Karl Marx का एशियाई उत्पादन पद्धति (Asian Mode of Production – AMP) समाजशास्त्र और इतिहास के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। AMP के माध्यम से Marx ने एशियाई समाजों में भूमि, उत्पादन, राज्य और सामाजिक संरचना के स्थायित्व और गतिहीनता के कारणों का विश्लेषण किया। इस पोस्ट में हम AMP पर आधारित MCQs प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रत्येक प्रश्न के साथ सटीक उत्तर, गहन व्याख्या दिए गए हैं, ताकि आप विषय को पूरी तरह समझ सकें और परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकें।
1. ए.एम.पी. (Asian Mode of Production) के अनुसार एशियाई शहरों का विकास पूंजीवाद क्यों नहीं ला सका?
(a) शहर कृषि और गाँवों से पूरी तरह स्वतंत्र थे
(b) उद्योग और बाजार का विनियम राज्य द्वारा नहीं किया गया
(c) शहर राज्य के ठाठ-बाट और शान-शौकत के लिए बनाए गए थे, न कि उत्पादन वृद्धि के लिए
(d) सभी उपरोक्त
उत्तर: (c) शहर राज्य के ठाठ-बाट और शान-शौकत के लिए बनाए गए थे, न कि उत्पादन वृद्धि के लिए
व्याख्या:
AMP (Asian Mode of Production) के अनुसार एशिया (भारत, चीन, मिस्र, मेसोपोटामिया आदि) में बने शहर आर्थिक उत्पादन और पूँजीवादी बाजार के केंद्र नहीं थे। वे मुख्यतः:
- प्रशासनिक केंद्र
- धार्मिक–मंदिर केंद्र
- सैन्य–शाही केंद्र
- कर वसूली (surplus extraction) के केंद्र
थे।
एशियाई शहरों का उद्देश्य पश्चिम की तरह उत्पादन-बढ़ोतरी, व्यापार का विस्तार, और स्वतंत्र bourgeois class पैदा करना नहीं था।
बल्कि, शहर राजकीय दरबार, नौकरशाही, पुरोहितों और सैन्य शक्ति की वैभव-प्रदर्शनी के लिए बनाए गए थे।इसी कारण:
- स्वतंत्र व्यापारी वर्ग विकसित नहीं हुआ
- उत्पादन संबंध पूँजीवादी नहीं बने
- शहर गाँवों से आर्थिक रूप से स्वतंत्र इकाई नहीं बन पाए
- पूँजीवाद का ऐतिहासिक उभार अवरोधित हो गया
AMP के अनुसार एशियाई शहर उत्पादन-आधारित आर्थिक केंद्र नहीं थे; वे राजकीय–शाही उपभोग केंद्र थे, इसलिए पूँजीवाद विकसित नहीं हो सका।
2. मार्क्स ने सामुदायिक स्वामित्व के संबंध में ए.एम.पी. में क्या विशेष पाया?
(a) भूमि का अधिकार व्यक्तिगत था और किसान स्वयं उसका मालिक था
(b) भूमि पर अधिकार सामुदायिक था और गाँव के लोगों के पास था
(c) भूमि का नियंत्रण पूरी तरह राज्य के पास था
(d) जमींदार और जागीरदार भूमि के मालिक थे
उत्तर: (b) भूमि पर अधिकार सामुदायिक था और गाँव के लोगों के पास था
व्याख्या:
Asian Mode of Production (AMP) की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता — जिसे मार्क्स ने कई लेखों में स्पष्ट रूप से लिखा — यह थी कि:→ भूमि का स्वामित्व व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामुदायिक (Communal) था।
→ गाँव ही वास्तविक इकाई था, व्यक्ति नहीं।
AMP में गाँव:
- स्वयं-पर्याप्त आर्थिक इकाई (self-sufficient community)
- सामुदायिक भूमि स्वामित्व (communal ownership)
- सामूहिक कृषि कार्य
- अधिशेष का स्थानीय विनिमय और वितरण
- परंपराओं द्वारा नियंत्रित सामाजिक संरचना
पर आधारित थे।
परिणाम क्या हुआ?
