स्वामित्व और श्रमिकों के अधिकारों की असमानता पर आधारित है।
इसलिए कथन-1 सही और कथन-2 गलत है।

9. निजी स्वामित्व के पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्ध का समाज पर क्या प्रभाव होता है?

(a) श्रमिकों का आर्थिक सशक्तिकरण
(b) मजदूर वर्ग पर पूंजीपति का नियंत्रण
(c) उत्पादन का सामूहिक निर्णय
(d) राज्य की पूर्ण स्वतंत्रता

उत्तर: (b) मजदूर वर्ग पर पूंजीपति का नियंत्रण

व्याख्या:

मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों की मुख्य विशेषता उत्पादन साधनों का निजी स्वामित्व है। इसके सामाजिक प्रभाव इस प्रकार हैं:

  1. पूंजीपति का नियंत्रण
    • जब उत्पादन के साधन निजी हाथों में होते हैं, तो पूंजीपति मजदूरों के श्रम और जीवन पर नियंत्रण करता है।
    • यह नियंत्रण केवल उत्पादन प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहता; यह मजदूर के वित्तीय, सामाजिक और रोज़मर्रा के जीवन पर भी प्रभाव डालता है।
  2. मजदूरों की स्थिति
    • मजदूर केवल अपनी श्रम-शक्ति बेचने के लिए मजबूर होते हैं।
    • उन्हें उत्पादन के निर्णय में कोई अधिकार नहीं होता, न ही उत्पादन के लाभ में हिस्सेदारी मिलती है।
  3. समाज पर व्यापक प्रभाव
    • आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण
    • श्रमिक वर्ग की आर्थिक असमानता और शोषण
    • सामाजिक और राजनीतिक शक्ति पर पूंजीपति का प्रभाव

इस प्रकार, निजी स्वामित्व वाले पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्ध श्रमिक वर्ग पर पूंजीपति के प्रभुत्व और नियंत्रण को जन्म देते हैं।

निजी स्वामित्व और पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्ध समाज में श्रमिक वर्ग पर पूंजीपति का नियंत्रण स्थापित करते हैं, जबकि उत्पादन निर्णयों और लाभ में श्रमिकों की भागीदारी न्यूनतम रहती है।

10. (सूची-I / सूची-II मिलान):

सूची-I (अवयव)
A. पूंजी
B. निजी स्वामित्व
C. मुनाफाखोरी

सूची-II (संबंधित विवरण)

  1. उत्पादन के साधनों और माल पर नियंत्रण
  2. लाभ कमाने की मुख्य प्रवृत्ति
  3. उत्पादन और व्यवसाय का आधार

(a) A-1, B-2, C-3
(b) A-3, B-1, C-2
(c) A-2, B-3, C-1
(d) A-3, B-2, C-1

उत्तर: (b) A-3, B-1, C-2

व्याख्या:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण में पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्ध तीन केंद्रीय अवयवों पर आधारित हैं: पूंजी (Capital), निजी स्वामित्व (Private Ownership), और मुनाफाखोरी (Profit-Making)

A. पूंजी → उत्पादन और व्यवसाय का आधार

  • पूंजी में मशीनें, कच्चा माल, धन, उत्पादन सामग्री और तैयार माल शामिल होते हैं।
  • यह उत्पादन प्रक्रिया का आर्थिक आधार है और अधिशेष मूल्य (Surplus Value) उत्पन्न करने का प्रमुख साधन है।
  • मार्क्स के अनुसार, पूंजी मृत श्रम का संग्रह है जो जीवित श्रम के शोषण से बढ़ती है।

मार्क्स का कथन (Capital, Vol I, Ch.7):

“Capital is dead labour, which, vampire-like, lives only by sucking living labour.”
(पूंजी मृत श्रम है जो जीवित श्रम से शोषण करके ही बढ़ती है।)

B. निजी स्वामित्व → उत्पादन साधनों और माल पर नियंत्रण

  • पूंजीवादी समाज में भूमि, मशीन, उत्पादन सामग्री और निर्मित वस्तुएँ निजी पूंजीपतियों के नियंत्रण में होती हैं।
  • निजी स्वामित्व का मतलब है कि निर्णय लेने की शक्ति मजदूरों के पास नहीं होती, और उत्पादन के लाभों पर मजदूरों का कोई नियंत्रण नहीं होता।
  • यह पूंजीपति वर्ग की आर्थिक शक्ति और समाज में प्रभुत्व सुनिश्चित करता है।

मार्क्स का कथन (Capital, Vol I, Ch.13):

“The capitalist controls the instruments of production and the distribution of products.”
(पूंजीपति उत्पादन के साधनों और उत्पादों के वितरण पर नियंत्रण रखता है।)

C. मुनाफाखोरी → लाभ कमाने की मुख्य प्रवृत्ति

  • पूंजीवादी उत्पादन का प्राथमिक उद्देश्य है अधिकतम लाभ कमाना
  • यह लाभ अधिशेष मूल्य के रूप में उत्पन्न होता है, जो मजदूरों के श्रम से हासिल होता है।
  • मुनाफाखोरी पूंजीवादी प्रणाली की सर्वाधिक विशिष्ट प्रवृत्ति है और इसे संचालन का केंद्रीय प्रेरक तत्व माना जाता है।

मार्क्स का कथन (Communist Manifesto, 1848):

“The bourgeoisie cannot exist without constantly revolutionising the instruments of production, and thereby the relations of production, and with them the whole relations of society.”
(पूंजीपति तब तक अस्तित्व में नहीं रह सकता जब तक वह उत्पादन साधनों और उत्पादन संबंधों को लगातार बदलता न रहे।)
– इस परिवर्तन का मूल उद्देश्य लाभ और अधिशेष मूल्य का अधिकतम अधिग्रहण है।

11. मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी व्यवस्था में वस्तुओं के भाव कौन निर्धारित करता है?