मार्क्स के अनुसार:
- सामुदायिक भूमि स्वामित्व ने व्यक्तिगत निजी संपत्ति (private property) को उभरने नहीं दिया।
- इसलिए व्यक्तिगत उद्यम, बाजार विस्तार, और पूँजीवाद का विकास अवरुद्ध रहा।
- गाँवों की संरचना में “स्थिरता” थी, जो सामाजिक परिवर्तन को धीमा करती थी।
यही AMP की विशेषता थी, और यहीं से पश्चिमी व एशियाई समाजों के विकास-पथ अलग हुए।
AMP में भूमि व्यक्तिगत स्वामित्व में नहीं, बल्कि गाँव समुदाय के सामुदायिक स्वामित्व में थी — यही एशियाई समाजों में परिवर्तन व पूँजीवाद के विकास को धीमा करने वाला प्रमुख कारक बना।
3. AMP के अनुसार भारत के गाँवों की उत्पादन पद्धति कैसी थी?
(a) अत्यंत उन्नत और तकनीकी रूप से विकसित
(b) सरल, पिछड़ी और स्थिर, जिसमें किसी प्रकार का परिवर्तन कठिन था
(c) उद्योग और व्यापार पर आधारित
(d) पूरी तरह बाजार अर्थव्यवस्था पर निर्भर
उत्तर: (b) सरल, पिछड़ी और स्थिर, जिसमें किसी प्रकार का परिवर्तन कठिन था
व्याख्या:
AMP (Asian Mode of Production) के अनुसार भारत के पारंपरिक गाँवों की उत्पादन पद्धति में कुछ मुख्य विशेषताएँ थीं:1. उत्पादन “सरल” था
- हल, बैल, सिंचाई के साधन आदि सर्वाधिक प्रारंभिक स्तर पर थे।
- नई तकनीक अपनाने का दबाव नहीं था।
- साधनों और तरीकों में पीढ़ी दर पीढ़ी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होता था।
2. उत्पादन “स्वावलंबी” था → बाजार से स्वतंत्र
मार्क्स ने भारत के गाँवों को “self-sustaining, independent units” कहा।
यहाँ उत्पादन—
- कृषि
- चराई
- हथकरघा
- शिल्पकारी
सभी गाँव के भीतर ही पूरा हो जाता था।इससे बाहरी बाजार की लगभग कोई भूमिका नहीं थी।
3. उत्पादन “स्थिर” था → परिवर्तन का विरोध
AMP के अनुसार भारत के गाँवों में:
- परंपराओं का बोलबाला
- स्थिर सामाजिक ढाँचा
- सामुदायिक भूमि स्वामित्व
- स्थानीय उत्पादन पद्धति में निरंतरता
इन सभी कारणों से सामाजिक और तकनीकी परिवर्तन लगभग असंभव था।
4. परिणाम: पूँजीवादी परिवर्तन अवरुद्ध
स्थिर उत्पादन पद्धति ने—
- व्यक्तिगत लाभ
- उद्यम
- पूँजी संचय
- बाजार विस्तार
- व्यापारी वर्ग का उदय
—इन सभी को सीमित कर दिया।
इस कारण एशिया (विशेषतः भारत) में पश्चिम जैसा पूँजीवाद विकसित नहीं हो सका।
AMP के अनुसार भारतीय गाँव तकनीकी रूप से सरल, स्वावलंबी और परिवर्तन-विरोधी थे—इसी स्थिरता ने पूँजीवादी विकास को अवरुद्ध किया।
4. एशियाई उत्पादन पद्धति में सामन्तवाद और रुढ़िगत सामाजिक व्यवस्था क्यों स्थायी रहे?
(a) क्योंकि राज्य ने बाजार और उद्योग को बढ़ावा नहीं दिया
(b) क्योंकि गाँव स्वावलम्बी और सामुदायिक स्वामित्व वाले थे
(c) क्योंकि किसानों में उत्पादन बढ़ाने की प्रेरणा नहीं थी
(d) सभी उपरोक्त
उत्तर: (d) सभी उपरोक्त
व्याख्या:
Asian Mode of Production (AMP) के अनुसार एशिया (विशेषतः भारत, चीन, मिस्र) में सामन्तवाद, जाति-व्यवस्था और रुढ़िगत सामाजिक संरचनाएँ इसलिए स्थायी बनी रहीं क्योंकि अर्थव्यवस्था और समाज की मूल संरचना परिवर्तन विरोधी थी।मार्क्स ने AMP को “self-reproducing and stationary structure” कहा — जिसका अर्थ है कि यह पद्धति अपने आपको जैसा है वैसा ही बनाए रखती थी।
1. राज्य ने उद्योग और बाजार को विकसित नहीं किया
AMP का राज्य:
- अत्यधिक केंद्रीकृत
- कर-संग्रह पर आधारित
- सिंचाई/राजकीय परियोजनाओं का नियंत्रक
था।
लेकिन यह न तो उद्योग विकसित करता था, न बाज़ार का विस्तार।
इसका सीधा परिणाम:
- व्यापार कमजोर
- निजी संपत्ति का विकास असंभव
- bourgeois वर्ग का उदय अवरुद्ध
और इस कारण सामाजिक परिवर्तन नहीं हुआ।
2. गाँव स्वावलंबी और सामुदायिक स्वामित्व वाले थे
गाँव:
- आर्थिक रूप से स्वनिर्भर (self-sufficient)