(a) परंपराएँ
(b) राज्य के आदेश
(c) बाजार
(d) किसान

उत्तर: (c) बाजार

व्याख्या:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से पूंजीवादी व्यवस्था में मूल्य (Price) की संरचना का विश्लेषण इस प्रकार है:

  1. मूल्य का निर्धारण: श्रम मूल्य और बाजार मूल्य
    • मार्क्स ने कहा कि किसी वस्तु का मूल्य (Value) उसके निर्माण में लगे सामाजिक रूप से आवश्यक श्रम समय (Socially Necessary Labour Time) से निर्धारित होता है।
    • यह मूल्य बाजार में वास्तविक बिक्री मूल्य (Market Price) में परिवर्तित होता है, जो मांग और आपूर्ति (Demand and Supply) से तय होता है।
  2. बाजार का केंद्रीय भूमिका
    • पूंजीवादी उत्पादन में राज्य या परंपरा मूल्य निर्धारण नहीं करती
    • वस्तुओं के भाव तय होते हैं कि कौन-सी वस्तु लाभदायक है और कौन-सी नहीं।
    • बाजार आर्थिक निर्णयों का मुख्य नियामक है।
  3. मजदूर और किसान का प्रभाव
    • मजदूर केवल अपनी श्रम-शक्ति बेचते हैं, उनका मूल्य निर्धारण पर प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता।
    • किसान या छोटे उत्पादक बाजार में मूल्य की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन यह पूंजीवादी प्रणाली के लिए मौलिक निर्धारण नहीं है।

इसलिए मार्क्स के अनुसार, पूंजीवादी व्यवस्था में वस्तुओं के भाव का मुख्य निर्धारण बाज़ार करता है।

  • पूंजीवादी मूल्य व्यवस्था में मांग और आपूर्ति के आधार पर बाजार वस्तुओं के भाव तय करता है।
  • राज्य, परंपरा या व्यक्तिगत किसानों का प्रभाव केवल सीमित और अप्रत्यक्ष होता है।

12. पूर्व-पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषता क्या थी?

(a) वस्तुओं का भाव बाजार तय करता था
(b) प्रत्येक परिवार अपनी आवश्यकतानुसार उत्पादन करता था
(c) श्रमिकों की मेहनत पर पूंजीपति का नियंत्रण था
(d) उत्पादन साधनों का निजी स्वामित्व

उत्तर: (b) प्रत्येक परिवार अपनी आवश्यकतानुसार उत्पादन करता था

व्याख्या:

पूर्व-पूंजीवादी अर्थव्यवस्था (Pre-Capitalist Economy) को मार्क्स ने स्थानीय, स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के रूप में परिभाषित किया है।

  1. आत्मनिर्भर उत्पादन (Subsistence Production)
    • प्रत्येक परिवार या समुदाय अपनी आवश्यकता के अनुसार उत्पादन करता था।
    • यह उत्पादन मूल रूप से व्यक्तिगत या सामुदायिक उपयोग के लिए होता था।
  2. मूल्यों और बाजार का सीमित प्रभाव
    • बाजार का प्रभाव न्यूनतम था। वस्तुओं का मूल्य मांग और आपूर्ति से नहीं, बल्कि उपयोगिता और पारंपरिक आवश्यकता से तय होता था।
    • उत्पादन का उद्देश्य लाभ नहीं, बल्कि जीवन निर्वाह और आवश्यकताएँ पूरी करना था।
  3. निजी स्वामित्व और पूंजी का अभाव
    • उत्पादन साधन (जैसे भूमि, औज़ार) पर निजी पूंजीपतियों का नियंत्रण नहीं था।
    • श्रम शोषण और पूंजी संचय की संरचना नहीं थी, इसलिए श्रमिकों का उत्पादन पर कोई शोषण नहीं था।
  4. अतिरिक्त वस्तुओं का विनिमय
    • यदि कोई वस्तु अतिरिक्त होती, तो वह विनिमय (Barter) या सीमित व्यापार के माध्यम से प्राप्त की जाती थी।
    • यह व्यापार पूंजीवादी उत्पादन की तरह लाभ-उन्मुख नहीं था।

पूर्व-पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषता थी:
“प्रत्येक परिवार या समुदाय अपनी आवश्यकतानुसार उत्पादन करता था, और उत्पादन का उद्देश्य लाभ नहीं, बल्कि जीविका और आवश्यकताओं की पूर्ति था।”

13. बाजार पूंजीवादी व्यवस्था में क्या भूमिका निभाता है?

(a) वस्तुओं के भाव का निर्धारण
(b) श्रम शक्ति की खरीद-फरोख्त
(c) दोनों (a) और (b)
(d) केवल वित्तीय निर्णयों में

उत्तर: (c) दोनों (a) और (b)

व्याख्या:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से बाजार पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था का केन्द्रीय अंग है। इसके दो मुख्य कार्य हैं:

1. वस्तुओं के भाव का निर्धारण (Price Determination of Commodities)

  • पूंजीवाद में वस्तुएँ केवल उपयोग के लिए नहीं, बल्कि बिक्री और लाभ के लिए उत्पादन होती हैं।
  • बाजार में मांग और आपूर्ति (Demand and Supply) तय करती है कि किसी वस्तु का भाव क्या होगा।
  • मार्क्स के अनुसार, मूल्य (Value) वस्तु में लगे सामाजिक रूप से आवश्यक श्रम समय से आता है, लेकिन बाज़ार में यह मूल्य सौदेबाज़ी और प्रतियोगिता के आधार पर बदलता है।

2. श्रम शक्ति की खरीद-फरोख्त (Buying and Selling of Labour Power)

  • पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर अपनी श्रम शक्ति (Labour Power) बेचते हैं।
  • पूंजीपति श्रम शक्ति खरीदकर उसे उत्पादन प्रक्रिया में लगाते हैं और अधिशेष मूल्य (Surplus Value) प्राप्त करते हैं।
  • बाजार ही वह स्थान है जहाँ श्रम और पूंजी का आदान-प्रदान होता है।

3. बाजार का केंद्रीय महत्व

  • पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में उत्पादन का उद्देश्य लाभ कमाना है।
  • बाजार मूल्य और श्रम शक्ति की खरीद-फरोख्त पूंजीवादी व्यवस्था के संचालन का मुख्य साधन है।

बाजार पूंजीवादी व्यवस्था में दोहरी भूमिका निभाता है:

  1. वस्तुओं के भाव का निर्धारण
  2. श्रम शक्ति की खरीद और बिक्री

14. निम्नलिखित में से कौन पूंजीपति या उसके मैनेजर का नियंत्रण नहीं है?