- भूमि का सामुदायिक स्वामित्व
- स्थानीय उत्पादन–वितरण
- तकनीकी स्थिरता
पर आधारित थे।
मार्क्स ने इसे “village republics” कहा — जो “unchanged for centuries” बने रहे।
स्वावलंबन = बाहरी आर्थिक दबाव का अभाव
→ परिवर्तन की आवश्यकता ही पैदा नहीं हुई
→ परंपराएँ ज्यों की त्यों बनी रहीं3. किसानों में उत्पादन बढ़ाने की प्रेरणा नहीं थी
क्योंकि:
- भूमि सामुदायिक थी
- राज्य अधिशेष (surplus) कर के रूप में ले लेता था
- किसान अपनी उपज में से मामूली हिस्सा रखते थे
- अतिरिक्त उत्पादन का लाभ उन्हें नहीं मिलता था
इसलिए अतिरिक्त उत्पादन → अतिरिक्त शोषण
इसलिए किसान उत्पादन नहीं बढ़ाते थे।यह स्थिति सामाजिक जड़ता को स्थायी बनाती थी।
परिणाम:
राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था + गाँवों का स्वावलंबन + उत्पादन बढ़ाने की प्रेरणा का अभाव
→ पूरे सामाजिक ढाँचे में स्थिरता (structural stability)
→ परंपराएँ (जैसे जाति, सामन्तवाद, पितृसत्ता) स्थायी बनी रहीं
→ पूँजीवाद और आधुनिक वर्ग-संरचना विकसित नहीं हो पाईएशियाई उत्पादन पद्धति में बाजार की कमजोरी, गाँवों का स्वावलंबन और किसानों की प्रेरणा की कमी — ये तीनों मिलकर सामन्तवाद और रुढ़िगत सामाजिक व्यवस्था को सदियों तक स्थायी बनाए रखते हैं।
5. मार्क्स के अनुसार एशिया की उत्पादन पद्धति (AMP) में गाँवों के स्थायित्व और गतिहीनता का मुख्य कारण कौन सा था?
(a) कृषि में अत्यधिक नवाचार और औद्योगिकीकरण
(b) भूमि का सामुदायिक स्वामित्व और व्यक्तिगत सम्पत्ति का अभाव
(c) राज्य का कमजोर नियंत्रण और सिंचाई के साधनों की कमी
(d) ग्रामीण समाज में व्यापार और बाज़ार का अत्यधिक विकास
उत्तर: (b) भूमि का सामुदायिक स्वामित्व और व्यक्तिगत सम्पत्ति का अभाव
व्याख्या:
मार्क्स के अनुसार Asian Mode of Production (AMP) की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी:
गाँवों में भूमि का सामुदायिक स्वामित्व (communal ownership of land)।यह सामुदायिक स्वामित्व गाँवों को:
- स्वावलंबी
- बंद (closed)
- गतिशीलता-विहीन (non-dynamic)
- परिवर्तन-विरोधी (anti-change)
बनाता था।
क्यों सामुदायिक स्वामित्व → गतिहीनता (Stagnation)?
1. व्यक्तिगत संपत्ति का अभाव = व्यक्तिगत लाभ की प्रेरणा का अभाव
किसान अपनी मेहनत से उत्पादन बढ़ाए भी तो:
- भूमि उसकी निजी नहीं
- अधिशेष का बड़ा हिस्सा राज्य ले लेता था
- कोई निजी लाभ नहीं मिलता
इसलिए किसान के पास अधिक उत्पादन या नवाचार करने की प्रेरणा नहीं थी।
2. गाँव थे “self-sufficient” → बाहरी बाजार से कटे हुए
मार्क्स ने भारतीय गाँवों को “little republics” कहा:
- खुद उत्पादन
- खुद उपभोग
- खुद वितरण
इससे न तो व्यापार बढ़ा, न प्रतिस्पर्धा, न तकनीकी परिवर्तन।
3. सामुदायिक स्वामित्व = Social Reproduction of Status Quo
परंपराएँ (जाति, दमनात्मक ढाँचे, सामन्तवाद) ज्यों की त्यों बनी रहती थीं।
क्योंकि भूमि संरचना में कोई बदलाव ही नहीं होता।4. राज्य की कर-आधारित (surplus extracting) भूमिका
राज्य का लक्ष्य था:
- कर वसूलना
- सिंचाई पर नियंत्रण रखना
- अधिशेष लेना
न कि उत्पादन-आधारित विकास करना।
इससे भी गाँवों की आर्थिक संरचना stationary ही रही।
AMP में भूमि का सामुदायिक स्वामित्व + व्यक्तिगत संपत्ति का अभाव = उत्पादन में स्थिरता + सामाजिक परिवर्तन का अभाव = गाँवों का स्थायित्व और गतिहीनता।
यही मार्क्स के अनुसार AMP की “central cause of Asiatic stagnation” थी।भूमि का सामुदायिक स्वामित्व AMP का केंद्रीय तत्व था, जिसने ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर, स्थिर और परिवर्तन-विरोधी बनाकर सामाजिक–आर्थिक गतिहीनता को स्थायी रूप दिया।
6.
कथन-1: एशियाई उत्पादन पद्धति में राज्य का कृषि विकास कार्यों पर नियंत्रण स्थायित्व का कारण था।
कथन-2: राज्य ने गाँवों की स्वावलम्बी उत्पादन पद्धति को अपने नियंत्रण में लेने के लिए सिंचाई और अन्य साधनों पर अधिकार रखा।
(a) केवल कथन-1 सही है
(b) केवल कथन-2 सही है
(c) दोनों कथन सही हैं और कथन-2, कथन-1 का कारण है
(d) दोनों कथन सही हैं लेकिन कथन-2, कथन-1 का कारण नहीं है
उत्तर: (c) दोनों कथन सही हैं और कथन-2, कथन-1 का कारण है
व्याख्या:
मार्क्स ने ‘एशियाई उत्पादन पद्धति’ (AMP) में पाया कि:कथन-1:
“कृषि विकास कार्यों पर राज्य का नियंत्रण स्थायित्व (rigidity) का कारण था।”
क्योंकि सिंचाई, तालाब, नहरें, जल-व्यवस्था, भूमि कर—सब राज्य के नियंत्रण में थे।
इससे गाँवों की उत्पादन प्रणाली स्थिर और अपरिवर्तनीय बनी रही।कथन-2:
“राज्य ने गाँवों की स्वावलम्बी उत्पादन पद्धति को अपने नियंत्रण में लेने के लिए सिंचाई और अन्य साधनों पर अधिकार रखा।”
मार्क्स के अनुसार एशियाई समाज में विशाल सार्वजनिक कार्य (Public Works) – especially irrigation works – केवल राज्य ही बना सकता था।
इस तकनीकी-अनिवार्यता के कारण राज्य का ग्रामीण जीवन पर मजबूत केंद्रीकृत नियंत्रण बना।कथन-2, कथन-1 का कारण क्यों है?
क्योंकि:
- राज्य ने सिंचाई, जल-प्रबंधन, बाढ़-नियंत्रण जैसे साधनों पर अधिकार रखा।
- इससे गाँव उसके ऊपर निर्भर हो गए।
- परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन, सामाजिक ढाँचा और गाँवों की स्वायत्तता—सब राज्य के नियंत्रण में आ गए।
- यह केंद्रीकरण ही ग्राम-व्यवस्था के स्थायित्व (non-changing structure) का मुख्य कारण बना।
इसलिए दोनों कथन सही हैं और कथन-2 ही कथन-1 का कारण प्रदान करता है।
7. (सूची-I / सूची-II मिलान करें)
सूची-I (AMP की विशेषताएँ)
A. स्वावलम्बी गाँव
B. कृषि और दस्तकारी का गठबन्धन
C. व्यक्तिगत सम्पत्ति का अभाव
D. राज्य का अत्यधिक नियंत्रण
सूची-II (परिणाम / प्रभाव)
- अतिरिक्त उत्पादन कर के रूप में राज्य को देना पड़ता था
- बुर्जुआ वर्ग और खुला बाजार नहीं पनप सका
- गाँवों में उत्पादन स्थिर और गतिहीन बना रहा
- किसानों को उत्पादन में वृद्धि की प्रेरणा नहीं मिली
सही संयोजन चुनिए—
(a) A–3, B–2, C–4, D–1
(b) A–2, B–3, C–1, D–4
(c) A–4, B–1, C–3, D–2
(d) A–1, B–4, C–2, D–3
उत्तर: (a) A–3, B–2, C–4, D–1
व्याख्या:
A. स्वावलम्बी गाँव → 3. उत्पादन स्थिर व गतिहीनमार्क्स के अनुसार एशियाई गाँव self-sufficient थे, इसलिए उनमें बाहरी बाज़ार का प्रभाव नहीं पहुँचता था।
परिणाम: न तकनीकी परिवर्तन, न उत्पादन में वृद्धि।B. कृषि और दस्तकारी का गठबन्धन → 2. बुर्जुआ वर्ग और खुला बाजार नहीं पनपा
कृषि + हस्तशिल्प दोनों गाँव के भीतर उपभोग हो जाते थे।
व्यापारी वर्ग, बाज़ार और पूँजी संचय नहीं हो सका।C. व्यक्तिगत सम्पत्ति का अभाव → 4. उत्पादन बढ़ाने की प्रेरणा नहीं
भूमि सामुदायिक स्वामित्व में थी; व्यक्ति का निजी हक़ नहीं था।
किसान surplus बढ़ाने को प्रेरित नहीं होता था।D. राज्य का अत्यधिक नियंत्रण → 1. surplus राज्य को कर के रूप में देना पड़ता था
राज्य सिंचाई, कर, सार्वजनिक निर्माण पर पूर्ण नियंत्रण रखता था।
अतिरिक्त उत्पादन (surplus) राज्य द्वारा ले लिया जाता था।
8. एशिया की उत्पादन पद्धति (AMP) में कृषि और दस्तकारी के सम्बन्ध को किस प्रकार देखा गया है?