(a) उत्पादन प्रक्रिया
(b) श्रमिकों की संख्या और दक्षता
(c) वित्तीय निर्णय
(d) किसान का स्थानीय उत्पादन

उत्तर: (d) किसान का स्थानीय उत्पादन

व्याख्या:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में पूंजीपति या उसके मैनेजर का नियंत्रण मुख्य रूप से आर्थिक और उत्पादन प्रक्रिया पर केंद्रित होता है:

1. पूंजीपति का नियंत्रण क्षेत्र

  • उत्पादन प्रक्रिया: मशीनों, कच्चे माल और श्रम का आयोजन; उत्पादन के स्तर और गति को नियंत्रित करना।
  • श्रम शक्ति: मजदूरों की संख्या, दक्षता और कार्य समय को निर्धारित करना।
  • वित्तीय निर्णय: पूंजी का निवेश, उत्पादन लागत और लाभ का प्रबंधन।

2. पूंजीपति का नियंत्रण नहीं

  • किसान का स्थानीय उत्पादन:
    • स्वतंत्र या परंपरागत कृषि में उत्पादन का निर्णय पूंजीपति पर निर्भर नहीं होता।
    • किसान अपने परिवार या स्थानीय समुदाय की आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन करता है।
    • पूंजीपति केवल औद्योगिक उत्पादन और श्रम शक्ति पर नियंत्रण रखता है; पारंपरिक या ग्रामीण उत्पादन से उसका प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता।

पूंजीपति या मैनेजर का नियंत्रण उद्योग और श्रम से संबंधित उत्पादन प्रक्रियाओं तक सीमित है।
किसान का स्थानीय उत्पादन पूंजीवादी नियंत्रण से बाहर रहता है।

15. (कथन-1 / कथन-2):

कथन-1: पूंजीवादी व्यवस्था में वित्तीय निर्णयों में मजदूर की भागीदारी होती है।
कथन-2: पूंजीपति या मैनेजर उत्पादन और वित्तीय निर्णय स्वयं लेते हैं।

(a) केवल कथन-1 सही है
(b) केवल कथन-2 सही है
(c) दोनों कथन सही हैं
(d) दोनों कथन गलत हैं

उत्तर: (b) केवल कथन-2 सही है

व्याख्या:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों की संरचना इस प्रकार है:

  1. उत्पादन और वित्तीय निर्णयों का केंद्रीकरण
    • पूंजीपति या उसके मैनेजर उत्पादन प्रक्रिया, श्रमिक संख्या, मशीनरी का उपयोग, उत्पादन की मात्रा और लागत, तथा वित्तीय निवेश के निर्णय स्वयं लेते हैं।
    • यह केंद्रीकरण पूंजीवादी प्रणाली की लाभ-संचयन और अधिशेष मूल्य सृजन की नींव है।
  2. मजदूर की भूमिका
    • मजदूर केवल अपनी श्रम शक्ति बेचते हैं
    • उत्पादन और वित्तीय निर्णयों में मजदूर की कोई वास्तविक भागीदारी नहीं होती।
    • मजदूर की भूमिका पूंजीपति के नियंत्रण में कार्यकारी तक सीमित रहती है।
  3. कथन-1 और कथन-2 का मूल्यांकन
    • कथन-1 गलत है, क्योंकि मजदूर वित्तीय या उत्पादन निर्णयों में भाग नहीं लेते।
    • कथन-2 सही है, क्योंकि पूंजीपति/मैनेजर ही सभी महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय लेते हैं।

पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन और वित्तीय निर्णय पूंजीपति या उसके मैनेजर द्वारा लिए जाते हैं, जबकि मजदूर केवल कार्य करने तक सीमित होता है।
इसलिए सही उत्तर है: (b) केवल कथन-2 सही है

16. (सूची-I / सूची-II मिलान):

सूची-I (अवयव)
A. मुद्रा विनियम
B. उत्पादन पर नियंत्रण
C. बाजार अर्थव्यवस्था

सूची-II (संबंधित विवरण)

  1. वस्तुओं और सेवा का मूल्य निर्धारण
  2. उत्पादन प्रक्रिया और श्रमिकों का प्रबंधन
  3. विनिमय और लेन-देन के लिये वित्तीय साधन

(a) A-1, B-2, C-3
(b) A-3, B-2, C-1
(c) A-2, B-1, C-3
(d) A-3, B-1, C-2

उत्तर: (b) A-3, B-2, C-1

व्याख्या:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से पूंजीवादी उत्पादन संबंध और आर्थिक संरचना निम्नलिखित अवयवों से निर्मित है:

A. मुद्रा विनियम → विनिमय और वित्तीय साधन

  • मुद्रा का मुख्य कार्य है विनिमय और लेन-देन को सुगम बनाना।
  • पूंजीवाद में, मुद्रा केवल भुगतान का माध्यम नहीं, बल्कि पूंजी संचय और निवेश का साधन भी है।
  • वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान में मुद्रा केंद्रीय भूमिका निभाती है।

B. उत्पादन पर नियंत्रण → उत्पादन प्रक्रिया और श्रमिकों का प्रबंधन

  • पूंजीपति या उसके मैनेजर उत्पादन के साधनों, मशीनरी और श्रमिकों का प्रबंधन करते हैं।
  • यह नियंत्रण उत्पादन की मात्रा, गुणवत्ता और लागत तय करता है।
  • मजदूर केवल अपनी श्रम-शक्ति बेचते हैं; उत्पादन निर्णय में उनकी भागीदारी नहीं होती।

C. बाजार अर्थव्यवस्था → वस्तुओं के भाव और मांग-आपूर्ति द्वारा मूल्य निर्धारण

  • पूंजीवादी व्यवस्था में मांग और आपूर्ति बाजार में वस्तुओं के भाव का निर्धारण करती है।
  • यह प्रणाली आर्थिक निर्णयों का मुख्य नियामक है और उत्पादन तथा वितरण को प्रभावित करती है।

17. भारत में सबसे पहली बार कृषि क्षेत्र में पूंजीवादी व्यवस्था कब प्रारम्भ हुई?