(a) कृषि और दस्तकारी पूरी तरह अलग-अलग थे और स्वतंत्र रूप से विकसित हुए।
(b) कृषि और दस्तकारी संयोग से एक हो गये थे और गाँव की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।
(c) दस्तकारी का विकास पूरी तरह राज्य पर निर्भर था और कृषि उससे स्वतंत्र थी।
(d) कृषि पूरी तरह निजी स्वामित्व पर आधारित थी और दस्तकारी केवल व्यापार के लिए थी।
उत्तर: (b) कृषि और दस्तकारी संयोग से एक हो गये थे और गाँव की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।
व्याख्या:
मार्क्स के अनुसार Asian Mode of Production (AMP) में—कृषि और दस्तकारी (Handicraft + Agriculture) दोनों एकीकृत थे।
यह विभाजित या स्वतंत्र आर्थिक क्षेत्र नहीं थे।
दोनों क्षेत्र गाँव की आंतरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए थे।
गाँव खुद ही—
- अनाज
- कपड़ा
- औज़ार
- दैनिक उपयोग की चीज़ें
उत्पादित करता था।
इसलिए उसे बाहरी बाज़ार की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।
- गाँव self-sufficient units बन गए
- उत्पादन स्थिर और परिवर्तन-रहित रहा
- व्यापारी वर्ग, बाज़ार और पूँजी संचय विकसित नहीं हुआ
- पूँजीवाद के विकास के लिए आवश्यक सामाजिक-आर्थिक विभाजन नहीं बन पाया
- राज्य का केंद्रीकृत प्रभुत्व बना रहा क्योंकि surplus राज्य ले लेता था
9. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
कथन-1: एशियाई समाज में भूमि का स्वामित्व व्यक्तिगत था।
कथन-2: एशियाई समाज में भूमि का स्वामित्व सामुदायिक था।
(a) केवल कथन-1 सही है
(b) केवल कथन-2 सही है
(c) दोनों कथन सही हैं
(d) दोनों कथन गलत हैं
सही उत्तर: (b) केवल कथन-2 सही है
व्याख्या:
मार्क्स के अनुसार Asian Mode of Production (AMP) की मुख्य विशेषता थी:भूमि व्यक्तिगत संपत्ति नहीं थी
यानी किसान भूमि का निजी मालिक नहीं था।
भूमि सामुदायिक (communal) स्वामित्व में थी
गाँव पूरे समुदाय के रूप में भूमि का उपयोग, बंटवारा और खेती करता था।
मार्क्स ने भारत के गाँवों को “communal village communities” कहा है जहाँ भूमि पर एक व्यक्ति का निजी अधिकार नहीं, बल्कि सामूहिक अधिकार होता था।इस सामुदायिक स्वामित्व के तीन परिणाम
- किसान के पास निजी स्वामित्व न होने से उत्पादन बढ़ाने की प्रेरणा कम
- उत्पादन पद्धति स्थिर और परंपरागत बनी रही
- सामन्तवाद और राज्य-नियंत्रण लंबे समय तक टिके रहे
10. सूची-I / सूची-II मिलान करें-
सूची-I (AMP की विशेषताएँ)
A. व्यक्तिगत सम्पत्ति का अभाव
B. कृषि और दस्तकारी का गठबंधन
C. राज्य का कृषि विकास कार्यों पर प्रभुत्व
D. अतिरिक्त उत्पादन का विनिमय
सूची-II (परिणाम / विशेषताएँ)
- सामन्तवादी व्यवस्था की निरन्तरता
- गाँव की स्वावलम्बी संरचना
- राज्य का समाज पर प्रभुत्व बढ़ना
- राज्य द्वारा कर के रूप में अधिग्रहण
(a) A-2, B-1, C-3, D-4
(b) A-1, B-2, C-4, D-3
(c) A-3, B-4, C-1, D-2
(d) A-4, B-3, C-2, D-1
उत्तर: (a) A-2, B-1, C-3, D-4
व्याख्या:
- A. व्यक्तिगत सम्पत्ति का अभाव → गाँव की स्वावलम्बी संरचना (2)
सामुदायिक स्वामित्व के कारण गाँव आत्मनिर्भर बने रहे।- B. कृषि और दस्तकारी का गठबंधन → सामन्तवादी व्यवस्था की निरन्तरता (1)
दोनों का मेल गाँव को स्थिर बनाता था, जिससे सामन्तवाद टिकता था।- C. राज्य का कृषि विकास कार्यों पर प्रभुत्व → राज्य का समाज पर प्रभुत्व बढ़ना (3)
सिंचाई, बाँध आदि पर नियंत्रण से राज्य शक्तिशाली बना।- D. अतिरिक्त उत्पादन का विनिमय → राज्य द्वारा कर के रूप में अधिग्रहण (4)
अधिशेष उत्पादन बाजार में नहीं गया, राज्य ने कर के रूप में ले लिया।
11. मार्क्स के अनुसार यूरोप और एशिया में सामन्तवाद के मुख्य अन्तर क्या थे?
(a) यूरोप में राज्य मजबूत था, एशिया में नागरिक समाज विकसित था
(b) यूरोप में राज्य कमजोर था और नागरिक समाज विकसित था, एशिया में राज्य मजबूत और नागरिक समाज पिछड़ा था
(c) दोनों महाद्वीपों में राज्य और नागरिक समाज बराबर विकसित थे
(d) एशिया में राज्य कमजोर था और यूरोप में नागरिक समाज पिछड़ा था
उत्तर: (b) यूरोप में राज्य कमजोर था और नागरिक समाज विकसित था, एशिया में राज्य मजबूत और नागरिक समाज पिछड़ा था
व्याख्या:
मार्क्स ने यूरोप और एशिया के सामन्तवाद (feudalism) में मूल अंतर पर ध्यान दिया:1. यूरोप (European Feudalism)
- राज्य कमजोर था, स्थानीय सामंती संरचना प्रमुख थी।
- नागरिक समाज (Civil Society) और बाजार विकसित हो गए थे।
- वर्ग निर्माण हुआ, पूंजीवाद के प्रारंभिक संकेत दिखाई दिए।
- इस कारण यूरोपीय सामन्तवाद स्थिर नहीं रहा, और परिवर्तनशील रहा।
2. एशिया (Asiatic Mode of Production / AMP)
- राज्य अत्यधिक मजबूत और केंद्रीकृत था।
- नागरिक समाज और निजी संपत्ति का विकास पिछड़ा था।
- गाँवों का सामुदायिक स्वामित्व और स्वावलंबी प्रणाली बनी रही।
- राज्य का प्रभुत्व बढ़ने से सामन्तवाद स्थिर और परिवर्तन-विरोधी रहा।
पहलू यूरोप एशिया राज्य की शक्ति कमजोर अत्यधिक मजबूत नागरिक समाज विकसित पिछड़ा बाजार और वर्ग विकसित सीमित / अविकसित सामन्तवाद की स्थिरता परिवर्तनशील स्थिर
12. अमित भादुड़ी के अनुसार भारत की कृषि उत्पादन पद्धति किस प्रकार थी?
(a) पूर्ण सामन्तवादी (Fully Feudal)
(b) अर्ध-सामन्तवादी (Semi-Feudal)
(c) पूंजीवादी (Capitalist)
(d) आदिम साम्यवादी (Primitive Communal)
उत्तर: (b) अर्ध-सामन्तवादी (Semi-Feudal)
व्याख्या:
1. अमित भादुड़ी की दृष्टि (Amit Bhaduri’s View)भारतीय कृषि को उन्होंने “Semi-Feudal” कहा। इसका अर्थ था:
- उत्पादन प्रणाली पूर्ण सामन्तवाद नहीं, और पूर्ण पूंजीवाद भी नहीं।
- ग्रामीण समाज में अर्ध-स्थायी शोषण और पारंपरिक संरचनाएँ बनी रहीं।
2. मुख्य लक्षण (Key Features of Semi-Feudal Agriculture)
लक्षण विवरण बटाईदारी/साझा खेती कानून मुक्त बटाईदारी, उत्पाद का भाग मालिक और किसान में बांटा जाता था। ऋणग्रस्तता छोटे किसान अक्सर साहूकार या जमींदार के ऋण में फंसे रहते थे। शोषण और दबाव ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदार और स्थानीय शक्तियों द्वारा शोषण। सीमित बाजार संबंध उत्पादन मुख्यतः गाँव के भीतर, बाहरी बाज़ार पर निर्भरता कम।
- भारत में पूर्ण सामन्तवादी (fully feudal) संरचना नहीं थी क्योंकि निजी संपत्ति और पूँजी का सीमित विकास हुआ।
- पूंजीवादी तत्व भी थे, लेकिन पूंजीवादी कृषि पूरी तरह विकसित नहीं थी।
- इसलिए अर्ध-सामन्तवादी (Semi-Feudal) मॉडल सही है।
अमित भादुड़ी के अनुसार भारत की कृषि अर्ध-सामन्तवादी थी, जिसमें बटाईदारी, ऋणग्रस्तता, शोषण और सीमित बाजार संबंध प्रमुख लक्षण थे।
13. उत्सा पटनायक के अनुसार भारत में मार्क्स के एशियाटिक उत्पादन पद्धति (AMP) का कौन सा विकल्प अधिक उपयुक्त है?