(a) मुग़ल काल में
(b) ब्रिटिश राज में
(c) स्वतंत्र भारत में
(d) सामन्तवादी युग में

उत्तर: (b) ब्रिटिश राज में

व्याख्या:

1. ब्रिटिश राज में कृषि में पूंजीवाद का उद्भव

  • अंग्रेजों ने Permanent Settlement Act (1793), Ryotwari और Mahalwari Systems लागू किए।
  • इन नीतियों के तहत भूमि अब किसानों या ज़मींदारों की निजी संपत्ति मानी गई।
  • उत्पादन अब केवल जीविका के लिए नहीं, बल्कि बाजार और मुनाफे के लिए किया जाने लगा।
  • इस प्रकार ब्रिटिश राज ने भारत में कृषि में पूंजीवादी ढांचा की नींव रखी।

2. ब्रिटिश शासन का शोषण

  • किसानों और ज़मींदारों से भारी कर वसूला गया।
  • उत्पादन का नियंत्रण ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार और ज़मींदारों के हाथ में था।
  • किसान अपने उत्पादन के निर्णय में स्वतंत्र नहीं थे और कई बार भूखमरी जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा
  • इस दृष्टिकोण से ब्रिटिश पूंजीवादी व्यवस्था भारतीय हित में नहीं, बल्कि ब्रिटिश मुनाफाखोरी और औपनिवेशिक शासन के हित में थी।

3. स्वतंत्र भारत में सुधार

  • स्वतंत्र भारत में कृषि सुधार, जैसे Land Reform Acts, Green Revolution, और किसान कल्याण योजनाएँ लागू हुईं।
  • इससे कृषि को आधुनिक और प्रभावी बनाया गया, लेकिन पूंजीवादी कृषि की नींव पहले ही ब्रिटिश राज में रखी जा चुकी थी।
  • भारत में कृषि क्षेत्र में पूंजीवादी व्यवस्था का आरंभ ब्रिटिश राज में हुआ।
  • भूमि का निजी स्वामित्व, बाजार उन्मुख उत्पादन और पूंजीगत निवेश इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं।
  • हालांकि ब्रिटिश राज ने इसे लागू किया, यह व्यवस्था भारतीय किसानों के लिए शोषणपूर्ण थी, न कि लाभकारी।

18. (कथन-1 / कथन-2):

कथन-1: मार्क्स ने समाजवादी अवस्था को किसी भविष्य के समाज की कल्पना मानकर परिभाषित किया।
कथन-2: मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद में अन्तर्विरोध और द्वन्द्व है, और यही समाजवाद के उदय का कारण बनेगा।

(a) केवल कथन-1 सही है
(b) केवल कथन-2 सही है
(c) दोनों कथन सही हैं
(d) दोनों कथन गलत हैं

उत्तर: (b) केवल कथन-2 सही है

व्याख्या:

1. मार्क्स का दृष्टिकोण

  • मार्क्स ने समाजवादी अवस्था को भविष्य का आदर्श समाज नहीं माना।
  • उनका विश्लेषण वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण पर आधारित था।
  • उन्होंने कहा कि समाजवाद पूंजीवाद के आंतरिक अन्तर्विरोध और द्वन्द्व के परिणामस्वरूप उत्पन्न होगा।

2. पूंजीवाद के अन्तर्विरोध

  • पूंजीवादी प्रणाली में:
    • श्रमिक और पूंजीपति के बीच शोषण होता है।
    • उत्पादन के साधन कुछ व्यक्तियों के हाथ में केंद्रीकृत होते हैं।
    • ये अन्तर्विरोध समाज में सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष उत्पन्न करते हैं।

3. समाजवाद का उदय

  • मार्क्स के अनुसार ये अन्तर्विरोध स्वाभाविक रूप से पूंजीवादी व्यवस्था के पतन और समाजवाद के उदय की ओर ले जाते हैं।
  • इसलिए समाजवाद किसी कल्पित या आदर्श स्थिति के रूप में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और वैज्ञानिक रूप से अनिवार्य परिणाम के रूप में देखा गया।

19. मार्क्स का तर्क पूंजीवाद और उत्पादन सम्बन्धों के बारे में क्या है?