(a) सामन्तवादी उत्पादन पद्धति
(b) पूर्व पूंजीवादी (Pre-capitalist) उत्पादन पद्धति
(c) पूर्ण पूंजीवादी उत्पादन पद्धति
(d) आदिम साम्यवाद
उत्तर: (b) पूर्व पूंजीवादी (Pre-capitalist) उत्पादन पद्धति
व्याख्या:
1. उत्सा पटनायक की दृष्टि (Utsa Patnaik’s View)
- भारत में AMP को सीधे लागू करना मुश्किल है।
- पटनायक ने कहा कि भारतीय ग्रामीण उत्पादन प्रणाली “semi-feudal + pre-capitalist” तत्वों का मिश्रण थी।
- इसमें सामन्तवाद के स्थायी अवरोध नहीं थे और उत्पादन शक्तियों के विकास की संभावना थी।
2. पूर्व पूंजीवादी (Pre-Capitalist) अर्थ
- निजी संपत्ति और बाजार संबंध सीमित लेकिन मौजूद थे।
- कृषि और दस्तकारी गाँवों में मुख्यतः स्वावलंबी थी।
- उत्पादन प्रणाली परिवर्तनशील थी, यानी नवाचार और उत्पादन शक्ति विकसित हो सकती थी।
- सामन्तवाद की तरह स्थिर और गतिहीन नहीं थी।
- AMP = strictly stagnant / state-dominated villages
- India (Patnaik) = pre-capitalist features
↳ राज्य का अत्यधिक केंद्रीकृत प्रभुत्व नहीं,
↳ बाजार और निजी संपत्ति के प्रारंभिक संकेत,
↳ उत्पादन शक्तियों में संभावनाएँ।इसलिए पूर्व पूंजीवादी (Pre-capitalist) विकल्प अधिक उपयुक्त है।
उत्सा पटनायक के अनुसार भारत में AMP पूरी तरह लागू नहीं होता; यहाँ उत्पादन प्रणाली पूर्व पूंजीवादी (pre-capitalist) थी, जिसमें सामाजिक परिवर्तन और उत्पादन शक्तियों के विकास की गुंजाइश थी।
14. (कथन-1 / कथन-2):
कथन-1: केथलीन गफ ने तमिलनाडु के धांवुर जिले का अध्ययन करते हुए कहा कि भारत में सामाजिक परिवर्तन और उत्पादन शक्तियों के विकास की गुंजाइश थी।
कथन-2: गफ के अनुसार मार्क्स ने एशिया की उत्पादन पद्धति को पूरी तरह भारतीय संदर्भ में देखा।
(a) केवल कथन-1 सही है
(b) केवल कथन-2 सही है
(c) दोनों कथन सही हैं
(d) दोनों कथन गलत हैं
उत्तर: (a) केवल कथन-1 सही है
व्याख्या:
1. केथलीन गफ (Kathleen Gough) का निष्कर्ष
- गफ ने धांवुर (Dharmapuri), तमिलनाडु के ग्रामीण क्षेत्रों का विस्तृत अध्ययन किया।
- उन्होंने पाया कि यहाँ सामाजिक परिवर्तन और उत्पादन शक्तियों के विकास की संभावना थी, यानी ग्रामीण उत्पादन पूरी तरह स्थिर या गतिहीन नहीं था।
- भारत में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अर्ध-सामन्तवादी/पूर्व-पूंजीवादी लक्षण मौजूद थे।
2. मार्क्स और एशियाटिक मोड ऑफ़ प्रोडक्शन (AMP)
- मार्क्स ने AMP को मुख्यतः यूरोपीय संदर्भ में देखा।
- भारतीय विशिष्टताओं (जैसे सामुदायिक स्वामित्व, स्वावलंबी गाँव) को उन्होंने पूरी तरह शामिल नहीं किया।
- इसलिए गफ ने स्पष्ट किया कि AMP को भारत पर सीधे लागू करना सही नहीं है।
निष्कर्ष
- कथन-1 सही है: गफ ने सामाजिक परिवर्तन और उत्पादन शक्तियों की गुंजाइश की पुष्टि की।
- कथन-2 गलत है: मार्क्स ने AMP को पूरी तरह भारतीय संदर्भ में नहीं देखा।
केथलीन गफ के अनुसार धांवुर जिले में उत्पादन पद्धति परिवर्तनशील थी, जबकि मार्क्स ने AMP को पूरी तरह भारतीय संदर्भ में नहीं देखा।
15. अर्ध-सामन्तवादी (Semi-Feudal) कृषि की विशेषताएँ कौन-कौन सी हैं?