(a) उत्पादन शक्तियों का विस्तार पूंजीवाद का विकास बढ़ाता है
(b) उत्पादन सम्बन्ध पूंजीवाद से सम्बद्ध नहीं हैं
(c) पूंजीवाद में द्वन्द्व की कोई संभावना नहीं है
(d) पूंजीवाद स्वतः स्थायी है

उत्तर: (a) उत्पादन शक्तियों का विस्तार पूंजीवाद का विकास बढ़ाता है

व्याख्या:

1. उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बन्धों का सिद्धांत

  • मार्क्स ने कहा कि समाज की आर्थिक संरचना दो मुख्य घटकों से मिलकर बनती है:
    1. उत्पादन शक्तियाँ (Forces of Production) – मशीन, तकनीक, कच्चा माल, श्रम शक्ति आदि।
    2. उत्पादन सम्बन्ध (Relations of Production) – सामाजिक और आर्थिक सम्बन्ध जैसे श्रमिक और पूंजीपति का सम्बन्ध।

2. उत्पादन शक्तियों का विस्तार और पूंजीवाद

  • जैसे-जैसे मशीन, तकनीक और कार्यकुशलता बढ़ती है, पूंजीपति अधिक उत्पादन और लाभ के लिए पूंजीवादी ढांचे को फैलाते हैं।
  • यह पूंजीवाद का विकास सुनिश्चित करता है और उत्पादन को अधिक तीव्र और संगठित बनाता है।

3. उत्पादन सम्बन्धों और अन्तर्विरोध

  • उत्पादन सम्बन्ध, उत्पादन शक्तियों के विकास के अनुरूप नहीं होने पर विरोध और संघर्ष उत्पन्न होता है।
  • उदाहरण: पूंजीपति और मजदूर के बीच अधिशेष मूल्य और श्रम शोषण
  • ये अन्तर्विरोध अंततः पूंजीवादी व्यवस्था के पतन और समाजवादी व्यवस्था के उदय की ओर ले जाते हैं।
  • उत्पादन शक्तियों के विस्तार से पूंजीवाद विकसित होता है।
  • लेकिन यदि उत्पादन सम्बन्ध उत्पादन शक्तियों से पीछे रह जाएँ, तो द्वन्द्व और संकट उत्पन्न होते हैं।

20. (सूची-I / सूची-II मिलान):

सूची-I (अवयव)
A. कृषि में निजी मिल्कियत
B. पूंजीवाद का विस्तार
C. समाजवादी अवस्था

सूची-II (संबंधित विवरण)

  1. पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों का निषेध
  2. भूमि की निजी संपत्ति का कानूनी दर्जा
  3. उत्पादन शक्तियों के विकास और द्वन्द्व

(a) A-2, B-3, C-1
(b) A-1, B-2, C-3
(c) A-3, B-1, C-2
(d) A-2, B-1, C-3

उत्तर: (a) A-2, B-3, C-1

व्याख्या:

1. A. कृषि में निजी मिल्कियत → भूमि की निजी संपत्ति का कानूनी दर्जा

  • ब्रिटिश राज ने किसानों और ज़मींदारों को भूमि का निजी स्वामित्व दिया।
  • उदाहरण: Permanent Settlement Act (1793), Ryotwari और Mahalwari Systems।
  • इस बदलाव ने कृषि को बाजार और पूंजीवादी ढांचे के लिए खुला बना दिया।

2. B. पूंजीवाद का विस्तार → उत्पादन शक्तियों के विकास और द्वन्द्व

  • मार्क्स के अनुसार जैसे-जैसे उत्पादन शक्तियाँ बढ़ती हैं, पूंजीवाद का विस्तार होता है।
  • उत्पादन और श्रम सम्बन्धों में अन्तर्विरोध और द्वन्द्व उत्पन्न होते हैं, जो पूंजीवादी व्यवस्था के संकट और समाजवादी अवस्था की नींव बनाते हैं।
  • उदाहरण: मशीन, तकनीक और मजदूर शोषण के कारण उत्पादन सम्बन्ध उत्पादन शक्तियों के अनुरूप नहीं रहते।

3. C. समाजवादी अवस्था → पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों का निषेध

  • समाजवादी अवस्था में पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों का निरोध किया जाता है।
  • उत्पादन और संसाधनों पर सामूहिक नियंत्रण और श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है।
  • यह स्थिति पूंजीवादी द्वन्द्व का परिणाम और समाधान है।

21. मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद के बाद कौन सी अवस्था आएगी?

(a) साम्यवाद
(b) समाजवाद
(c) पूंजीपति अधिनायकवाद
(d) सामन्तवाद

उत्तर: (b) समाजवाद

व्याख्या:

1. मार्क्स का दृष्टिकोण

  • मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद आंतरिक अन्तर्विरोध और शोषण के कारण अपनी सीमाओं तक पहुँचता है।
  • पूंजीवाद का पतन स्वाभाविक और ऐतिहासिक रूप से अनिवार्य है।

2. समाजवादी अवस्था (Transitional Stage)

  • पूंजीवाद के बाद जो व्यवस्था आएगी उसे मार्क्स ने समाजवाद (Socialism) कहा।
  • इस अवस्था में:
    • सर्वहारा वर्ग (Proletariat) सत्ता में होंगे।
    • उत्पादन के साधनों पर सामूहिक नियंत्रण होगा।
    • निजी स्वामित्व और पूंजीवादी शोषण समाप्त हो जाएंगे।
  • यह अवस्था साम्यवाद (Communism) से पहले आती है, जो पूर्ण निषेध और सम्पूर्ण समानता की अवस्था है।

3. साम्यवाद के साथ अंतर

  • समाजवाद → संक्रमणकालीन अवस्था, उत्पादन और सत्ता का नियंत्रण सर्वहारा के हाथ में।
  • साम्यवाद → अंतिम, आदर्श अवस्था, जिसमें राज्य का पतन और पूर्ण आर्थिक समानता होगी।
  • पूंजीवाद के बाद समाजवादी अवस्था आती है।
  • यह अवस्था सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद और उत्पादन पर सामूहिक नियंत्रण का प्रतिनिधित्व करती है।

22. साम्यवाद की अवस्था में मार्क्स के अनुसार समाज की कौन-सी विशेषताएँ होंगी?