(a) कानून मुक्त बटाईदारी
(b) छोटे किसानों का ऋणग्रस्त होना
(c) ग्रामीण शोषक वर्ग का अस्तित्व
(d) किसानों का बाजार से सीमित सम्बन्ध
(e) सभी उपरोक्त
उत्तर: (e) सभी उपरोक्त
व्याख्या:
1. अमित भादुड़ी का दृष्टिकोण
- भारत की कृषि उत्पादन प्रणाली पूर्ण सामन्तवादी नहीं, न ही पूरी तरह पूंजीवादी थी।
- इसे उन्होंने Semi-Feudal (अर्ध-सामन्तवादी) कहा।
2. मुख्य विशेषताएँ
- कानून मुक्त बटाईदारी (Tenancy without legal security)
- भूमि पर जमींदार और किसान के बीच बटाईदारी व्यवस्था।
- कानून की सुरक्षा सीमित, किसान अधिशेष से अधिक लाभ नहीं उठा पाता।
- छोटे किसानों का ऋणग्रस्त होना
- किसान अक्सर साहूकार या जमींदार से ऋण लेते थे।
- ऋणग्रस्तता से किसान आर्थिक रूप से दबा रहता था।
- ग्रामीण शोषक वर्ग का अस्तित्व
- जमींदार, साहूकार और स्थानीय शक्तियाँ उत्पादन और संसाधनों पर नियंत्रण रखती थीं।
- ग्रामीण समाज में शोषण और दबाव मौजूद था।
- किसानों का बाजार से सीमित सम्बन्ध
- उत्पादन मुख्यतः आत्म-उपभोग या स्थानीय विनिमय के लिए।
- बाहरी बाज़ार पर निर्भरता कम थी, इसलिए पूंजीवादी विकास नहीं हुआ।
- इन सभी लक्षणों ने भारतीय कृषि को सामन्तवाद और पूंजीवाद के मध्य स्थित किया।
अर्ध-सामन्तवादी कृषि में कानून मुक्त बटाईदारी, ऋणग्रस्त छोटे किसान, ग्रामीण शोषक वर्ग और बाजार से सीमित सम्बन्ध शामिल थे।
16. नीचे सूची-I (वैज्ञानिक / आलोचक) और सूची-II (निष्कर्ष / दृष्टिकोण) के सही मिलान का चयन कीजिए:
सूची-I (वैज्ञानिक/आलोचक)
A. अमित भादुड़ी
B. उत्सा पटनायक
C. केथलीन गफ
सूची-II (निष्कर्ष / दृष्टिकोण)
- भारत में अर्ध-सामन्तवादी उत्पादन पद्धति थी
- भारत में पूर्व पूंजीवादी उत्पादन पद्धति थी
- मार्क्स ने एशिया की पद्धति को यूरोप के संदर्भ में देखा
(a) A–1, B–2, C–3
(b) A–2, B–1, C–3
(c) A–3, B–2, C–1
(d) A–1, B–3, C–2
उत्तर: (a) A–1, B–2, C–3
व्याख्या:
- अमित भादुड़ी → अर्ध-सामन्तवादी
- बटाईदारी, ऋणग्रस्त छोटे किसान, ग्रामीण शोषक वर्ग, सीमित बाज़ार संबंध।
- उत्सा पटनायक → पूर्व पूंजीवादी
- AMP पूरी तरह स्थिर नहीं, उत्पादन शक्तियों के विकास की गुंजाइश थी।
- केथलीन गफ → मार्क्स ने AMP को यूरोप आधारित दृष्टि से देखा
- अध्ययन: धांवुर जिले, सामाजिक परिवर्तन संभव था, AMP को भारतीय विशिष्टताओं में पूरी तरह लागू नहीं किया।
अमित भादुड़ी → अर्ध-सामन्तवादी, पटनायक → पूर्व पूंजीवादी, गफ → मार्क्स ने AMP को यूरोप संदर्भ में देखा।
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