(a) वर्ग और राज्य दोनों होंगे
(b) केवल राज्य रहेगा, वर्ग नहीं
(c) न वर्ग होंगे और न राज्य
(d) केवल सर्वहारा का अधिनायकवाद रहेगा

उत्तर: (c) न वर्ग होंगे और न राज्य

व्याख्या:

1. मार्क्स का दृष्टिकोण

  • साम्यवाद (Communism) मार्क्स के अनुसार अंतिम और आदर्श अवस्था है।
  • इस अवस्था में सर्वहारा और पूंजीपति के बीच कोई वर्ग भेद नहीं होगा
  • राज्य का कोई आवश्यक अस्तित्व नहीं रहेगा, क्योंकि शोषण और वर्ग संघर्ष समाप्त हो चुके होंगे

2. मुख्य विशेषताएँ

  1. वर्गहीन समाज (Classless Society)
    • उत्पादन के साधन और संसाधन सामूहिक होंगे
    • कोई व्यक्ति या समूह विशेष लाभ या शक्ति में अग्रणी नहीं होगा।
  2. राज्यहीन समाज (Stateless Society)
    • राज्य केवल शोषण और वर्ग संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक होता है।
    • जब वर्ग भेद समाप्त हो जाएगा, राज्य का अस्तित्व आवश्यक नहीं रहेगा।
  3. समान वितरण और स्वतंत्रता
    • प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करेगा और अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त करेगा
    • यह पूर्ण आर्थिक और सामाजिक समानता की अवस्था है।
  • साम्यवाद में न वर्ग और न राज्य होगा।
  • यह समाज पूरी तरह समानता, स्वतंत्रता और सामूहिक उत्पादन नियंत्रण पर आधारित होगा।

23. (कथन-1 / कथन-2):

कथन-1: मार्क्स ने इतिहास की व्याख्या व्यक्तिनिष्ठ दृष्टि से की।
कथन-2: मार्क्स के अनुसार प्रत्येक उत्पादन पद्धति अपनी पिछली अवस्था का निषेध करती है और नई अवस्था का निर्माण करती है।

(a) केवल कथन-1 सही है
(b) केवल कथन-2 सही है
(c) दोनों कथन सही हैं
(d) दोनों कथन गलत हैं

उत्तर: (b) केवल कथन-2 सही है

व्याख्या:

1. मार्क्स का दृष्टिकोण

  • मार्क्स ने इतिहास को वस्तुगत (Scientific) दृष्टि से विश्लेषित किया।
  • उनका दृष्टिकोण व्यक्तिनिष्ठ या आदर्शवादी नहीं था।
  • इतिहास का विकास भौतिक उत्पादन और सामाजिक सम्बन्धों के द्वन्द्व पर आधारित है।

2. उत्पादन पद्धतियों और द्वन्द्व

  • प्रत्येक उत्पादन पद्धति अपनी पिछली अवस्था का निषेध करती है।
  • उदाहरण: सामन्तवाद → पूंजीवाद → समाजवाद → साम्यवाद
  • इस प्रक्रिया को मार्क्स ने भौतिकवादी ऐतिहासिक दृष्टि (Historical Materialism) कहा।
  • यह द्वन्द्व आंतरिक और ऐतिहासिक कारणों से उत्पन्न होता है, न कि व्यक्तियों की इच्छा या आदर्श से।
  • कथन-1 गलत है, क्योंकि इतिहास व्यक्तिनिष्ठ दृष्टि से नहीं, वस्तुगत दृष्टि से समझा गया।
  • कथन-2 सही है, क्योंकि प्रत्येक उत्पादन पद्धति अपनी पिछली अवस्था का निषेध करके नई अवस्था का निर्माण करती है।

24. मार्क्स के वर्ग विश्लेषण के अनुसार पूंजीवादी समाज में तीन मुख्य भरण-पोषण स्त्रोत कौन-से हैं?

(a) श्रम, भूमि कर, व्यापार
(b) पगार, मुनाफाखोरी, भूमि कर
(c) उत्पादन, विनिमय, पूंजी
(d) श्रम शक्ति, मशीन, पूंजी

उत्तर: (b) पगार, मुनाफाखोरी, भूमि कर

व्याख्या:

1. मार्क्स का वर्ग विश्लेषण

  • मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी समाज दो मुख्य वर्गों में बंटा है:
    1. सर्वहारा वर्ग (Proletariat) – श्रम बेचकर जीवित रहते हैं।
    2. पूंजीपति वर्ग (Bourgeoisie) – उत्पादन साधनों के स्वामी, मुनाफा कमाते हैं।

2. मुख्य भरण-पोषण स्त्रोत

  1. पगार (Wages)
    • मजदूरों को उनके श्रम शक्ति के बदले दिया जाता है।
    • यह सर्वहारा वर्ग के जीवन यापन का मुख्य स्रोत है।
  2. मुनाफाखोरी (Profit / Surplus Value)
    • पूंजीपति उत्पादन से अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value) अर्जित करते हैं।
    • यह पूंजीवादी वर्ग का मुख्य भरण-पोषण स्रोत है।
  3. भूमि कर (Rent / Land Revenue)
    • भूमि मालिकों और राज्य द्वारा भूमि पर राजस्व वसूलना।
    • यह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में संपत्ति और आर्थिक शक्ति बनाए रखने का साधन है।
  • पूंजीवादी समाज में पगार, मुनाफाखोरी और भूमि कर तीन स्तंभों के रूप में कार्य करते हैं।
  • यह वर्गीय संरचना और उत्पादन-संबंधों के अध्ययन में महत्वपूर्ण है।
  • सर्वहारा वर्ग → पगार
  • पूंजीपति वर्ग → मुनाफाखोरी
  • भूमि स्वामी/राज्य → भूमि कर

25. (सूची-I / सूची-II मिलान):

सूची-I (अवयव)
A. संक्रमणकालीन अवस्था
B. साम्यवाद
C. पूंजीवाद

सूची-II (संबंधित विवरण)

  1. सर्वहारा का अधिनायकवाद
  2. वर्गहीन और राज्यहीन समाज
  3. उत्पादन शक्तियों और सम्बन्धों पर अन्तर्विरोध

(a) A-1, B-2, C-3
(b) A-2, B-3, C-1
(c) A-3, B-1, C-2
(d) A-1, B-3, C-2

उत्तर: (a) A-1, B-2, C-3

व्याख्या:

A. संक्रमणकालीन अवस्था → सर्वहारा का अधिनायकवाद

  • मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी अंतर्विरोध और शोषण के कारण समाजवादी या संक्रमणकालीन अवस्था उत्पन्न होती है।
  • इस अवधि में सर्वहारा वर्ग (Proletariat) सत्ता में होता है और उत्पादन साधनों पर नियंत्रण रखता है।
  • यह पूंजीवाद से साम्यवाद की ओर जाने वाली संक्रमणकालीन अवस्था है।

B. साम्यवाद → वर्गहीन और राज्यहीन समाज

  • साम्यवाद में कोई वर्ग नहीं होगा और राज्य का कोई आवश्यक अस्तित्व नहीं रहेगा।
  • उत्पादन और संसाधनों का नियंत्रण सर्वहारा के सामूहिक स्वामित्व में होगा।
  • समाज पूरी तरह समानता और स्वतंत्रता पर आधारित होगा।

C. पूंजीवाद → उत्पादन शक्तियों और सम्बन्धों पर अन्तर्विरोध

  • पूंजीवादी समाज में उत्पादन शक्तियों (Production Forces) और उत्पादन सम्बन्धों (Relations of Production) के बीच अन्तर्विरोध उत्पन्न होते हैं।
  • उदाहरण: मशीन और तकनीक का विकास बढ़ता है, परन्तु उत्पादन सम्बन्ध (पूंजीपति और मजदूर) पुराने ढांचे में रहते हैं।
  • यही द्वन्द्व पूंजीवाद के पतन और समाजवाद के उदय का कारण बनता है।

26. मार्क्स के अनुसार किसी भी वर्ग की पहचान का मुख्य आधार क्या है?

(a) जाति
(b) आमदनी और भरण-पोषण के स्त्रोत
(c) जन्म और सामाजिक स्थिति
(d) शिक्षा और योग्यता

उत्तर: (b) आमदनी और भरण-पोषण के स्त्रोत

व्याख्या:

1. मार्क्स का वर्ग विश्लेषण

  • मार्क्स के अनुसार किसी भी समाज में वर्ग विभाजन आर्थिक आधार पर होता है।
  • वर्ग की पहचान व्यक्ति के भरण-पोषण (Livelihood) के स्रोत और आमदनी के तरीके से होती है।

2. मुख्य भरण-पोषण के स्रोत

  1. पगार (Wages) – श्रमिकों की आय उनके श्रम शक्ति के बदले।
  2. मुनाफाखोरी (Profit) – पूंजीपति वर्ग उत्पादन से अतिरिक्त मूल्य अर्जित करता है।
  3. भूमि और भूमि कर (Land / Rent) – भूमि मालिक और राज्य से प्राप्त आय।

3. महत्वपूर्ण बिंदु

  • जाति, जन्म या शिक्षा वर्ग की पहचान का वैज्ञानिक आधार नहीं है।
  • आर्थिक स्थिति और भरण-पोषण के स्रोत ही वास्तविक वर्ग संरचना निर्धारित करते हैं।
  • उदाहरण: एक किसान जो अपनी जमीन स्वयं खेती करता है → सामान्यतः मध्यम वर्ग, जबकि मजदूर केवल श्रम बेचता है → सर्वहारा वर्ग।
  • वर्ग की पहचान आमदनी और भरण-पोषण के स्रोत से होती है।
  • यह दृष्टिकोण मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद और आर्थिक वर्ग विश्लेषण पर आधारित है।

27. रेमण्ड एरॉ के अनुसार मार्क्स का समाजशास्त्र किस पर केन्द्रित है?

(a) धर्म
(b) राज्य
(c) वर्ग संघर्ष
(d) संस्कृति

उत्तर: (c) वर्ग संघर्ष

व्याख्या:

1. रेमण्ड एरॉ का दृष्टिकोण

  • रेमण्ड एरॉ (Raymond Aron) ने मार्क्स के समाजशास्त्र का अध्ययन करते हुए इसे “Society of Class Conflict” कहा।
  • एरॉ के अनुसार मार्क्स का समाजशास्त्र मुख्यतः वर्ग संघर्ष पर आधारित है।

2. वर्ग संघर्ष का महत्व

  • मार्क्स के अनुसार इतिहास की धारा को वर्ग संघर्ष चलाती है
  • उदाहरण:
    • फ्यूडल समाज → सामन्त और किसान वर्ग संघर्ष
    • पूंजीवादी समाज → पूंजीपति और मजदूर वर्ग संघर्ष
  • यह संघर्ष समाज के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को बदलने में निर्णायक होता है।

Mohan Exam

  • धर्म, राज्य, और संस्कृति मार्क्स के समाजशास्त्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मूल विश्लेषण का केंद्र वर्ग संघर्ष है।
  • एरॉ ने इसे मार्क्स का विशिष्ट योगदान माना, जो इतिहास और समाज के परिवर्तन को समझने का वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।
  • मार्क्स का समाजशास्त्र वर्ग संघर्ष पर केन्द्रित है।
  • वर्ग संघर्ष ही सामाजिक परिवर्तन और क्रांति की प्रमुख शक्ति है।

28. रेमण्ड एरॉ ने वर्ग और वर्ग संघर्ष के संबंध में कौन-से तीन मुख्य प्रस्ताव रखे हैं?

(a) वर्ग उत्पादन के विकास से बनते हैं, संघर्ष सर्वहारा को अधिनायकवाद की ओर ले जाता है, अधिनायकवाद वर्गहीन समाज बनाता है
(b) वर्ग जन्म से तय होते हैं, संघर्ष से कोई परिवर्तन नहीं होता, वर्ग सदैव बने रहते हैं
(c) वर्ग केवल संपत्ति से बनते हैं, संघर्ष केवल राजनीति से होता है, वर्ग राज्य बनाता है
(d) वर्ग शिक्षा पर आधारित हैं, संघर्ष केवल बाजार से होता है, अधिनायकवाद उत्पादन बढ़ाता है

उत्तर: (a) वर्ग उत्पादन के विकास से बनते हैं, संघर्ष सर्वहारा को अधिनायकवाद की ओर ले जाता है, अधिनायकवाद वर्गहीन समाज बनाता है

व्याख्या:

1. वर्गों का निर्माण

  • रेमण्ड एरॉ के अनुसार वर्ग उत्पादन पद्धति के विकास से उत्पन्न होते हैं
  • उत्पादन के साधन और संसाधनों का स्वामित्व निर्धारित करता है कि कौन किस वर्ग में आता है।
  • उदाहरण: पूंजीपति वर्ग (Bourgeoisie) और मजदूर वर्ग (Proletariat) पूंजीवादी उत्पादन पद्धति से उत्पन्न होते हैं।

2. वर्ग संघर्ष का महत्व

  • वर्ग संघर्ष समाज के ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रमुख साधन है।
  • संघर्ष सर्वहारा वर्ग को सत्ता में लाता है और संक्रमणकालीन अधिनायकवाद (Transitional Dictatorship of the Proletariat) की स्थापना करता है।

3. अधिनायकवाद और वर्गहीन समाज

  • अधिनायकवाद संक्रमणकालीन अवस्था में सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के माध्यम से पुराने वर्गों को समाप्त करता है।
  • इसका अंतिम परिणाम वर्गहीन और राज्यहीन समाज (Communist Society) है, जहां आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय पूर्ण रूप से स्थापित होते हैं।
  • वर्ग → उत्पादन पद्धति से बनते हैं
  • संघर्ष → सर्वहारा को सत्ता में लाता है
  • अधिनायकवाद → वर्गों को समाप्त कर वर्गहीन समाज स्थापित करता है

29. मार्क्स के अनुसार सामाजिक वर्ग किसे कहते हैं?

(a) किसी भी समूह को जो शिक्षा के आधार पर अलग हों
(b) उत्पादन साधनों पर निजी स्वामित्व और उत्पादन सम्बन्धों के आधार पर बड़े समूह
(c) जाति आधारित समूह
(d) केवल राज्य में पदों के आधार पर समूह

उत्तर: (b) उत्पादन साधनों पर निजी स्वामित्व और उत्पादन सम्बन्धों के आधार पर बड़े समूह

व्याख्या:

1. मार्क्स का दृष्टिकोण

  • मार्क्स के अनुसार सामाजिक वर्ग का निर्धारण आर्थिक आधार पर होता है, न कि जन्म, जाति, शिक्षा या पद के आधार पर।
  • वर्ग निर्माण में मुख्य घटक हैं:
    1. उत्पादन साधनों का स्वामित्व (Ownership of Means of Production)
    2. उत्पादन सम्बन्ध (Relations of Production)

2. उत्पादन साधन और वर्ग

  • पूंजीवादी समाज में:
    • पूंजीपति वर्ग (Bourgeoisie) → उत्पादन साधनों का निजी स्वामी
    • मजदूर वर्ग (Proletariat) → उत्पादन साधनों पर कोई स्वामित्व नहीं, केवल श्रम बेचता है
  • वर्ग केवल आर्थिक और सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर अलग होते हैं।

3. सामाजिक संरचना में महत्व

  • सामाजिक वर्ग समाज की आर्थिक संरचना और शक्ति संतुलन का आधार बनते हैं।
  • इतिहास की धारा में सामाजिक परिवर्तन अक्सर वर्ग संघर्ष (Class Struggle) के माध्यम से होता है।
  • सामाजिक वर्ग वे बड़े समूह हैं जिनका निर्माण उत्पादन साधनों पर स्वामित्व और उत्पादन सम्बन्धों के आधार पर होता है।
  • यह दृष्टिकोण मार्क्स के भौतिकवादी ऐतिहासिक दृष्टिकोण (Historical Materialism) पर आधारित है।

30. (कथन-1 / कथन-2):

कथन-1: सामाजिक वर्ग केवल जन्म के आधार पर बनते हैं।
कथन-2: सामाजिक वर्ग उत्पादन साधनों और उत्पादन सम्बन्धों के आधार पर बनते हैं।

(a) केवल कथन-1 सही है
(b) केवल कथन-2 सही है
(c) दोनों कथन सही हैं
(d) दोनों कथन गलत हैं

उत्तर: (b) केवल कथन-2 सही है

व्याख्या:

1. मार्क्स का दृष्टिकोण

  • मार्क्स के अनुसार सामाजिक वर्ग का निर्धारण आर्थिक आधार पर होता है, न कि जन्म, जाति या परंपरा के आधार पर।
  • सामाजिक वर्ग निर्माण में मुख्य घटक:
    1. उत्पादन साधनों का स्वामित्व (Ownership of Means of Production)
    2. उत्पादन सम्बन्ध (Relations of Production)

2. उदाहरण

  • पूंजीवादी समाज में:
    • पूंजीपति वर्ग (Bourgeoisie) → उत्पादन साधनों का स्वामी
    • मजदूर वर्ग (Proletariat) → उत्पादन साधनों पर कोई स्वामित्व नहीं, केवल श्रम बेचता है
  • जन्म या सामाजिक परंपरा वर्ग निर्माण में निर्णायक नहीं होती।

Mohan Exam

  • कथन-1 गलत है क्योंकि जन्म आधारित वर्गीकरण मार्क्स की वर्गीय अवधारणा से मेल नहीं खाता।
  • कथन-2 सही है क्योंकि उत्पादन साधनों और उत्पादन सम्बन्धों पर आधारित वर्ग ही वास्तविक सामाजिक वर्ग होते हैं।
  • सामाजिक वर्ग का निर्माण उत्पादन साधनों और उत्पादन सम्बन्धों पर आधारित होता है।
  • इसलिए सही उत्तर: (b) केवल कथन-2 सही है

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